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Auraiya News: धान की फसल मुफ्त में कटी, पराली नहीं जली, पशुओं को चारा भी मिला
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औरैया। पराली के बदले धान की फसल कटवाने का प्रयोग जगतपुर गांव में सफल रहा है। इससे किसानों की धान की फसल मुफ्त में कट गई और पराली भी नहीं जलानी पड़ी। पशुओं को चारा मिला तो ठेकेदारों को काम भी मिला। पर्यावरण भी बच गया। इस प्रयोग से किसान और कृषि विभाग के अधिकारी काफी उत्साहित हैं। अब इसे पूरे जिले में लागू किया जाएगा।
पहले होता यह था कि किसान धान की फसल हार्वेस्टर से कटवाते थे। इसके बाद पराली को आग के हवाले कर देते थे। इस पर्यावरण को नुकसान होता था। किसानों पर केस दर्ज होते थे। जुर्माना भी लगता था। इसी बीच कृषि विभाग ने डिंक पोजर पर जोर दिया। यह भी अधिक सफल नहीं रहा।
अब इस साल नया प्रयोग किया गया है। बीहड़ के गांव जगतपुर के किसानों से पशुपालन इकाइयों से अनुबंध कराया गया। जगतपुर गांव के किसानों की पकी फसल को पशुपालन इकाइयों के ठेकेदार मुफ्त में कटाई कर भूसे को समेट ले जा रहे हैं। उपज किसान की हो जा रही है। धान का भूसा पशुपालन इकाइयों के मवेशियों के चारे में प्रयोग किया जा रहा है।
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धान कटाई से पहले अक्तूबर माह में कृषि विभाग के सहायक तकनीकी प्रबंधक मोहित चौधरी ने जगतपुर गांव में इस प्रयोग की शुरुआत की। चौपाल लगाकर किसानों को पराली के बदले धान की फसल काटने का आफर दिया। किसानों की सहमति के बाद गोशालाओं व पशुपालन इकाइयों से कृषि विभाग ने संपर्क किया। कुछ ठेकेदारों ने इस योजना में सार्थक पहल की। बहुतायत में चारे की मांग रखने वाली पशुपालन इकाइयों व गोशालाओं से साझा तालमेल बैठाया गया। तय किया गया कि धान की फसल की कटाई करने वाले ठेकेदार पराली को पशुपालन इकाइयों व गोशालाओं को 200-250 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेचेंगे।
इस तरह किसानों को धान की फसल की कटाई की चिंता खत्म हो गई। हार्वेस्टर से कटाई कराने पर जहां 1500 रुपये प्रति बीघा देना पड़ता था और पराली को जलाना पड़ता था। नए प्रयोग में फसल भी कट गई। पराली भी नहीं जलानी पड़ी। पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हुआ। पशुओं को चारा भी मिल गया। ठेकेदारों को काम भी मिल गया। कृषि विभाग के अधिकारियों की मानें तो अगले साल जिलेभर में यह व्यवस्था पनप जाने की संभावना है।
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800 रुपये क्विंटल गेहूं के भूसे का विकल्प बन रहा बाजरे व पराली के भूसे का मिश्रण
पशुपालन इकाइयों से लेकर गोशालाओं में काफी मात्रा में भूसे की जरूरत होती है। सर्दी के मौसम में बाजरे की कर्बी व पराली के भूसे का मिश्रण चारे के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है। इस संभावना को देखते हुए किसान, कृषि विभाग व पशुपालन इकाई व ठेकेदारों ने यह व्यवस्था अपनाना शुरू किया है। गेहूं का भूसा वर्तमान में 800 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है। पराली का भूसा ठेकेदार 200-250 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से पशुपालन इकाइयों को बेच रहे हैं। 250 रुपये का भाव बाजरे की कर्बी का है। ऐसे में सूखा भूसा पशुपालकों को महज 500 रुपये का मिल रहा है।
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क्या बोले किसान-- --
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धान की फसल की मुफ्त में कटाई का लाभ मिला है। पराली किसी काम में नहीं आती थी। बेकार जाने वाली पराली अब मवेशियों के काम आएगी।
-हाकिम सिंह, किसान
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धान की कटाई अभी तक हार्वेस्टर से कराते थे। 1500 रुपये प्रति बीघा कटाई की लागत थी। अब पराली का भूसा ठेकेदारों को देकर मुफ्त में धान की कटाई हो जा रही है।
-वीरेंद्र सिंह, किसान
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धान की फसल की कटाई से पहले इस प्रयोग की रणनीति बनाई थी। ठेकेदार से लेकर पशुपालन इकाई व किसान तीनों के बीच तालमेल बैठा गया है। ठेकेदारों को धान कटाई से कुछ हद तक मुनाफा मिल जाएगा। कटर मशीन का प्रयोग बढ़ेगा। गोशालाओं व पशुपालन इकाइयों को सस्ते चारे की सुविधा मिली है। जगतपुर के ज्यादातर किसानों ने इस प्रयोग में सहयोग किया है।
-मोहित चौधरी, सहायक तकनीकी प्रबंधक कृषि विभाग
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तकनीकी सहायक की ओर से दिलचस्पी लेकर किया गया प्रयास काफी बढि़या है। अगले साल धान की कटाई से पहले जिलेभर में कई ठेकेदार देखने को मिल सकते हैं। इसके लिए लोगों को जागरूक किया जाएगा। पराली जलाने की समस्या दूर होगी। मवेशियों के चारे की भी समस्या खत्म होगी।
-शैलेंद्र कुमार वर्मा, जिला कृषि अधिकारी
फोटो-08एयूआरपी 04- ट्रैक्टर कटर से काटे गए धान के भूसे को समेटते श्रमिक व जानकारी देते तकनीकी सहायक मोहित चौधरी। संवाद
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पहले होता यह था कि किसान धान की फसल हार्वेस्टर से कटवाते थे। इसके बाद पराली को आग के हवाले कर देते थे। इस पर्यावरण को नुकसान होता था। किसानों पर केस दर्ज होते थे। जुर्माना भी लगता था। इसी बीच कृषि विभाग ने डिंक पोजर पर जोर दिया। यह भी अधिक सफल नहीं रहा।
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अब इस साल नया प्रयोग किया गया है। बीहड़ के गांव जगतपुर के किसानों से पशुपालन इकाइयों से अनुबंध कराया गया। जगतपुर गांव के किसानों की पकी फसल को पशुपालन इकाइयों के ठेकेदार मुफ्त में कटाई कर भूसे को समेट ले जा रहे हैं। उपज किसान की हो जा रही है। धान का भूसा पशुपालन इकाइयों के मवेशियों के चारे में प्रयोग किया जा रहा है।
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धान कटाई से पहले अक्तूबर माह में कृषि विभाग के सहायक तकनीकी प्रबंधक मोहित चौधरी ने जगतपुर गांव में इस प्रयोग की शुरुआत की। चौपाल लगाकर किसानों को पराली के बदले धान की फसल काटने का आफर दिया। किसानों की सहमति के बाद गोशालाओं व पशुपालन इकाइयों से कृषि विभाग ने संपर्क किया। कुछ ठेकेदारों ने इस योजना में सार्थक पहल की। बहुतायत में चारे की मांग रखने वाली पशुपालन इकाइयों व गोशालाओं से साझा तालमेल बैठाया गया। तय किया गया कि धान की फसल की कटाई करने वाले ठेकेदार पराली को पशुपालन इकाइयों व गोशालाओं को 200-250 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेचेंगे।
इस तरह किसानों को धान की फसल की कटाई की चिंता खत्म हो गई। हार्वेस्टर से कटाई कराने पर जहां 1500 रुपये प्रति बीघा देना पड़ता था और पराली को जलाना पड़ता था। नए प्रयोग में फसल भी कट गई। पराली भी नहीं जलानी पड़ी। पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हुआ। पशुओं को चारा भी मिल गया। ठेकेदारों को काम भी मिल गया। कृषि विभाग के अधिकारियों की मानें तो अगले साल जिलेभर में यह व्यवस्था पनप जाने की संभावना है।
800 रुपये क्विंटल गेहूं के भूसे का विकल्प बन रहा बाजरे व पराली के भूसे का मिश्रण
पशुपालन इकाइयों से लेकर गोशालाओं में काफी मात्रा में भूसे की जरूरत होती है। सर्दी के मौसम में बाजरे की कर्बी व पराली के भूसे का मिश्रण चारे के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है। इस संभावना को देखते हुए किसान, कृषि विभाग व पशुपालन इकाई व ठेकेदारों ने यह व्यवस्था अपनाना शुरू किया है। गेहूं का भूसा वर्तमान में 800 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है। पराली का भूसा ठेकेदार 200-250 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से पशुपालन इकाइयों को बेच रहे हैं। 250 रुपये का भाव बाजरे की कर्बी का है। ऐसे में सूखा भूसा पशुपालकों को महज 500 रुपये का मिल रहा है।
क्या बोले किसान
धान की फसल की मुफ्त में कटाई का लाभ मिला है। पराली किसी काम में नहीं आती थी। बेकार जाने वाली पराली अब मवेशियों के काम आएगी।
-हाकिम सिंह, किसान
धान की कटाई अभी तक हार्वेस्टर से कराते थे। 1500 रुपये प्रति बीघा कटाई की लागत थी। अब पराली का भूसा ठेकेदारों को देकर मुफ्त में धान की कटाई हो जा रही है।
-वीरेंद्र सिंह, किसान
धान की फसल की कटाई से पहले इस प्रयोग की रणनीति बनाई थी। ठेकेदार से लेकर पशुपालन इकाई व किसान तीनों के बीच तालमेल बैठा गया है। ठेकेदारों को धान कटाई से कुछ हद तक मुनाफा मिल जाएगा। कटर मशीन का प्रयोग बढ़ेगा। गोशालाओं व पशुपालन इकाइयों को सस्ते चारे की सुविधा मिली है। जगतपुर के ज्यादातर किसानों ने इस प्रयोग में सहयोग किया है।
-मोहित चौधरी, सहायक तकनीकी प्रबंधक कृषि विभाग
तकनीकी सहायक की ओर से दिलचस्पी लेकर किया गया प्रयास काफी बढि़या है। अगले साल धान की कटाई से पहले जिलेभर में कई ठेकेदार देखने को मिल सकते हैं। इसके लिए लोगों को जागरूक किया जाएगा। पराली जलाने की समस्या दूर होगी। मवेशियों के चारे की भी समस्या खत्म होगी।
-शैलेंद्र कुमार वर्मा, जिला कृषि अधिकारी
फोटो-08एयूआरपी 04- ट्रैक्टर कटर से काटे गए धान के भूसे को समेटते श्रमिक व जानकारी देते तकनीकी सहायक मोहित चौधरी। संवाद