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जमीन का अभाव, स्थानांतरित नहीं हुई चर्म शोधन इकाईयां
Updated Mon, 16 Apr 2018 01:24 AM IST
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दोघट (बागपत)। भड़ल गांव में संचालित चमड़ा शोधन इकाइयां पर्याप्त जमीन नहीं मिलने के कारण स्थानांतरण नहीं हो पाई हैं। जबकि उक्त इकाइयों से निकलने वाला दूषित पानी ग्रामीणों को बीमारियां बांट रहा है। संचालकों का कहना है कि एक इकाई के लिए कम से कम दो सौ मीटर जगह चाहिए। सरकार की तरफ से अभी तक इकाइयां बंद करने या स्थानांतरण करने के लिए कोई आदेश नहीं आया है।
भड़ल गांव में 97 चरम शोधन इकाइयां संचालित हैं। पिछले वर्ष गांव से दूर ग्राम समाज ने इकाइयों के लिए भूमि आवंटित की । तत्कालीन डीएम ने इकाइयों को स्थानांतरण करने के आदेश भी दिए, लेकिन आज तक भी इकाइयां स्थानांतरित नहीं हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि बीमारियां फैल रही है। उधर, इकाई संचालक अनिल और राज कुमार ने कहना है कि ग्राम समाज द्वारा आवंटित की दो हजार वर्ग मीटर भूमि में मात्र नौ इकाइयां ही संचालित हो सकती है। 97 इकाइयों को संचालित करने के लिए कम से कम 50 बीघा जमीन चाहिए। पानी निकासी के लिए कोई तालाब नहीं है। ट्रक जाने के लिए रास्ता नहीं है। सरकार को 12 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ता है। इन इकाइयों से सरकार को बड़ा लाभ होता है। टीकम कुमार, मदन कुमार, चतर सैन, बिट्टू, रमेश, जगपाल, कल्लू, बिंदर, सुंदर, नरेश का कहना है कि पर्याप्त भूमि मिल जाए तो इकाइयों को स्थानांतरित कर देंगे।
आसपास के जिलों में सप्लाई होता है चमड़ा
दोघट। भड़ल में चमड़ा शोधन इकाइयों पर हापुड़, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, दिल्ली से कच्चा माल आता है। मजदूर कच्चे चमड़े की सफाई व धुलाई कर तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया को पूरा करने में चार दिन जगते हैं। चमड़े को सुखाने के लिए ही तीन बीघा जमीन चाहिए। इसके बाद माल को पैकिंग कर बाजार में सप्लाई किया जाता है।
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कई बार हो चुकी हैं पंचायतें
दोघट। भड़ल गांव में चमड़ा शोधन इकाइयों को स्थानांतरण करने के लिए ग्रामीण व इकाई संचालक कई बार आमने-सामने हो चुके हैं। पिछले साल गांव में कई बार पंचायतें हुई। फिर से ग्रामीणों में भी आक्रोश पनप रहा है।
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भड़ल गांव में 97 चरम शोधन इकाइयां संचालित हैं। पिछले वर्ष गांव से दूर ग्राम समाज ने इकाइयों के लिए भूमि आवंटित की । तत्कालीन डीएम ने इकाइयों को स्थानांतरण करने के आदेश भी दिए, लेकिन आज तक भी इकाइयां स्थानांतरित नहीं हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि बीमारियां फैल रही है। उधर, इकाई संचालक अनिल और राज कुमार ने कहना है कि ग्राम समाज द्वारा आवंटित की दो हजार वर्ग मीटर भूमि में मात्र नौ इकाइयां ही संचालित हो सकती है। 97 इकाइयों को संचालित करने के लिए कम से कम 50 बीघा जमीन चाहिए। पानी निकासी के लिए कोई तालाब नहीं है। ट्रक जाने के लिए रास्ता नहीं है। सरकार को 12 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ता है। इन इकाइयों से सरकार को बड़ा लाभ होता है। टीकम कुमार, मदन कुमार, चतर सैन, बिट्टू, रमेश, जगपाल, कल्लू, बिंदर, सुंदर, नरेश का कहना है कि पर्याप्त भूमि मिल जाए तो इकाइयों को स्थानांतरित कर देंगे।
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आसपास के जिलों में सप्लाई होता है चमड़ा
दोघट। भड़ल में चमड़ा शोधन इकाइयों पर हापुड़, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, दिल्ली से कच्चा माल आता है। मजदूर कच्चे चमड़े की सफाई व धुलाई कर तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया को पूरा करने में चार दिन जगते हैं। चमड़े को सुखाने के लिए ही तीन बीघा जमीन चाहिए। इसके बाद माल को पैकिंग कर बाजार में सप्लाई किया जाता है।
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कई बार हो चुकी हैं पंचायतें
दोघट। भड़ल गांव में चमड़ा शोधन इकाइयों को स्थानांतरण करने के लिए ग्रामीण व इकाई संचालक कई बार आमने-सामने हो चुके हैं। पिछले साल गांव में कई बार पंचायतें हुई। फिर से ग्रामीणों में भी आक्रोश पनप रहा है।