{"_id":"6a76356f96a823aec9072c0a","slug":"the-clatter-of-handlooms-is-falling-silent-due-to-the-disrupted-balance-of-income-and-expenditure-azamgarh-news-c-258-1-svns1002-155052-2026-08-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Azamgarh News: आमदनी और खर्च के बिगड़े ताने-बाने से खामोश हो रहा हथकरघे का शोर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Azamgarh News: आमदनी और खर्च के बिगड़े ताने-बाने से खामोश हो रहा हथकरघे का शोर
विज्ञापन
कभी अपनी रेशमी साड़ियों के लिए देश-विदेश में पहचान रखने वाली मुबारकपुर की गलियों में सन्नाटा है। कभी हथकरघे के शोर से गुलजार रहने वाली गलियों में उदासी है। वहां के बुनकरों से बात हुई तो एक शब्दों में ही बोल दिया, अब हथकरघा तो चूल्हे में चला गया।
महंगाई के दौर में कपड़ा बुनाई से गुजारा मुश्किल होता देख नई पीढ़ी ने इससे किनारा कर लिया। ताउम्र कपड़ा बुनने में रमे रहे बुनकरों के घर वाले कहते हैं कि कहीं भी मजदूरी कर लेंगे, लेकिन कपड़ा नहीं बुनेंगे।
ऐसे में हथकरघे की लकड़ियां चूल्हे में रखी होती गईं। अब धीरे-धीरे रेशमी नगरी की खटर-पटर खामोश होती जा रही है। यह कसक रेशमी साड़ियों के कारोबार के कारण ‘मिनी सऊदी’ के नाम से पहचाने जाने वाले मुबारकपुर के उन तमाम बुजुर्गों में है, जिन्हें बुनकरी की कला विरासत में मिली थी।
विज्ञापन
बुनकर मो. फारुक, गुफरान, शमीम अख्तर व बदरे आलम का कहना है कि कभी पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था रेशमी साड़ियों के कारोबार पर निर्भर थी अब हालत यह है कि लकड़ी के हथकरघे धीरे-धीरे बंद हो गए। कई बुनकरों ने उन्हें ईंधन के रूप में जला दिया। रोजगार के अभाव में नई पीढ़ी भी इस पेशे से दूरी बना रही है।
00
बोले बुनकर-- -
एक रेशमी साड़ी तैयार करने में परिवार को चार से पांच दिन तक लगातार मेहनत करनी पड़ती है। इसके बदले महज 600 से 700 रुपये की मजदूरी मिलती है। इतनी आय में परिवार का भरण-पोषण, बच्चों की पढ़ाई और इलाज का खर्च उठाना बेहद कठिन हो गया है। इसी कारण नई पीढ़ी बुनकरी छोड़कर ई-रिक्शा चलाने, ठेला लगाने और अन्य रोजगार अपनाने को मजबूर है। -नौशाद अहमद, बुनकर मुबारकपुर।
00
पहले मुबारकपुर की मंडी में देशभर से व्यापारी आते थे और बुनकरों से सीधे साड़ियां खरीदते थे। इससे बुनकरों को उचित मूल्य मिलता था और स्थानीय स्तर पर हजारों लोगों को रोजगार मिलता था। साड़ी का व्यापार धीरे-धीरे वाराणसी की ओर केंद्रित होने के बाद मुबारकपुर के बुनकरों की स्थिति लगातार खराब होती गई। -हाजी जमाल अहमद, बुनकर मुबारकपुर।
00 वर्जन
मुबारकपुर में जो विपणन केंद्र है, उसे चालू करने के प्रयास में लगे हैं। वहीं सरकार की ओर से ओडीओपी के तहत मुबारकपुर की साड़ियों का चयन किया गया है। इसे बढ़ावा देने के लिए पूरा प्रयास किया जा रहा है, ताकि बुनकर इस काम को फिर से शुरू कर सकें। स्थानीय स्तर पर रेशमी नगर में वहीं पुरानी चहल-पहल हो। -सुधांशु सिन्हा, सहायक आयुक्त हथकरघा।
विज्ञापन
महंगाई के दौर में कपड़ा बुनाई से गुजारा मुश्किल होता देख नई पीढ़ी ने इससे किनारा कर लिया। ताउम्र कपड़ा बुनने में रमे रहे बुनकरों के घर वाले कहते हैं कि कहीं भी मजदूरी कर लेंगे, लेकिन कपड़ा नहीं बुनेंगे।
विज्ञापन
ऐसे में हथकरघे की लकड़ियां चूल्हे में रखी होती गईं। अब धीरे-धीरे रेशमी नगरी की खटर-पटर खामोश होती जा रही है। यह कसक रेशमी साड़ियों के कारोबार के कारण ‘मिनी सऊदी’ के नाम से पहचाने जाने वाले मुबारकपुर के उन तमाम बुजुर्गों में है, जिन्हें बुनकरी की कला विरासत में मिली थी।
विज्ञापन
बुनकर मो. फारुक, गुफरान, शमीम अख्तर व बदरे आलम का कहना है कि कभी पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था रेशमी साड़ियों के कारोबार पर निर्भर थी अब हालत यह है कि लकड़ी के हथकरघे धीरे-धीरे बंद हो गए। कई बुनकरों ने उन्हें ईंधन के रूप में जला दिया। रोजगार के अभाव में नई पीढ़ी भी इस पेशे से दूरी बना रही है।
00
बोले बुनकर
एक रेशमी साड़ी तैयार करने में परिवार को चार से पांच दिन तक लगातार मेहनत करनी पड़ती है। इसके बदले महज 600 से 700 रुपये की मजदूरी मिलती है। इतनी आय में परिवार का भरण-पोषण, बच्चों की पढ़ाई और इलाज का खर्च उठाना बेहद कठिन हो गया है। इसी कारण नई पीढ़ी बुनकरी छोड़कर ई-रिक्शा चलाने, ठेला लगाने और अन्य रोजगार अपनाने को मजबूर है। -नौशाद अहमद, बुनकर मुबारकपुर।
00
पहले मुबारकपुर की मंडी में देशभर से व्यापारी आते थे और बुनकरों से सीधे साड़ियां खरीदते थे। इससे बुनकरों को उचित मूल्य मिलता था और स्थानीय स्तर पर हजारों लोगों को रोजगार मिलता था। साड़ी का व्यापार धीरे-धीरे वाराणसी की ओर केंद्रित होने के बाद मुबारकपुर के बुनकरों की स्थिति लगातार खराब होती गई। -हाजी जमाल अहमद, बुनकर मुबारकपुर।
00 वर्जन
मुबारकपुर में जो विपणन केंद्र है, उसे चालू करने के प्रयास में लगे हैं। वहीं सरकार की ओर से ओडीओपी के तहत मुबारकपुर की साड़ियों का चयन किया गया है। इसे बढ़ावा देने के लिए पूरा प्रयास किया जा रहा है, ताकि बुनकर इस काम को फिर से शुरू कर सकें। स्थानीय स्तर पर रेशमी नगर में वहीं पुरानी चहल-पहल हो। -सुधांशु सिन्हा, सहायक आयुक्त हथकरघा।