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बंदरों के आतंक से जाली वाली जेल में तब्दील हो रहे घर
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आजमगढ़। जनपद में बंदरों का आतंक बढ़ गया है। दुकान हो या मकान और मंदिर हो पार्क लगभग हर जगह बंदर कब्जा जमाए हैं। घरों में दाखिल होकर सामान आदि नष्ट कर दे रहे हैं। सड़कों पर बेखौफ घूम रहे बंदरों की दहशत इस कदर बढ़ गई है कि लोग अपने घरों में ही कैद होने लगे हैं। पूरे घर को जाली से कवर करा लिया है। खिड़की से लेकर दरवाजे और छत तक पर जाली, ग्रिल लगवाने को लाखों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। बंदरों के हमले भी लगातार बढ़ रहे हैं। जिससे लोगों की समस्याएं बढ़ गई है। शहर से लेकर गांव तक बंदरों का आतंक दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। उत्पाती बंदर दिनभर गलियों, मकान की छतों पर डेरा डाले रहते हैं। ऐसे में लोगों का गलियों में निकलना और मुश्किल हो रहा है। बदरका निवासी राहुल राय ने कहा कि बंदरों के आतंक से जनपदवासी परेशान हो रहे हैं। बावजूद इसके पालिका प्रशासन इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा। परानापुर निवासी पुनीत सिंह ने बताया कि बंदरों का आतंक इस कदर है कि छत पर जाने से भी डर लगता है। कई बार तो बंदर हमलावर हो जाते हैं। सिधारी की रहने वाली मनोरमा सिंह का कहना है कि उत्पाती बंदर छत पर सूखते कपड़े फाड़ने व खाने-पीने की सामग्री हाथों से झपटकर ले जाते हैं। सिधारी के रहने वाले विनय मिश्रा ने बताया कि बंदर का आतंक अधिक है। जिससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। इससे लोगों को काफी समस्याएं आती है। कई बार तो बंदर काट भी लेते हैं।
घरों पर जाली लगवाने पर लाखों का खर्च
90 प्रतिशत मकानों के खुले हिस्से, खिड़की दरवाजों को लोहे की जाली से बंद कर रखा है।
01 लाख रुपये तक खर्च कर खिड़की दरवाजों को बंद करवाना पड़ता है।
05 हजार रुपये टूटी हुई जाली को दुरुस्त करवाने में लगते हैं। अक्सर बंदरों के कूदने से जाली टूट भी जाती है।
डीएफओ गंगा दत्त मिश्रा ने बताया कि शहर के लोगों को बंदरों से निजात दिलाने के लिए काफी प्रयास किया गया है। कुछ साल पूर्व बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़े गए थे, फिर बंदर कहीं से आ गए हैं। बंदरों को पकड़ने के लिए शासन से कोई बजट नहीं मिला है। यदि बजट मिलेगा तो ही इस समस्या से निजात मिलेगी। विभाग इसके लिए प्रयास कर रहा है।
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घरों पर जाली लगवाने पर लाखों का खर्च
90 प्रतिशत मकानों के खुले हिस्से, खिड़की दरवाजों को लोहे की जाली से बंद कर रखा है।
01 लाख रुपये तक खर्च कर खिड़की दरवाजों को बंद करवाना पड़ता है।
05 हजार रुपये टूटी हुई जाली को दुरुस्त करवाने में लगते हैं। अक्सर बंदरों के कूदने से जाली टूट भी जाती है।
डीएफओ गंगा दत्त मिश्रा ने बताया कि शहर के लोगों को बंदरों से निजात दिलाने के लिए काफी प्रयास किया गया है। कुछ साल पूर्व बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़े गए थे, फिर बंदर कहीं से आ गए हैं। बंदरों को पकड़ने के लिए शासन से कोई बजट नहीं मिला है। यदि बजट मिलेगा तो ही इस समस्या से निजात मिलेगी। विभाग इसके लिए प्रयास कर रहा है।
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