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अब पहले जैसी होली कहां... होली पर निकालते हैं रंजिश
Updated Fri, 02 Mar 2018 12:32 AM IST
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बड़ौत (बागपत)।
अब पहले जैसी होली कहां बेटे, अब तो लोग पुरानी रंजिश निकालने के लिए होली के त्योहार को शुभ मानते हैं। पहले आपसी भाईचारे के साथ लोग धूमधाम से होली मनाते थे। रंग लगाने पर कोई बुरा भी नहीं मानता था। अब तो लोग जरा सी बात पर खून बहाने पर उतारू हो जाते हैं।
गूूंगा खेड़ी गांव के बुजुर्ग महिपाल ने कहा पहले होली लोग एक-दूसरे के साथ धूमधाम से मनाते थे। गांव की महिलाओं से लेकर बच्चों तक घर-घर जाकर एक-दूसरे को रंग लगाते थे, लेकिन अब माहौल बदल गया है। अब पहले जैसी बात कहां है। प्रधान संजीव कुमार ने कहा होली को देखते हुए एक माह पहले बसंत रखा जाता था और होली के 15 दिन पहले महिलाएं होली के गीत गाना शुरू कर देती थी। गांव के लोग हर्षोल्लास के साथ होली खेलते थे, लेकिन अब तो पुरानी रंजिश के लिए होली को शुभ माना जाता है, यदि कोई रंग लगा देता है तो उसके साथ झगड़ा शुरू कर दिया जाता है। अब तो पर्व मात्र औपचारिकता का रह गया है। बड़ौली गांव निवासी बुजुर्ग महिला सुरेश देवी ने कहा पहले के समय में घर-घर जाकर भाभी-देवरानी-जेठानी व अन्य महिलाएं खूब होली खेला करती थी, अब समय बदल गया है, बस सब कुछ मतलब का रह गया है। बुजुर्ग वीर सैन ने कहा होली पहले कीचड़, गोबर या फिर साधारण रंगों से खेला जाता था, लेकिन अब ये सभी परंपरा खत्म हो चुकी है। पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष दिगंबर जैन डिग्री कॉलेज राहुल कुमार और ग्राम प्रधान बासौली कुलदीप ने कहा युवा अब इंटरनेट व कंप्यूटर का आदी बन चुका है। होली, दीपावली आदि पर्वों को मात्र खानापूर्ति के लिए मनाया जाता है। होली जैसी महान पर्व पर युवा शराब पीता है। उन्होंने युवाओं से होली शांतिपूर्ण ढंग से मनाने की अपील की।
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अब पहले जैसी होली कहां बेटे, अब तो लोग पुरानी रंजिश निकालने के लिए होली के त्योहार को शुभ मानते हैं। पहले आपसी भाईचारे के साथ लोग धूमधाम से होली मनाते थे। रंग लगाने पर कोई बुरा भी नहीं मानता था। अब तो लोग जरा सी बात पर खून बहाने पर उतारू हो जाते हैं।
गूूंगा खेड़ी गांव के बुजुर्ग महिपाल ने कहा पहले होली लोग एक-दूसरे के साथ धूमधाम से मनाते थे। गांव की महिलाओं से लेकर बच्चों तक घर-घर जाकर एक-दूसरे को रंग लगाते थे, लेकिन अब माहौल बदल गया है। अब पहले जैसी बात कहां है। प्रधान संजीव कुमार ने कहा होली को देखते हुए एक माह पहले बसंत रखा जाता था और होली के 15 दिन पहले महिलाएं होली के गीत गाना शुरू कर देती थी। गांव के लोग हर्षोल्लास के साथ होली खेलते थे, लेकिन अब तो पुरानी रंजिश के लिए होली को शुभ माना जाता है, यदि कोई रंग लगा देता है तो उसके साथ झगड़ा शुरू कर दिया जाता है। अब तो पर्व मात्र औपचारिकता का रह गया है। बड़ौली गांव निवासी बुजुर्ग महिला सुरेश देवी ने कहा पहले के समय में घर-घर जाकर भाभी-देवरानी-जेठानी व अन्य महिलाएं खूब होली खेला करती थी, अब समय बदल गया है, बस सब कुछ मतलब का रह गया है। बुजुर्ग वीर सैन ने कहा होली पहले कीचड़, गोबर या फिर साधारण रंगों से खेला जाता था, लेकिन अब ये सभी परंपरा खत्म हो चुकी है। पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष दिगंबर जैन डिग्री कॉलेज राहुल कुमार और ग्राम प्रधान बासौली कुलदीप ने कहा युवा अब इंटरनेट व कंप्यूटर का आदी बन चुका है। होली, दीपावली आदि पर्वों को मात्र खानापूर्ति के लिए मनाया जाता है। होली जैसी महान पर्व पर युवा शराब पीता है। उन्होंने युवाओं से होली शांतिपूर्ण ढंग से मनाने की अपील की।
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