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इंद्रियों को नियंत्रण में रखने का नाम है रोजा
Updated Sat, 02 Jun 2018 01:04 AM IST
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बड़ौत (बागपत)।
मुकद्दस रमजान के तीसरे जुमे को नमाज अकीदत के साथ अदा की गई और हजारों रोजेदारों ने मरकजी मस्जिद फूंसवाली के प्रांगण में नमाज अदा की। अकीदतमंदों ने अलाह तआला से अमन और चैन की दुआ मांगी।
तकरीर करते मरकजी मस्जिद फूंसवाली के शाही इमाम और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जिला महासचिव मौलाना आरिफ उल हक ने कहा कि रोजा मानव जीवन के लिए सामाजिक, आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से लाभदायक है। रोजे का सही अर्थ सुबह से संध्या तक केवल खाना-पीना छोड़ देना नहीं है, बल्कि रोजा जिसे अरबी में सौम कहा जाता है, का अर्थ रुकना है और अपनी इंद्रियों को नियंत्रण करना है। पेट का रोजा, जिसका अर्थ है कि रोजे के समय कुछ न खाएं-पीयें। आंखों का रोजा अर्थात किसी बहू-बेटी को गंदी और हवस भरी नजर से न देखें। जुबान का रोजा अर्थात झूठ न बोलें, किसी की बुराई न करें, किसी पर गलत आरोप न लगाएं, किसी को बुरा भला न कहें, किसी को अपशब्द न कहें। कान का रोजा अर्थात किसी की बुराई न सुनें, हाथ पैर का रोजा अर्थात किसी का अधिकार न छीनें और न ही किसी पर अत्याचार करें बल्कि दूसरों का हाथ थामें और पीड़ितों की सहायता के लिए आगे बढ़ें। दिल और दिमाग का रोजा अर्थात अल्लाह की इबादत करें एवं अपनी भावनाओं पर अंकुश लगाएं। इसी कारण इस महीने में इबादत का 70 गुना शबाब रखा गया है। रोजा इंसान को अल्लाह के करीब करता है, जिसकी बदौलत इंसान दुनिया व आखिरत में ऊंचा मकाम बना लेता है। इस पवित्र महीने में रोजे रखना सभी बालिग और स्वस्थ लोगों के लिए फर्ज (अनिवार्य) है। बीमार, बूढ़े, सफर कर रहे लोगों, गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माओं को रोजे रखने या ना रखने की आजादी दी गई है।
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मुकद्दस रमजान के तीसरे जुमे को नमाज अकीदत के साथ अदा की गई और हजारों रोजेदारों ने मरकजी मस्जिद फूंसवाली के प्रांगण में नमाज अदा की। अकीदतमंदों ने अलाह तआला से अमन और चैन की दुआ मांगी।
तकरीर करते मरकजी मस्जिद फूंसवाली के शाही इमाम और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जिला महासचिव मौलाना आरिफ उल हक ने कहा कि रोजा मानव जीवन के लिए सामाजिक, आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से लाभदायक है। रोजे का सही अर्थ सुबह से संध्या तक केवल खाना-पीना छोड़ देना नहीं है, बल्कि रोजा जिसे अरबी में सौम कहा जाता है, का अर्थ रुकना है और अपनी इंद्रियों को नियंत्रण करना है। पेट का रोजा, जिसका अर्थ है कि रोजे के समय कुछ न खाएं-पीयें। आंखों का रोजा अर्थात किसी बहू-बेटी को गंदी और हवस भरी नजर से न देखें। जुबान का रोजा अर्थात झूठ न बोलें, किसी की बुराई न करें, किसी पर गलत आरोप न लगाएं, किसी को बुरा भला न कहें, किसी को अपशब्द न कहें। कान का रोजा अर्थात किसी की बुराई न सुनें, हाथ पैर का रोजा अर्थात किसी का अधिकार न छीनें और न ही किसी पर अत्याचार करें बल्कि दूसरों का हाथ थामें और पीड़ितों की सहायता के लिए आगे बढ़ें। दिल और दिमाग का रोजा अर्थात अल्लाह की इबादत करें एवं अपनी भावनाओं पर अंकुश लगाएं। इसी कारण इस महीने में इबादत का 70 गुना शबाब रखा गया है। रोजा इंसान को अल्लाह के करीब करता है, जिसकी बदौलत इंसान दुनिया व आखिरत में ऊंचा मकाम बना लेता है। इस पवित्र महीने में रोजे रखना सभी बालिग और स्वस्थ लोगों के लिए फर्ज (अनिवार्य) है। बीमार, बूढ़े, सफर कर रहे लोगों, गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माओं को रोजे रखने या ना रखने की आजादी दी गई है।
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