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1857 की क्रांति के शहीदों को श्रद्धासुमन किए अर्पित
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बागपत। रालोद कार्यालय में 1857 की क्रांति के शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि भारत को आजादी भले ही 1947 में मिली, लेकिन संघर्ष लगभग 100 वर्ष पूर्व आरंभ हो चुका था। वास्तव में 1857 की क्रांति का स्वर्णिम इतिहास ही कालांतर में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणादायी बना था। देश के कुछ स्वार्थी लोगों ने अंग्रेजों से मिलकर क्रांति को असफल किया। केंद्र में अंग्रेजों की सत्ता को हिलाने के लिए कोई योजनाबद्ध नीति नहीं थी। सेना, गरीब, मजदूर के सीने में आजादी की ज्वाला धधक रही थी। 18 मई 1857 को बाबा शाहमल ने बड़ौत तहसील पर कब्जा किया। दस मई 1857 को जंग-ए-आजादी की शुरूआत होने के दो दिन बाद 12 मई 1857 को बाबा शाहमल के नेतृत्व में जाति, बिरादरी के बंधनों को तोड़कर हजारों की संख्या में बड़ौत तहसील पर हमला बोल दिया था।
ओमबीर ढाका ने कहा कि अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मदद के लिए अंग्रेजों का लूटा धन भिजवाया था। बादशाह जफर ने समस्त खाप से धन भेजने की अपील की थी। आजादी के लिए लाखों क्रांति वीरों ने अपने लहू की आहुति दी। इसमें चौधरी चमन सिंह, कंवर पाल हुड्डा, कलीम, ब्रिजेश, अनिरुद्ध शर्मा, विक्रांत पांचाल, अमित गुर्जर, राकेश, योगेंद्र मौजूद आदि रहे।
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ओमबीर ढाका ने कहा कि अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मदद के लिए अंग्रेजों का लूटा धन भिजवाया था। बादशाह जफर ने समस्त खाप से धन भेजने की अपील की थी। आजादी के लिए लाखों क्रांति वीरों ने अपने लहू की आहुति दी। इसमें चौधरी चमन सिंह, कंवर पाल हुड्डा, कलीम, ब्रिजेश, अनिरुद्ध शर्मा, विक्रांत पांचाल, अमित गुर्जर, राकेश, योगेंद्र मौजूद आदि रहे।
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