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तीन दिन शेष, गंदगी से पटा है मेला स्थल
Updated Mon, 30 Oct 2017 11:18 PM IST
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अहरौला। पौराणिक दुर्वाषा धाम पर लगने वाले मेले को लेकर प्रशासन गंभीर नहीं है। मेले में तीन दिन शेष बचे हैं, लेकिन घाट से लेकर पूरा मेला स्थल गंदगी से पटा है। ये स्थिति तब है जब जिलाधिकारी अधिकारियों को साफ-सफाई और रेजयल व्यवस्था के निर्देश दे चुके हैं। इसके बाद भी तमसा-मंजूषा के संगम पर डुबकी लगाने वाले लाखों श्रद्धालुओं की मूलभूत सुविधाओं के लिए कोई प्रबंध नहीं किए जा रहे हैं।
पौराणिक स्थल तमसा-मंजूषा के पवित्र संगम पर स्थित दुर्वाषा धाम में कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला तीन दिवसीय मेला तीन नवंबर से शुरू हो जाएगा। एक सप्ताह पहले से ही मेला क्षेत्र में सर्कस, मौत का कुंआ, बच्चों के मनोरंजन के लिए झूला, खजला की दुकानें लगनी शुरू हो गई हैं। चार को कार्तिक पूर्णिमा का मुख्य स्नान होगा। पांच नवंबर को क्षेत्र और दूरदराज के लोग मेले में खरीदारी के लिए जुटते हैं। मेले के आयोजन में तीन-चार दिन ही बचे हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से अभी तैयारियां शुरू नहीं की गई है। तैयारियों के संबंध में जिलाधिकारी की ओर से मीटिंग लेकर सभी का कार्य भी समझा दिया गया है, लेकिन अधिकारियों की ओर से ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
लगभग तीन किलोमीटर क्षेत्र में मेला लगता है। मेला समिति के अध्यक्ष प्रेमगिरी ने बताया कि मेला क्षेत्र में कूड़े और कचरे का अंबार लगा है। नदी के घाटों पर भी भारी कचरा जमा है। दुर्गा पूजा और लक्ष्मी पूजा के बाद विसर्जित की गई प्रतिमाओं के अवशेष से घाट अटे पड़े हैं। इसकी सफाई की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मेला क्षेत्र में लगभग आधा दर्जन हैंडपंप खराब हैं। उसको भी नहीं ठीक कराया गया है।
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माता अनसूइया के आदेश पर बनाई थी तपोस्थली
अहरौला। माता अनसुइया के आदेश पर ऋषि दुर्वाषा ने तमसा-मंजूषा के संगम को अपनी तपोस्थली बनाई थी। ऋषि अत्रि और अनसुइया के तीन पुत्रों में सबसे बड़े ऋषि दुर्वाषा भगवान विष्णु के अंशावतार माने जाते हैं। क्रोध के लिए धर्म पुराणों में प्रसिद्ध हैं। माता अनसुइया से तपस्या के लिए उचित स्थान के लिए पूछा तो माता ने काशी और अयोध्या के बीच में स्थित तमसा-मंजूषा संगम को तपस्या के दिए उचित स्थान बताया। यहां ऋषि दुर्वाषा ने अपने 88 हजार शिष्यों के साथ तपस्या की थी। मान्यता है कि यहां कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के बाद पंचकोशी परिक्रमा करने पर पूर्ण फल मिलता है। यहां खुरासो, धर्मदासपुर, गौरी का पूरा, शंभूपुर, कल्होरा, फुलवरिया, फूलपुर आदि में पंचकोशी परिक्रमा होती है।
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पौराणिक स्थल तमसा-मंजूषा के पवित्र संगम पर स्थित दुर्वाषा धाम में कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला तीन दिवसीय मेला तीन नवंबर से शुरू हो जाएगा। एक सप्ताह पहले से ही मेला क्षेत्र में सर्कस, मौत का कुंआ, बच्चों के मनोरंजन के लिए झूला, खजला की दुकानें लगनी शुरू हो गई हैं। चार को कार्तिक पूर्णिमा का मुख्य स्नान होगा। पांच नवंबर को क्षेत्र और दूरदराज के लोग मेले में खरीदारी के लिए जुटते हैं। मेले के आयोजन में तीन-चार दिन ही बचे हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से अभी तैयारियां शुरू नहीं की गई है। तैयारियों के संबंध में जिलाधिकारी की ओर से मीटिंग लेकर सभी का कार्य भी समझा दिया गया है, लेकिन अधिकारियों की ओर से ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
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लगभग तीन किलोमीटर क्षेत्र में मेला लगता है। मेला समिति के अध्यक्ष प्रेमगिरी ने बताया कि मेला क्षेत्र में कूड़े और कचरे का अंबार लगा है। नदी के घाटों पर भी भारी कचरा जमा है। दुर्गा पूजा और लक्ष्मी पूजा के बाद विसर्जित की गई प्रतिमाओं के अवशेष से घाट अटे पड़े हैं। इसकी सफाई की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मेला क्षेत्र में लगभग आधा दर्जन हैंडपंप खराब हैं। उसको भी नहीं ठीक कराया गया है।
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माता अनसूइया के आदेश पर बनाई थी तपोस्थली
अहरौला। माता अनसुइया के आदेश पर ऋषि दुर्वाषा ने तमसा-मंजूषा के संगम को अपनी तपोस्थली बनाई थी। ऋषि अत्रि और अनसुइया के तीन पुत्रों में सबसे बड़े ऋषि दुर्वाषा भगवान विष्णु के अंशावतार माने जाते हैं। क्रोध के लिए धर्म पुराणों में प्रसिद्ध हैं। माता अनसुइया से तपस्या के लिए उचित स्थान के लिए पूछा तो माता ने काशी और अयोध्या के बीच में स्थित तमसा-मंजूषा संगम को तपस्या के दिए उचित स्थान बताया। यहां ऋषि दुर्वाषा ने अपने 88 हजार शिष्यों के साथ तपस्या की थी। मान्यता है कि यहां कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के बाद पंचकोशी परिक्रमा करने पर पूर्ण फल मिलता है। यहां खुरासो, धर्मदासपुर, गौरी का पूरा, शंभूपुर, कल्होरा, फुलवरिया, फूलपुर आदि में पंचकोशी परिक्रमा होती है।