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क्या दौर था, जब नहीं पीते थे प्रत्याशी का पानी
Updated Thu, 23 Nov 2017 01:22 AM IST
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बागपत। पिछले करीब दो दशक में हुए बदलाव से चुनाव भी अछूता नही रहा है। बुजुर्गों का कहना हैं कि चुनावी हवा पूरी तरह बदल चुकी है। पहले चुनाव भाईचारे से लड़े जाते थे और वर्तमान में पक्षपात और जातिवाद का चुनाव रह गया है। भाईचारे की डोर कमजोर हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह है चुनाव में धनबल का बढ़ना। आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के लोग चुनाव से दूरी बनाकर रखते हैं।
ठाकुरद्वारा मोहल्ले के रहने वाले बाबूराम शर्मा कहते हैं कि वर्तमान समय में चुनाव सिर्फ जातिवाद और पक्षपात का चुनाव है। पहले सब एकजुट होकर चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारते थे। अब एक ही वार्ड से छह से आठ तक उम्मीदवार पर्चा भर देते हैं। यह बेहद गलत परंपरा है।
देशराज मोहल्ले के रहने वाले चेतराम कहते हैं चुनाव में आपसी मतभेद और मनमुटाव बहुत बढ़ गया है। पहले लोग प्रत्याशी का पानी भी नही पीते थे, बल्कि अपने पास से उनकी मदद भी करते थे। अब तो सब उलटा पुलटा हो गया है।
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शहर निवासी ओमप्रकाश ने कहा मौजूदा समय में चुनाव आम आदमी का चुनाव नहीं रह गया है। चुनाव सिर्फ रुपये से ही लड़ा जा सकता है। वोटरों को लुभाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
पुराना कस्बा के हरपाल सिंह ने कहा पहले चुनाव एकता का प्रतीक था और आज के समय में कोई भी एकजुट होकर काम नहीं करना चाहता। आज के समय में अपने को ही नीचा दिखाने में लगे रहते हैं, मनमुटाव बहुत बढ़ गया है। चुनावी हवा पूरी तरह बदल चुकी है।
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ठाकुरद्वारा मोहल्ले के रहने वाले बाबूराम शर्मा कहते हैं कि वर्तमान समय में चुनाव सिर्फ जातिवाद और पक्षपात का चुनाव है। पहले सब एकजुट होकर चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारते थे। अब एक ही वार्ड से छह से आठ तक उम्मीदवार पर्चा भर देते हैं। यह बेहद गलत परंपरा है।
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देशराज मोहल्ले के रहने वाले चेतराम कहते हैं चुनाव में आपसी मतभेद और मनमुटाव बहुत बढ़ गया है। पहले लोग प्रत्याशी का पानी भी नही पीते थे, बल्कि अपने पास से उनकी मदद भी करते थे। अब तो सब उलटा पुलटा हो गया है।
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शहर निवासी ओमप्रकाश ने कहा मौजूदा समय में चुनाव आम आदमी का चुनाव नहीं रह गया है। चुनाव सिर्फ रुपये से ही लड़ा जा सकता है। वोटरों को लुभाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
पुराना कस्बा के हरपाल सिंह ने कहा पहले चुनाव एकता का प्रतीक था और आज के समय में कोई भी एकजुट होकर काम नहीं करना चाहता। आज के समय में अपने को ही नीचा दिखाने में लगे रहते हैं, मनमुटाव बहुत बढ़ गया है। चुनावी हवा पूरी तरह बदल चुकी है।