{"_id":"5a0dea914f1c1bce408b73d2","slug":"101510861457-baghpat-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब कैसा चुनाव, शराब बांटने लगे हैं प्रत्याशी?","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अब कैसा चुनाव, शराब बांटने लगे हैं प्रत्याशी?
Updated Fri, 17 Nov 2017 01:14 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बागपत। पहले प्रत्याशी की ईमानदारी और उसके व्यवहार को देखकर वोट दिए जाते थे। नये दौर में जातिवाद पर चुनाव लड़े जा रहे हैं। भाईचारा खत्म हो रहा है, युवाओं को नशा परोसा जा रहा है। पहले का चुनाव बहुत अच्छा था, अब की राजनीति पूरी तरह भ्रष्टाचार की दिखती है। उम्मीदवार 50-50 लाख रुपये खर्च कर रहे हैं। जीत के बाद विकास पर कम खर्च होता है।
शहर की गली नंबर चार निवासी शिवकुमार शर्मा बताते हैं कि पहले चुनाव का कोई हल्ला-गुल्ला नहीं होता था। प्रत्याशी एक बार अपने पक्ष में मतदान की अपील करते थे। योग्यता और ईमानदार छवि को देखकर वोट दिए थे।
टटीरी के रहने वाले शिवकुमार प्रजापति ने बताया कि वोटों की राजनीति में जाति का जहर खोला जा रहा है। आदमी की योग्यता को दरकिनार कर धनबल ने क्षेत्र को जकड़ लिया है। पहले चुनाव शांति प्रिय होते थे। समाज का झुकाव जिस ओर होता था, जनता का समर्थन उसे मिलता था।
विज्ञापन
स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त राम लाल बताते हैं कि उनके जमाने में इतना शोरगुल नहीं हुआ। सादगी के साथ मतदान करते थे। जातिवाद का कोई मतलब नहीं था। आदमी की अच्छाई को परखा जाता था। अब तो वोट डालने को ही मन नहीं करता है। चुनाव में युवा पीढ़ी को भटका दिया जाता है।
पुराना कस्बा निवासी हाजी शमसूद्दीन बताते हैं कि योग्य व्यक्ति को हमेशा वोट दिया है। कभी जाति नहीं देखी। पहले वोटरों को लुटाने के लिए शराब का चलन नहीं था, अब इसका स्तर बढ़ रहा है। युवा वोटरों को शराब के चलने को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।
विज्ञापन
शहर की गली नंबर चार निवासी शिवकुमार शर्मा बताते हैं कि पहले चुनाव का कोई हल्ला-गुल्ला नहीं होता था। प्रत्याशी एक बार अपने पक्ष में मतदान की अपील करते थे। योग्यता और ईमानदार छवि को देखकर वोट दिए थे।
विज्ञापन
टटीरी के रहने वाले शिवकुमार प्रजापति ने बताया कि वोटों की राजनीति में जाति का जहर खोला जा रहा है। आदमी की योग्यता को दरकिनार कर धनबल ने क्षेत्र को जकड़ लिया है। पहले चुनाव शांति प्रिय होते थे। समाज का झुकाव जिस ओर होता था, जनता का समर्थन उसे मिलता था।
विज्ञापन
स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त राम लाल बताते हैं कि उनके जमाने में इतना शोरगुल नहीं हुआ। सादगी के साथ मतदान करते थे। जातिवाद का कोई मतलब नहीं था। आदमी की अच्छाई को परखा जाता था। अब तो वोट डालने को ही मन नहीं करता है। चुनाव में युवा पीढ़ी को भटका दिया जाता है।
पुराना कस्बा निवासी हाजी शमसूद्दीन बताते हैं कि योग्य व्यक्ति को हमेशा वोट दिया है। कभी जाति नहीं देखी। पहले वोटरों को लुटाने के लिए शराब का चलन नहीं था, अब इसका स्तर बढ़ रहा है। युवा वोटरों को शराब के चलने को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।