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क्षमा से होती पर्यूषण पर्व की शुरूआत- अरूण मुनि
Updated Wed, 23 Aug 2017 01:24 AM IST
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बड़ौत (बागपत)।
जैन संत अरुण मुनि ने कहा पर्यूषण पर्व का मतलब सभी कषायों को शांत करना और आत्मा के गुणों को अस्तित्व से जोड़ना है।
वे मंगलवार को पर्यूषण पर्व के चौथे दिन जैन स्थानक नया बाजार में धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा इस पर्व में देव, गुरू, धर्म ज्ञान और चरित्र से अपने आप को जोड़ा जाता है। अपनी आत्मा को निरंतर पाक शाक रखना ही पर्यूषण पर्व का मुख्य लक्ष्य है। इसलिए इस महा पर्व को लाजवाब कहा जाता है। इस महा पर्व की शुरूआत क्षमा से की जाती है। उन्होंने कहा केवल अपने भाव शुद्ध रखने से ही मनुष्य बड़े-बड़े गौत्र का बंध कर लेता है। मनुष्य जीवन में भाव की विशेष महत्ता है। हर समय कर्म कांड में, बुरे कार्यों में लीन रहने वाला व्यक्ति अपने भाव शुद्ध करके संसार सागर को पार कर जाता है। हर समय धर्म ध्यान में लगे रहने वाला, बड़ी-बड़ी तपस्या करने वाला व्यक्ति अपने भाव गंदे रखकर सभी करे कराए को खो देता है और नीच गौत्र का बंध करता है। पाप कर्म करने वाले कभी जैन नहीं हो सकते। अमन चैन से निरपराध जीवन जीने वाले ही जैन कहलाने के अधिकारी होते हैं। इसमें अनुज जैन, सतेंद्र जैन, कालू, ऋषभ जैन, वंश जैन, जय कुमार, जिनेंद्र जैन, ब्रजपाल, हंस कुमार, दीपक जैन, अंजली, रुचि जैन आदि रहे।
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जैन संत अरुण मुनि ने कहा पर्यूषण पर्व का मतलब सभी कषायों को शांत करना और आत्मा के गुणों को अस्तित्व से जोड़ना है।
वे मंगलवार को पर्यूषण पर्व के चौथे दिन जैन स्थानक नया बाजार में धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा इस पर्व में देव, गुरू, धर्म ज्ञान और चरित्र से अपने आप को जोड़ा जाता है। अपनी आत्मा को निरंतर पाक शाक रखना ही पर्यूषण पर्व का मुख्य लक्ष्य है। इसलिए इस महा पर्व को लाजवाब कहा जाता है। इस महा पर्व की शुरूआत क्षमा से की जाती है। उन्होंने कहा केवल अपने भाव शुद्ध रखने से ही मनुष्य बड़े-बड़े गौत्र का बंध कर लेता है। मनुष्य जीवन में भाव की विशेष महत्ता है। हर समय कर्म कांड में, बुरे कार्यों में लीन रहने वाला व्यक्ति अपने भाव शुद्ध करके संसार सागर को पार कर जाता है। हर समय धर्म ध्यान में लगे रहने वाला, बड़ी-बड़ी तपस्या करने वाला व्यक्ति अपने भाव गंदे रखकर सभी करे कराए को खो देता है और नीच गौत्र का बंध करता है। पाप कर्म करने वाले कभी जैन नहीं हो सकते। अमन चैन से निरपराध जीवन जीने वाले ही जैन कहलाने के अधिकारी होते हैं। इसमें अनुज जैन, सतेंद्र जैन, कालू, ऋषभ जैन, वंश जैन, जय कुमार, जिनेंद्र जैन, ब्रजपाल, हंस कुमार, दीपक जैन, अंजली, रुचि जैन आदि रहे।