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दो हैंडलूम से बनाया 40 हैंडलूम और 15 पावरलूम
ब्यूरो अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Fri, 09 Oct 2015 12:13 AM IST
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अमर उजाला की पहल काफी सराहनीय है। इस पहल से और लोग भी प्रेरणा लेकर मुबारकपुर में बेपटरी हो चुके हैंडलूम के कारोबार को आगे बढ़ाने के बारे में सोचेंगे। यह कहना है एमएसएमई पुरस्कार के लिए चयनित मुबारकपुर कस्बे के मुहल्ला पुरानी बस्ती निवासी अहमद जिया अंसारी का।
अहमद जिया अंसारी ने बताया कि उनका यह पुश्तैनी धंधा है। उनके पिता जी दो हैंडलूम लगाकर कार्य करते थे। 2005 में उन्होंने पिता के पुश्तैनी धंधे को आगे बढ़ाने के बारे में सोचा। तब उन्होंने 10 हैंडलूम का एक कारखाना लगाया और इसमें बनने वाली साड़ियों को प्वाइनियर नाम दिया। धीरे-धीरे यह ब्रांड प्रसिद्घ हुआ आज उनके पास 40 हैंडलूम और 15 पावरलूम हैं।
आज वह अपने कारखाने में बुनकरों को रखकर कार्य कराते हैं। सालाना 25 से 30 लाख रुपये का टर्नओवर कर लेते हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी मार्केटिंग की होती है क्योंकि साड़ियों को बेचने का बाजार न होने के कारण जो ग्राहक आते हैं वह बनारस से ही खरीदारी कर वापस लौट जाते हैं। लेकिन कस्बे में बन रहे विपणन केंद्र से उन्हें बहुत उम्मीदें हैं। अहमद जिया को एक बात का मलाल है कि मुबारकपुर की साड़ियों में मेहनत उनकी होती है लेकिन नाम बनारस का होता है।
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क्योंकि यह साड़िया बिचौलियों के माध्यम से बनारस जाती हैं और बनारसी साड़ियों के नाम से वहां बिकती हैं। उसका जो फायदा मुबारकपुर के बुनकरों को मिलना चाहिए वह बिचौलिए ले जाते है। उन्होंने अमर उजाला के प्रयास की सराहना की और कहा कि इस तरह का प्रयास और लोगों को भी करना चाहिए ताकि जनपद की इस धरोहर की चमक को बरकरार रखा जा सके। उन्होंने कहा कि उन्हें मिलने वाले पुरस्कार से प्रेरणा लेकर और लोग भी इस धंधे को अपनाएंगे।
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अहमद जिया अंसारी ने बताया कि उनका यह पुश्तैनी धंधा है। उनके पिता जी दो हैंडलूम लगाकर कार्य करते थे। 2005 में उन्होंने पिता के पुश्तैनी धंधे को आगे बढ़ाने के बारे में सोचा। तब उन्होंने 10 हैंडलूम का एक कारखाना लगाया और इसमें बनने वाली साड़ियों को प्वाइनियर नाम दिया। धीरे-धीरे यह ब्रांड प्रसिद्घ हुआ आज उनके पास 40 हैंडलूम और 15 पावरलूम हैं।
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आज वह अपने कारखाने में बुनकरों को रखकर कार्य कराते हैं। सालाना 25 से 30 लाख रुपये का टर्नओवर कर लेते हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी मार्केटिंग की होती है क्योंकि साड़ियों को बेचने का बाजार न होने के कारण जो ग्राहक आते हैं वह बनारस से ही खरीदारी कर वापस लौट जाते हैं। लेकिन कस्बे में बन रहे विपणन केंद्र से उन्हें बहुत उम्मीदें हैं। अहमद जिया को एक बात का मलाल है कि मुबारकपुर की साड़ियों में मेहनत उनकी होती है लेकिन नाम बनारस का होता है।
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क्योंकि यह साड़िया बिचौलियों के माध्यम से बनारस जाती हैं और बनारसी साड़ियों के नाम से वहां बिकती हैं। उसका जो फायदा मुबारकपुर के बुनकरों को मिलना चाहिए वह बिचौलिए ले जाते है। उन्होंने अमर उजाला के प्रयास की सराहना की और कहा कि इस तरह का प्रयास और लोगों को भी करना चाहिए ताकि जनपद की इस धरोहर की चमक को बरकरार रखा जा सके। उन्होंने कहा कि उन्हें मिलने वाले पुरस्कार से प्रेरणा लेकर और लोग भी इस धंधे को अपनाएंगे।