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तीन स्कूल, कई गांव और हजारों बीघा भूमि कटान की भेंट

Mon, 21 Sep 2020 10:57 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 21 Sep 2020 10:57 PM IST
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सगड़ी के देवारा खास राजा कटान करती घाघरा। - फोटो : AZAMGARH
लाटघाट। जनपद की उत्तरी सीमा से होकर गुजरने वाली घाघरा नदी देवारावासियों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं है। यह नदी प्रतिवर्ष सबकुछ तबाह करने के बाद शांत हो जाती है। जनपद में पहली कटान 1970 में शुरू हुई। इसके बाद से प्रतिवर्ष कटान का सिलसिला जारी है। लोग एक जगह से उजड़कर दूसरी जगह बसते जा रहे हैं। परिणाम है कि अब तक दर्जनों गांव कटान की भेंट चढ़ चुके हैं। एक प्राइवेट विद्यालय सहित दो परिषदीय विद्यालयों का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। हजारों बीघा खेती योग्य भूमि को काटकर घाघरा अपने आगोश में ले चुकी है। 70 के दशक में सबसे पहला गांव चक्की हाजीपुर कटा था। उसके बाद 2004 और 2005 में भी कटान हुई। इस कटान से विस्थापित हुए लोग अस्पताल, बंधे के साथ ही सहनूपुर, खेतापुर और बरडीहा में जाकर बस गए। चक्की हाजीपुर में लगभग 500 बीघा खेती योग्य भूमि अब तक कट चुकी है। 1990 में उर्दिहा गांव कट गया और 1500 बीघा जमीन घाघरा में समाहित हो गई। आज भी 100 घर घाघरा नदी के पास और बाकी के लोग उर्दिहा नई बस्ती के नाम से बस गए है। इस दौरान गांव में स्थित एक प्राइवेट स्कूल भी कट गया था। 1990 में ही रोशनगंज कटा जिसमें 300 घर थे। 2500 बिगहा जमीन घाघरा में विलीन हो चुकी है। रोशनगंज में कटने के बाद लोग उल्टहवा, अराजी देवारा करखिया, आराजी अमानी, आराजी देवारा नैनीजोर, रौनापार, अंडाखोर में बस गए। देवारा खास राजा गांव में 2003 से अब तक 2000 बीघा जमीन कट चुकी है। 2003 में रमई का पुरवा, 2005 में मकरी का पुरवा, 2016 में मुरली का पुरवा , 2017 में त्रिलोकी का पुरवा, फिर 2019-20 में मुरारी, त्रिलोकी, भिमली का पुरवा कटता गया। 2004 और 2005 में हाजीपुर ठीकहिया, गांगेपुर, धुसवां में 200 घर कट गए और 1500 बीघा जमीन भी कटी। 2018 से 2020 तक सेमरी गांव में 200 बीघा जमीन घाघरा में समा गई। आराजी सेमरी, आराजी मल्लह पुरवा बस्ती कट चुकी है। प्राइमरी स्कूल सेमरी, जूनियर स्कूल बगहवा घाघरा में कट गए। 2020 में ही गांगेपुर रिंग बांध कटा वह भी एक नहीं दो कटे। 1000 बीघा खेती योग्य भूमि अब तक कट चुकी है। तीन अगस्त को जोकहरा रिंग बांध टूटा।
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