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मदरसा शिक्षक के बारे में गलत जानकारी देकर फंसा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग
Updated Tue, 06 Feb 2018 12:28 AM IST
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आजमगढ़। एक मदरसा शिक्षक के खिलाफ की गई शिकायत में जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी को उनकी ही दो-दो रिपोर्ट ने कठघरे में खड़े कर दिया है। एक जांच आख्या में शिक्षक को जहां नवंबर 1983 से वेतन जारी होना बताया गया है, वहीं दूसरे में मई 1984 से वेतन जारी करने की बात कही गई है। जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी इसे अब टाइपिंग मिस्टेक बता अपनी पीछा छुड़ा रहे हैं। जबकि उनकी इसी रिपोर्ट पर जिलाधिकारी की ओर से इसे शिकायत का निस्तारण किया जा चुका है। इससे शिकायतकर्ता अब जांच पर ही अंगुली उठा रहे हैं।
मुबारकपुर निवास आमिर फहीम ने जिलाधिकारी से शिकायत की थी कि मुबारकपुर के मदरसा बाबुल इल्म में सहायक अध्यापक तहतानियां ने 16 वर्ष 10 माह की उम्र में ही सहायक अध्यापक की नौकरी पा ली थी। इसलिए इनकी नियुक्ति अनियमित है। पूर्व में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से एक जनवरी 1993 को इनको जारी किए गए वेतन के रिकवरी के आदेश दिए थे। गत वर्ष अनुदानिक मदरसों की जांच के दौरान जिलाधिकारी की इसी रिपोर्ट पर इनका वेतन रजिस्ट्रार की ओर से रोक दिया गया था। 29 जनवरी को अपनी जांच अख्या में डीएमओ साहित्य निकस सिंह ने कहा कि अरमान अहमद खां को छह नवंबर 1983 से वेतन का भुगतान किया गया है। अरमान मदरसे में छह नवंबर 1981 से नौकरी कर रहे हैं। मदरसा नियुक्ति नियमावली 1987 में बनी थी। इसलिए इन पर आयु संबंधी प्रतिबंध लागू नहीं होता। मदरसा शिक्षा परिषद ने छह नवंबर 1983 से पहले इनके कार्य को बॉय सर्विस माना है। इसके बाद शिकायकर्ता की ओर से एक जनवारी को एक और शिकायत की गई, जिसमें अरमान अहमद के नौकरी के दौरान ही 1983 में एमपी इंटर कालेज से संस्थागत परीक्षा उर्तीण करने की बात कही गई। शिकायत पर दो जनवरी को दी गई जांच आख्या में डीएमओ ने कहा कि अरमान को चार मई 1984 को नियुक्ति पत्र जारी किया गया है। इसके पहले उन्हें वेतन का कोई भुगतान नहीं किया गया है। इससे 1983 में उनका रेगुलर इंटर करना गलत नहीं है। इसी जांच आख्या पर जिलाधिकारी की ओर से दोनों शिकायतों का निस्तारण कर दिया गया।
एक ही शिक्षक की शिकायत में दो-दो रिपोर्ट चर्चा की विषय बनी हुई हैं। इससे शिकायतकर्ता अब जांच पर ही अंगुली उठा रहे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि प्रशासन की ओर से शिक्षक को बचाने की कोशिश की जा रही है। यदि नियुक्ति सही थी तो डीएम की रिपोर्ट पर रजिस्ट्रार की ओर से वेतन क्यों रोका गया। उसी समय उसे क्लीन चिट दे देनी चाहिए थी। वहीं जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी की ओर से इसे टाइपिंग मिस्टेक बताया गया है।
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अरमान अहमद खां की नियुक्ति एकदम सही है। आख्या में हो सकता है कि टाइपिंग मिस्टेक हो। चार मई 1984 से पहले उन्हें वेतन का कोई भुगतान नहीं किया गया है।
साहित्य निकस सिंह
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मुबारकपुर निवास आमिर फहीम ने जिलाधिकारी से शिकायत की थी कि मुबारकपुर के मदरसा बाबुल इल्म में सहायक अध्यापक तहतानियां ने 16 वर्ष 10 माह की उम्र में ही सहायक अध्यापक की नौकरी पा ली थी। इसलिए इनकी नियुक्ति अनियमित है। पूर्व में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से एक जनवरी 1993 को इनको जारी किए गए वेतन के रिकवरी के आदेश दिए थे। गत वर्ष अनुदानिक मदरसों की जांच के दौरान जिलाधिकारी की इसी रिपोर्ट पर इनका वेतन रजिस्ट्रार की ओर से रोक दिया गया था। 29 जनवरी को अपनी जांच अख्या में डीएमओ साहित्य निकस सिंह ने कहा कि अरमान अहमद खां को छह नवंबर 1983 से वेतन का भुगतान किया गया है। अरमान मदरसे में छह नवंबर 1981 से नौकरी कर रहे हैं। मदरसा नियुक्ति नियमावली 1987 में बनी थी। इसलिए इन पर आयु संबंधी प्रतिबंध लागू नहीं होता। मदरसा शिक्षा परिषद ने छह नवंबर 1983 से पहले इनके कार्य को बॉय सर्विस माना है। इसके बाद शिकायकर्ता की ओर से एक जनवारी को एक और शिकायत की गई, जिसमें अरमान अहमद के नौकरी के दौरान ही 1983 में एमपी इंटर कालेज से संस्थागत परीक्षा उर्तीण करने की बात कही गई। शिकायत पर दो जनवरी को दी गई जांच आख्या में डीएमओ ने कहा कि अरमान को चार मई 1984 को नियुक्ति पत्र जारी किया गया है। इसके पहले उन्हें वेतन का कोई भुगतान नहीं किया गया है। इससे 1983 में उनका रेगुलर इंटर करना गलत नहीं है। इसी जांच आख्या पर जिलाधिकारी की ओर से दोनों शिकायतों का निस्तारण कर दिया गया।
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एक ही शिक्षक की शिकायत में दो-दो रिपोर्ट चर्चा की विषय बनी हुई हैं। इससे शिकायतकर्ता अब जांच पर ही अंगुली उठा रहे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि प्रशासन की ओर से शिक्षक को बचाने की कोशिश की जा रही है। यदि नियुक्ति सही थी तो डीएम की रिपोर्ट पर रजिस्ट्रार की ओर से वेतन क्यों रोका गया। उसी समय उसे क्लीन चिट दे देनी चाहिए थी। वहीं जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी की ओर से इसे टाइपिंग मिस्टेक बताया गया है।
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अरमान अहमद खां की नियुक्ति एकदम सही है। आख्या में हो सकता है कि टाइपिंग मिस्टेक हो। चार मई 1984 से पहले उन्हें वेतन का कोई भुगतान नहीं किया गया है।
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