{"_id":"5f00bd558ebc3e43046b4164","slug":"there-will-be-no-event-in-the-monasteries-and-gurudwaras-on-guru-purnima-azamgarh-news-vns5339797149","type":"story","status":"publish","title_hn":"गुरु पूर्णिमा पर मठों और गुरुद्वारों में नहीं होगा कोई आयोजन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गुरु पूर्णिमा पर मठों और गुरुद्वारों में नहीं होगा कोई आयोजन
विज्ञापन
आजमगढ़। गुरु पूर्णिमा यानि गुरु पूजा का दिन। इस दिन विद्यालयों, मठों और गुरुद्वारों आदि में कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। लेकिन इस बार कोरोना महामारी को देखते हुए कार्यक्रमों का आयोजन नहीं किया जाएगा। ना ही कोई भक्त मठ और गुरुद्वारे के अंदर प्रवेश कर सकेगा।
रविवार को गुरु पूर्णिमा का त्योहार है। इस पर्व पर अपने गुरु के प्रति आस्था को प्रगट किया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि पर गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन विधिवत रूप से गुरु पूजन किया जाता है। इसको व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन को चारों वेदों के रचयिता और महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना करने वाले वेद व्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन पर अपने गुरुओं और बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है। गुरु पूर्णिमा पर गुरु का पूजन करने की परंपरा है। महर्षि वेद व्सास की जयंती पर इस पर्व को मनाया जाता है। चारों वेदों, 18 पुराणों, महाभारत के रचयिता और कई अन्य ग्रंथों के रचनाकार का श्रेय महर्षि वेद व्यास को दिया जाता है। वेदों का विभाजन करने के कारण इनका नाम वेद व्यास पड़ा। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरुओं की पूजा और उनका सम्मान करते हुए उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। हर वर्ष इस दिन मठों, गुरुद्वारों और विद्यालयों में गुरु पूजा का आयोजन किया जाता है। इसके बाद लोगों में प्रसाद का वितरण किया जाता है। लेकिन इस बार कोरोना काल में मठों और गुरुद्वारे में इसका आयोजन नहीं होगा। जबकि कोरोना महामारी के कारण विद्यालय पहले ही 31 जुलाई तक के लिए बंद हैं।
निजामाबाद नगर निजामाबाद में स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा चढ़ पादुका साहिब निजामाबाद में गुरू हरगोविंद की जयंती नहीं मनाई जाएगी। कोरोना महामारी के दौर में गुरुद्वारे में केवल अरदास व भजन कर गुरुद्वारे के ही सिख समुदाय के लोगों द्वारा गुरु पूर्णिमा का कार्य पूर्ण किया जाएगा। बाहर से कोई भी भक्त गुरुद्वारे में आज के दिन नहीं आएगा।
विज्ञापन
बाबा सतनाम सिंह, ग्रंथी गुरुद्वारा चरण पादुका साहिब निजामाबाद।
ना तो आज पहले वाले गुरु रहे और ना ही पहले की तरह शिष्य हैं। इसलिए आज के इस वर्तमान युग में गुरु की महत्ता तो है लेकिन पहले शिष्यों के मन में गुरुओं के प्रति जो सम्मान था वह आज कहीं दिखाई नहीं देता है। पहले जितनी मेहनत से गुरू अपने शिष्यों को शिक्षा देने में लगे रहते थे आज उनके अंदर भी वह भाव दिखाई नहीं देता है।
शशि भूषण प्रशांत, सेवानिवृत्त शिक्षक।
वैसे तो ज्यादातर विद्यालयों में इस परंपरा का निर्वहन नहीं होता है। लेकिन जिन विद्यालयों में होता भी है कोरोना काल में वह नहीं होगा। क्योंकि एक तो विद्यालय 31 जुलाई तक के लिए बंद हैं। दूसरे प्रशासन की ओर से इस तरह के कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी जाएगी। आज गुरु और शिष्य परंपरा में काफी बदलाव आया है। क्योंकि न तो पहले की तरह गुरु हैं और ना ही पहले की तरह के गुरु हैं।
जगदीश सिंह, पूर्व प्राचार्य।
एक समय था जब गुरु बिना लोभ और लालच के अपने शिक्षकों को हर विद्या में पारंगत करते थे। शिक्षा प्राप्त करने के बाद शिष्य गुरु को गुरुदक्षिणा देता था। लेकिन समय के साथ इसमें काफी बदलाव आया है। इसके लिए शिक्षक और शिष्य दोनो ही दोषी हैं। इसके लिए दोनों को विचार करने की जरूरत है। शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों को समझें और शिष्य अपने गुरु का सम्मान करें।
डा. गीता सिंह, हिंदी विभागाध्यक्ष डीएवी पीजी कालेज।
विज्ञापन
रविवार को गुरु पूर्णिमा का त्योहार है। इस पर्व पर अपने गुरु के प्रति आस्था को प्रगट किया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि पर गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन विधिवत रूप से गुरु पूजन किया जाता है। इसको व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन को चारों वेदों के रचयिता और महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना करने वाले वेद व्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन पर अपने गुरुओं और बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है। गुरु पूर्णिमा पर गुरु का पूजन करने की परंपरा है। महर्षि वेद व्सास की जयंती पर इस पर्व को मनाया जाता है। चारों वेदों, 18 पुराणों, महाभारत के रचयिता और कई अन्य ग्रंथों के रचनाकार का श्रेय महर्षि वेद व्यास को दिया जाता है। वेदों का विभाजन करने के कारण इनका नाम वेद व्यास पड़ा। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरुओं की पूजा और उनका सम्मान करते हुए उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। हर वर्ष इस दिन मठों, गुरुद्वारों और विद्यालयों में गुरु पूजा का आयोजन किया जाता है। इसके बाद लोगों में प्रसाद का वितरण किया जाता है। लेकिन इस बार कोरोना काल में मठों और गुरुद्वारे में इसका आयोजन नहीं होगा। जबकि कोरोना महामारी के कारण विद्यालय पहले ही 31 जुलाई तक के लिए बंद हैं।
विज्ञापन
निजामाबाद नगर निजामाबाद में स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा चढ़ पादुका साहिब निजामाबाद में गुरू हरगोविंद की जयंती नहीं मनाई जाएगी। कोरोना महामारी के दौर में गुरुद्वारे में केवल अरदास व भजन कर गुरुद्वारे के ही सिख समुदाय के लोगों द्वारा गुरु पूर्णिमा का कार्य पूर्ण किया जाएगा। बाहर से कोई भी भक्त गुरुद्वारे में आज के दिन नहीं आएगा।
विज्ञापन
बाबा सतनाम सिंह, ग्रंथी गुरुद्वारा चरण पादुका साहिब निजामाबाद।
ना तो आज पहले वाले गुरु रहे और ना ही पहले की तरह शिष्य हैं। इसलिए आज के इस वर्तमान युग में गुरु की महत्ता तो है लेकिन पहले शिष्यों के मन में गुरुओं के प्रति जो सम्मान था वह आज कहीं दिखाई नहीं देता है। पहले जितनी मेहनत से गुरू अपने शिष्यों को शिक्षा देने में लगे रहते थे आज उनके अंदर भी वह भाव दिखाई नहीं देता है।
शशि भूषण प्रशांत, सेवानिवृत्त शिक्षक।
वैसे तो ज्यादातर विद्यालयों में इस परंपरा का निर्वहन नहीं होता है। लेकिन जिन विद्यालयों में होता भी है कोरोना काल में वह नहीं होगा। क्योंकि एक तो विद्यालय 31 जुलाई तक के लिए बंद हैं। दूसरे प्रशासन की ओर से इस तरह के कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी जाएगी। आज गुरु और शिष्य परंपरा में काफी बदलाव आया है। क्योंकि न तो पहले की तरह गुरु हैं और ना ही पहले की तरह के गुरु हैं।
जगदीश सिंह, पूर्व प्राचार्य।
एक समय था जब गुरु बिना लोभ और लालच के अपने शिक्षकों को हर विद्या में पारंगत करते थे। शिक्षा प्राप्त करने के बाद शिष्य गुरु को गुरुदक्षिणा देता था। लेकिन समय के साथ इसमें काफी बदलाव आया है। इसके लिए शिक्षक और शिष्य दोनो ही दोषी हैं। इसके लिए दोनों को विचार करने की जरूरत है। शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों को समझें और शिष्य अपने गुरु का सम्मान करें।
डा. गीता सिंह, हिंदी विभागाध्यक्ष डीएवी पीजी कालेज।