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मंगल गीतों के बीच सीता और राम का विवाह संपन्न

Varanasi Bureau Updated Sun, 14 Oct 2018 12:25 AM IST
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आजमगढ़। नगर के पुरानी कोतवाली में चल रही श्री रामलीला में शनिवार की रात कलाकारों ने श्रीराम विवाह, कलेवा और सीता विदाई का जीवंत मंचन किया। सीता जी की विदाई देख दर्शकों की आंखें छलछला गई। वहीं दर्शकों द्वारा लगाए जा रहे जयकारों से वातावरण राममय हो गया था। श्रीरामलीला मंचन के क्रम में सीता स्वयंवर के बाद राजा जनक अपनी पुत्री सीता के विवाह की तैयारियों में जुट जाते हैं। जनकपुर को फूल-मालाओं से सजाया जाता है। बाद में विधि-विधान से श्रीराम और सीता जी का विवाह होता है। इस दौरान आकाश से देवी-देवता पुष्पों की वर्षा करते हैं। श्रीराम विवाह के दौरान विवाह गीतों की प्रस्तुति कर कलाकारों ने श्रद्धालुओं को खूब गुदगुदाया। इसके बाद समिति के कार्यकर्ताओं ने अयोध्या से आए बारातियों को स्वादिष्ट भोजन कराया। जिससे बाराती गदगद हो उठे। विवाह संपन्न होने पर कलाकारों ने सीता विदाई का मंचन किया। मंचन में जसमें राजा जनक अपनी पुत्री सीता जी की विदाई करते हैं और फूट-फूट कर रोते हैं। इस दृश्य को देख सभी के आंखों से आंसू छलक जाते हैं। रामलीला के दौरान बीच-बीच में जय श्रीराम के लगाए जा रहे गगनभेदी जयकारे से पूरा क्षेत्र राममय हो गया था। मेजवां प्रतिनिधि के अनुसार फूलपुर स्थित श्री रामलीला मैदान में आदर्श राम लीला समिति की ओर से चल रही राम लीला में अयोध्या से आये कलाकारों ने शुक्रवार को सीता स्वयंबर और लक्ष्मण-परशुराम संवाद का भावपूर्ण मंचन किया। प्रभु श्रीराम द्वारा शिव धनुष तोड़ते ही जय श्री राम के नारे लगे। मंच पर लक्ष्मण और परशुराम के बीच संवाद देख भाव विभोर हो गए। अंबारी प्रतिनिधि के अनुसार फ़ूलपुर तहसील के ओरिल बाजार के रामलीला में तीसरे दिन शुक्रवार की रात माता पिता भक्त श्रवण कथा का बड़े ही मनोहारी ढंग से प्रस्तुतिकरण किया गया। जिसमें श्रवण कुमार द्वारा अंधे माता-पिता को लेकर तीर्थयात्रा पर निकलना। दशरथ द्वारा चलाए गए शब्दभेदी बाण से घायल होना और दशरथ को श्राप देना आदि का मंचन किया गया। रामलीला में अशोक जायसवाल ने श्रवण, सियाराम गुप्त ने दशरथ के किरदार का भवपूर्ण मंचन किया। वहीं बोंगरिया में रासेपुर बाजार में चल रही रामलीला चौथे दिन शुक्रवार को ग्रामीण कलाकारों द्वारा धनुष यज्ञ रावण बाणासुर संवाद, लक्ष्मण परशुराम संवाद का मंचन किया गया। जिसमें सभी राजा बारी बारी से आकर शिव धनुष उठाने लगे लेकिन कोई भी धनुष को हिला ना सका। तभी रावण शिव धनुष को उठाने चलता है यह देख बाणासुर रावण को रोकता है दोनों में विवाद होता है। शिव धनुष के न टूटने पर राजा जनक निराश हो जाते हैं। गुरु आज्ञा से प्रभु राम शिव धनुष तोड़ते हैं। तभी वहां परशुराम पहुंचते हैं। उनकी लक्ष्मण से तीखी बहस होती है। बाद में वह भी राम को प्रणाम कर चले जाते हैं। सीता जी प्रभु राम के गले में वरमाला डालती हैं।
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