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चेहरे पर थकान लेकिन घर पहुंचने की ललक में बढ़ते जा रहे पग
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सूरत से ट्रेन से आजमगढ़ पहुंचे यात्री खुद ही निकल पड़े घरों के लिए।
- फोटो : AZAMGARH
मेजवां। फूलपुर और ग्रामीण इलाकों में लॉक डाउन के दौरान घर वापसी का सिलसिला जारी है कोई श्रमिक ट्रेन से ट्रक अथवा बाइक से वापस आ रहे हैं। हर श्रमिक यही चाह रहा है कि हम किसी भी दशा में अपने घर पहुंच जाएं जिससे कि सुकून मिल सके। रास्ते में काफी कठिनाई आई। रास्ते में कहीं कहीं लोगों ने बिस्किट फेंक कर दिया तो कहीं-कहीं स्वयं सेवी संस्थाओं ने भोजन कराया तो कुछ लोग अपनी मंजिल तक पहुंचने तक भूखे रह गए। श्रमिकों की परेशानी सुन हर कोई व्यक्ति की आंखें नम हो जा रही हैं। पैदल यात्रा कर जनपद पहुंचने वाले श्रमिकों के चेहरे पर थकान साफ दिख रही है लेकिन घर पहुंचने की ललक उनके थकान पर भारी पड़ रही है। श्रमिक इस विश्वास के साथ अपने थके और छाले पड़ चुके कदमों को रुकने नहीं दे रहे हैं कि घर पहुंचने के बाद सब ठीक हो जाएगा।
पैसे थे नहीं मकान मालिक मांग रहा था भाड़ा
लाटघाट। रौनापार थाना क्षेत्र के गुड़ियाना आराजी देवारा नैनीजोर गांव निवासी हरेंद्र कुमार नासिक नौ फरवरी को गए थे। यह वहां फर्नीचर का काम करता हैं। नाग चौक पंचवटी नासिक में एक माह सात दिन तक दिन रात काम किया। 54 हाजिरी लगी और लगभग 18,000 रुपये मिले। लाक डाउन के बाद इसी से काम चलने लगा। दवा, पानी, बिजली, मकान का किराया दिया। सब पैसे खर्च हो गए तो मकान मालिक अगले महीने का किराया मांगने लगा खाने को पैसे थे नहीं तो किराया कहा से देते। 10 मई को खोली छोड़कर पैदल ही द्वारका पहुंच गए। वहां से ट्रक पकड़ कर 3500 रुपये में गोरखपुर पहुंचे। वहां से पैदल घर के लिए चले। रास्ते में एक गिट्टी लदे ट्रक से 20 किमी चले फिर पैदल ही दोहरीघाट होते हुए घर पहुंचे।
पिता को फोन कर मंगाया पैसा और पहुंच गए घर
लाटघाट। रौनापार थाना क्षेत्र के बैदौली गांव निवासी भीम मुंबई में रहकर दिहाड़ी मजदूरी का काम करते थे। यह जनवरी में घर से गए हुए थे। इनके भाई वकील की पत्नी ममता भी साथ में थी। तीनों एक साथ खोली में रहते थे। बढ़िया काम चल रहा था। लेकिन लॉक डाउन ने सब कुछ बिगाड़ कर रख दिया। कमाई का पैसा जब खत्म होने लगा तो मकान का भाड़ा दे दिया। इसके बाद अपने पिता श्रवन को फोनकर के पैसे मंगवाए। पिता ने 3500 रुपये भेजे। इसके बाद भीम अपने भाई और उसकी पत्नी के साथ पैदल ही सात मई को निकल पड़े। इंदौर पहुंचने पर एक ट्रक चालक ने 2400 रुपये लेकर इन्हें झांसी पहुंचाया। झांसी से पैदल चलकर और रास्ते में आने वाले अन्य वाहनों का सहारा लेकर यह लोग पहले गोरखपुर और फिर अपने अपने घर पहुंचे।
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पैसे थे नहीं मकान मालिक मांग रहा था भाड़ा
लाटघाट। रौनापार थाना क्षेत्र के गुड़ियाना आराजी देवारा नैनीजोर गांव निवासी हरेंद्र कुमार नासिक नौ फरवरी को गए थे। यह वहां फर्नीचर का काम करता हैं। नाग चौक पंचवटी नासिक में एक माह सात दिन तक दिन रात काम किया। 54 हाजिरी लगी और लगभग 18,000 रुपये मिले। लाक डाउन के बाद इसी से काम चलने लगा। दवा, पानी, बिजली, मकान का किराया दिया। सब पैसे खर्च हो गए तो मकान मालिक अगले महीने का किराया मांगने लगा खाने को पैसे थे नहीं तो किराया कहा से देते। 10 मई को खोली छोड़कर पैदल ही द्वारका पहुंच गए। वहां से ट्रक पकड़ कर 3500 रुपये में गोरखपुर पहुंचे। वहां से पैदल घर के लिए चले। रास्ते में एक गिट्टी लदे ट्रक से 20 किमी चले फिर पैदल ही दोहरीघाट होते हुए घर पहुंचे।
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पिता को फोन कर मंगाया पैसा और पहुंच गए घर
लाटघाट। रौनापार थाना क्षेत्र के बैदौली गांव निवासी भीम मुंबई में रहकर दिहाड़ी मजदूरी का काम करते थे। यह जनवरी में घर से गए हुए थे। इनके भाई वकील की पत्नी ममता भी साथ में थी। तीनों एक साथ खोली में रहते थे। बढ़िया काम चल रहा था। लेकिन लॉक डाउन ने सब कुछ बिगाड़ कर रख दिया। कमाई का पैसा जब खत्म होने लगा तो मकान का भाड़ा दे दिया। इसके बाद अपने पिता श्रवन को फोनकर के पैसे मंगवाए। पिता ने 3500 रुपये भेजे। इसके बाद भीम अपने भाई और उसकी पत्नी के साथ पैदल ही सात मई को निकल पड़े। इंदौर पहुंचने पर एक ट्रक चालक ने 2400 रुपये लेकर इन्हें झांसी पहुंचाया। झांसी से पैदल चलकर और रास्ते में आने वाले अन्य वाहनों का सहारा लेकर यह लोग पहले गोरखपुर और फिर अपने अपने घर पहुंचे।
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