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Auraiya News: सरकारी सिस्टम बीमार... भवन और संसाधन के बाद भी बर्न यूनिट 11 साल से बंद
Tue, 15 Sep 2026 01:33 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Tue, 15 Sep 2026 01:33 AM IST
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बर्न यूनिट की खिड़की का टूटा शीशा। संवाद
औरैया। मुरादगंज में सिलिंडर फटने से चार झुलसे कर्मियों को चिचौली मेडिकल कॉलेज से प्राथमिक उपचार देकर सैफई रेफर किया गया। इस घटना के बाद लोगों को यहां की बर्न यूनिट की याद आई जो भवन और संसाधन के बाद भी 11 साल बंद हैं। जब सरकारी सिस्टम खुद ही बीमार है तो यहां उपचार की उम्मीद कैसे की जा सकती है। बता दें कि 11 साल पहले इस यूनिट को एक करोड़ खर्च करके बनाया गया था, लेकिन आज तक यहां एक मरीज को भी उपचार नहीं मिला।
जिले में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए चिचौली मेडिकल कॉलेज परिसर में वर्ष 2015 में एक करोड़ की लागत से बर्न यूनिट बनाई गई थी। बर्न यूनिट बनने से लोगों को उम्मीद थी कि अब झुलसे मरीजों को दूसरे जिलों की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी लेकिन सरकारी सिस्टम के चलते यहां न स्टाफ की तैनाती हुई और न ही किसी भी मरीज को उपचार मिला। बनने के साथ ही यहां ताला लटका है। आलम यह है कि भवन के अंदर गंदगी और धूल का अंबार है। खिड़कियों के शीशे टूट चुके और दीवारों पर लगे टाइल्स भी उखड़ गए हैं। इतना ही नहीं यूनिट की फर्श भी कई जगह धंसी है।
यूनिट का भवन अब पक्षियों का बसेरा बन गया है। कबूतरों ने यहां स्थायी डेरा है। स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी से यह यूनिट खंडहर में बदलती जा रही है। इसका संचालन न होने से मरीजों को तत्काल इलाज नहीं मिल पाता। मजबूरी में उन्हें करीब 80 किमी दूर सैफई रेफर किया जाता है। इस बारे में मुख्य चिकित्साधिकारी सुरेंद्र कुमार सिंह को कई बार फोन मिलाया गया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।
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बर्न यूनिट सीएमओ के अधीन है। यहां पर प्लास्टिक सर्जन व प्रशिक्षित स्टाफ की जरूरत है। यह अभी तक मिल नहीं पाए हैं। इस वजह से संचालन नहीं हो पा रहा।
-डॉ. मुकेश वीर सिंह, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज
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यह पद हैं सृजित
बर्न यूनिट संचालन के लिए छह स्टॉफ नर्स, एक प्लास्टिक सर्जन, एक फार्मासिस्ट, एक सोशल वर्कर पद सृजित हैं। यह सभी पद सीएमओ के अधीन हैं। शासन से इसकी मांग को लेकर पत्राचार किया जा चुका है।
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जिले में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए चिचौली मेडिकल कॉलेज परिसर में वर्ष 2015 में एक करोड़ की लागत से बर्न यूनिट बनाई गई थी। बर्न यूनिट बनने से लोगों को उम्मीद थी कि अब झुलसे मरीजों को दूसरे जिलों की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी लेकिन सरकारी सिस्टम के चलते यहां न स्टाफ की तैनाती हुई और न ही किसी भी मरीज को उपचार मिला। बनने के साथ ही यहां ताला लटका है। आलम यह है कि भवन के अंदर गंदगी और धूल का अंबार है। खिड़कियों के शीशे टूट चुके और दीवारों पर लगे टाइल्स भी उखड़ गए हैं। इतना ही नहीं यूनिट की फर्श भी कई जगह धंसी है।
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यूनिट का भवन अब पक्षियों का बसेरा बन गया है। कबूतरों ने यहां स्थायी डेरा है। स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी से यह यूनिट खंडहर में बदलती जा रही है। इसका संचालन न होने से मरीजों को तत्काल इलाज नहीं मिल पाता। मजबूरी में उन्हें करीब 80 किमी दूर सैफई रेफर किया जाता है। इस बारे में मुख्य चिकित्साधिकारी सुरेंद्र कुमार सिंह को कई बार फोन मिलाया गया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।
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बर्न यूनिट सीएमओ के अधीन है। यहां पर प्लास्टिक सर्जन व प्रशिक्षित स्टाफ की जरूरत है। यह अभी तक मिल नहीं पाए हैं। इस वजह से संचालन नहीं हो पा रहा।
-डॉ. मुकेश वीर सिंह, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज
यह पद हैं सृजित
बर्न यूनिट संचालन के लिए छह स्टॉफ नर्स, एक प्लास्टिक सर्जन, एक फार्मासिस्ट, एक सोशल वर्कर पद सृजित हैं। यह सभी पद सीएमओ के अधीन हैं। शासन से इसकी मांग को लेकर पत्राचार किया जा चुका है।

बर्न यूनिट की खिड़की का टूटा शीशा। संवाद

बर्न यूनिट की खिड़की का टूटा शीशा। संवाद