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सही मायने में अब पिता की विरासत संभालेंगे अखिलेश
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आजमगढ़। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आजमगढ़ सदर से सिर्फ लोकसभा चुनाव जीतने की नहीं बल्कि कभी सपा-बसपा का गढ़ रहे पूरे पूर्वांचल को साधने की कोशिश करेंगे। पूर्वांचल में अपना गढ़ संभालने के लिए ही मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी सीट छोड़ आजमगढ़ से चुनाव लड़ा था। अब अखिलेश ने भी इसी मंशा से आजमगढ़ से उतरने का फैसला किया है।
वर्ष 2014 से पहले पूर्वांचल को सपा और बसपा का गढ़ माना जाता था। ज्यादातर सीटों पर लड़ाई सपा और बसपा के बीच सिमट कर गई थीं। आजमगढ़ जिले की दोनों सीटों पर ही यही हालत रही है। आजमगढ़ सदर सीट पर एक बार रमाकांत यादव को छोड़ दें तो दोनों सीटें सभी सपा तो कभी बसपा के कब्जे में रही हैं। 2014 में लालगंज सीट भाजपा के खाते में चली गई थी। मऊ की घोषी का भी यही हाल रहा है। यह भी सीट बसपा और सपा के कब्जे में थी। 2014 में भाजपा के पाले में चली गई। बलिया की बात करें तो 2014 से पहले यह सीट पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और सपा में शामिल हुए उनके पुत्र नीरज शेखर के कब्जे में रही है। 2014 में यहां भी भगवा लहराया। सलेमपुर लोकसभा सीट पर कभी सपा के हरिवंश सहाय तो कभी बसपा के रमाशंकर विद्यार्थी सांसद रहे। भाजपा ने यहां भी अपना परचम लहरा दिया था। गाजीपुर, जौनपुर, अंबेडकरनगर, देवरिया, भदोही, मिर्जापुर, चंदौली, बस्ती, महराजगंज की भी स्थिति भी कुछ ऐसी ही रही है।
2019 का लोकसभा चुनाव कई मायने में काफी महत्वपूर्ण है। वर्षों से विरोधी रहीं समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी में जहां गठबंधन हुआ है, तो वहीं प्रदेश की सत्ता से दूर होने के बाद सपा को नई संजीवनी की जरूरत है। जहां तक बसपा की बात है तो 2012 के विस चुनाव के बाद से ही सत्ता से दूर होने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी पूरी तरह से साफ हो गई थी। समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी दोनों के लिए आजमगढ़ के सात ही पूर्वांचल के अन्य जिले उपजाऊ साबित हुए हैं। वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में पूर्वांचल ने अखिलेश यादव को अपने सिर आंखों पर बिठाया था। इस चुनाव में सपा को जिले ने 9 विधायक दिए थे। एक सीट बसपा के पास गई थी। 2017 के विस चुनाव में भी सपा के पांच तो बसपा के चार विधायक चुने गए। इसके पूर्व हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ सीट से चुनाव लड़े और जीत दर्ज की। अब अखिलेश यादव ने अपने पिता की सही अर्थों में विरासत संभालने के उद्देश्य से आजमगढ़ सीट से चुनाव लडने का एलान किया है। आजमगढ़ सीट से चुनाव लड़ कर वह एक साथ कई निशाने साधेंगे। पूरे पूर्वांचल में समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी गठबंधन को नई संजीवनी मिलेगी।
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वर्ष 2014 से पहले पूर्वांचल को सपा और बसपा का गढ़ माना जाता था। ज्यादातर सीटों पर लड़ाई सपा और बसपा के बीच सिमट कर गई थीं। आजमगढ़ जिले की दोनों सीटों पर ही यही हालत रही है। आजमगढ़ सदर सीट पर एक बार रमाकांत यादव को छोड़ दें तो दोनों सीटें सभी सपा तो कभी बसपा के कब्जे में रही हैं। 2014 में लालगंज सीट भाजपा के खाते में चली गई थी। मऊ की घोषी का भी यही हाल रहा है। यह भी सीट बसपा और सपा के कब्जे में थी। 2014 में भाजपा के पाले में चली गई। बलिया की बात करें तो 2014 से पहले यह सीट पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और सपा में शामिल हुए उनके पुत्र नीरज शेखर के कब्जे में रही है। 2014 में यहां भी भगवा लहराया। सलेमपुर लोकसभा सीट पर कभी सपा के हरिवंश सहाय तो कभी बसपा के रमाशंकर विद्यार्थी सांसद रहे। भाजपा ने यहां भी अपना परचम लहरा दिया था। गाजीपुर, जौनपुर, अंबेडकरनगर, देवरिया, भदोही, मिर्जापुर, चंदौली, बस्ती, महराजगंज की भी स्थिति भी कुछ ऐसी ही रही है।
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2019 का लोकसभा चुनाव कई मायने में काफी महत्वपूर्ण है। वर्षों से विरोधी रहीं समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी में जहां गठबंधन हुआ है, तो वहीं प्रदेश की सत्ता से दूर होने के बाद सपा को नई संजीवनी की जरूरत है। जहां तक बसपा की बात है तो 2012 के विस चुनाव के बाद से ही सत्ता से दूर होने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी पूरी तरह से साफ हो गई थी। समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी दोनों के लिए आजमगढ़ के सात ही पूर्वांचल के अन्य जिले उपजाऊ साबित हुए हैं। वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में पूर्वांचल ने अखिलेश यादव को अपने सिर आंखों पर बिठाया था। इस चुनाव में सपा को जिले ने 9 विधायक दिए थे। एक सीट बसपा के पास गई थी। 2017 के विस चुनाव में भी सपा के पांच तो बसपा के चार विधायक चुने गए। इसके पूर्व हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ सीट से चुनाव लड़े और जीत दर्ज की। अब अखिलेश यादव ने अपने पिता की सही अर्थों में विरासत संभालने के उद्देश्य से आजमगढ़ सीट से चुनाव लडने का एलान किया है। आजमगढ़ सीट से चुनाव लड़ कर वह एक साथ कई निशाने साधेंगे। पूरे पूर्वांचल में समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी गठबंधन को नई संजीवनी मिलेगी।
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