राजनीतिक करियर को संजीवनी देने पहुंचे रमाकांत यादव, 16 साल बाद सपा में की है वापसी
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लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस जाने और इसके बाद भदोही में करारी हार का सामना करने वाले पूर्वांचल के बाहुबली पूर्व सांसद रमाकांत यादव के सपा में शामिल होने को उनके राजनीतिक करियर के लिए संजीवनी से कम नहीं माना जा रहा है। रमाकांत यादव के कांग्रेस में शामिल होने और भदोही से चुनाव हारने पर उनके राजनीतिक करियर को लेकर सवालिया निशान लगने लगे थे।
माना जा रहा है कि उनके सपा में शामिल होने से इस राजनीतिक करियर को नई दिशा मिलेगी। उनके समर्थकों में भी उत्साह का माहौल नजर आ रहा है।
पूर्व सांसद रमाकांत यादव का नाम पूर्वांचल के बाहुबली नेताओं में गिना जाता है। रमाकांत यादव चार बार सांसद और चार बार विधायक रह चुके हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा से टिकट नहीं मिला तो कांग्रेस में शामिल हो गए और भदोही से चुनाव लड़े, लेकिन करारी मात खानी पड़ी। इससे उनके राजनीतिक करियर पर सवालिया निशान लगने लगे थे।
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योगी आदित्यनाथ के करीबियों में होती थी गिनती
भाजपा में रमाकांत यादव का लाने का श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ही दिया जाता है। उनकी गिनती योगी आदित्यनाथ के करीबियों में होती थी। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद दोनों के रिश्तों में खटास आ गई थी। लोकसभा चुनाव से पहले रमाकांत ने उन्हें निशाने पर ले रखा था।
काफी कोशिशों के बाद मिली सफलता
पूर्व सांसद रमाकांत यादव ने सपा, बसपा, भाजपा सहित सभी प्रमुख दलों का सफर तय किया है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने बसपा और सपा में भी ठौर तलाशी थी। सपा के अबू आसिम आजमी उस समय भी पुरजोर तरीके से सक्रिय थे। लेकिन दोनों ही दलों ने उन्हें पार्टी में लेने से मना कर दिया था।
कैसे दूर होगी आपसी खाई?
लखनऊ में रमाकांत यादव के सपा में शामिल होने के समय मंच पर निर्वतमान जिलाध्यक्ष हवलदार यादव के साथ ही विधायक नफीस अहमद और डॉ. संग्राम सिंह यादव भी मौजूद रहे। सपा मुखिया ने उन्हें पार्टी में लेने से पहले ये दिखाने की पूरी तरीके से कोशिश की कि अपने गढ़ आजमगढ़ में सपा में पूरी तरीके से एका है। ये एका स्थायी है कि नहीं इसका पता आने वाले समय में चलेगा।
रमाकांत यादव सर्वाधिक समय समाजवादी पार्टी में रहे। सपा में उन्हें मुलायम सिंह यादव को बेहद करीबी माना जाता था। पहले अमर सिंह बाद में बलराम यादव और दुर्गा यादव जैसे वरिष्ठ सपा नेताओं से उनकी दूरी किसी से छिपी नहीं है। गुटबंदी के कारण ही उन्हें सपा से बाहर जाना पड़ा था। अब 16 साल बाद एक बार फिर रमाकांत यादव की पार्टी में वापसी हुई है। वापसी से जिले के राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलेंगे। सपा की राह भी कम मुश्किल नहीं होगी।