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सत्य बोलने वाले की हमेशा विजय होती है- अरूण मुनि
Updated Sun, 30 Jul 2017 12:39 AM IST
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सत्य बोलने वाले की हमेशा विजय होती है : अरुण मुनि
बड़ौत(बागपत)। जैन संत अरुण मुनि ने कहा कि सत्य बोलने वाला सदा ऊंचा सिंहासन पाता है। जबकि, झूठ बोलने वाला नीच गति में जाता है।
उन्होंने जैन स्थानक नया बाजार में आयोजित धर्मसभा में बोलते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में पाप और पुण्य कर्म जीवात्मा को कटपुतली की तरह नचाते हैं। पाप की पहचान जिसे हो जाती है वह मनुष्य ही सगा और दगा का अंतर जान लेता है। मनुष्य अपने जीवन में चार प्रकार की यात्रा करता है। पहली पद यात्रा, दूसरी शब्द यात्रा, तीसरी अर्थ यात्रा और चौथी भाव यात्रा होती है। जब गुरु दर्शन करते हैं, उसे पद यात्रा करते है। जिनवाणी को सुनना शब्द यात्रा तथा सही व गलत की पहचान करने से अर्थ यात्रा होती है। इनसे भी बड़ी व कठिन यात्रा है भाव यात्रा। पाप के प्रति निंदा करना व पाप कर्म से ग्लानि करना ही सामायिक कहलाता है। जंगल में कोई छोटा बच्चा यदि खो जाए तो उसका मिलना कठिन होता है, मगर भाव यात्रा करते करते यदि मन भटक जाए तो निंदामि, गरहामि कहने से भटका हुआ मन अपनी लाइन पर आ सकता है। यदि कोई पाप अज्ञानता में हो जाता है तो उसके बारे में विचार करो कि यह पाप मेरे द्वारा क्यों हो गया है। जिस जीव की भाव यात्रा होती है, उसे भव यात्रा व भय यात्रा पर पूर्ण विराम लगाना पड़ता है। बाहरी यात्रा तो सब करते है, अंदर की यात्रा करो। इसमें बाबू राम, भोपाल जैन, राजेश, कालू जैन, अनिल जैन, प्रवीण जैन, सुधीर जैन, गौरव जैन, हंस कुमार जैन, दीपक जैन, शैल बाला, इंद्राणी, कमलेश, पूनम, मोनिका, राकेश, रेखा, उर्मिला आदि उपस्थित रहे।
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बड़ौत(बागपत)। जैन संत अरुण मुनि ने कहा कि सत्य बोलने वाला सदा ऊंचा सिंहासन पाता है। जबकि, झूठ बोलने वाला नीच गति में जाता है।
उन्होंने जैन स्थानक नया बाजार में आयोजित धर्मसभा में बोलते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में पाप और पुण्य कर्म जीवात्मा को कटपुतली की तरह नचाते हैं। पाप की पहचान जिसे हो जाती है वह मनुष्य ही सगा और दगा का अंतर जान लेता है। मनुष्य अपने जीवन में चार प्रकार की यात्रा करता है। पहली पद यात्रा, दूसरी शब्द यात्रा, तीसरी अर्थ यात्रा और चौथी भाव यात्रा होती है। जब गुरु दर्शन करते हैं, उसे पद यात्रा करते है। जिनवाणी को सुनना शब्द यात्रा तथा सही व गलत की पहचान करने से अर्थ यात्रा होती है। इनसे भी बड़ी व कठिन यात्रा है भाव यात्रा। पाप के प्रति निंदा करना व पाप कर्म से ग्लानि करना ही सामायिक कहलाता है। जंगल में कोई छोटा बच्चा यदि खो जाए तो उसका मिलना कठिन होता है, मगर भाव यात्रा करते करते यदि मन भटक जाए तो निंदामि, गरहामि कहने से भटका हुआ मन अपनी लाइन पर आ सकता है। यदि कोई पाप अज्ञानता में हो जाता है तो उसके बारे में विचार करो कि यह पाप मेरे द्वारा क्यों हो गया है। जिस जीव की भाव यात्रा होती है, उसे भव यात्रा व भय यात्रा पर पूर्ण विराम लगाना पड़ता है। बाहरी यात्रा तो सब करते है, अंदर की यात्रा करो। इसमें बाबू राम, भोपाल जैन, राजेश, कालू जैन, अनिल जैन, प्रवीण जैन, सुधीर जैन, गौरव जैन, हंस कुमार जैन, दीपक जैन, शैल बाला, इंद्राणी, कमलेश, पूनम, मोनिका, राकेश, रेखा, उर्मिला आदि उपस्थित रहे।