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Auraiya News: बसपा के पूर्व विधायक शेखर तिवारी गिरफ्तार, गए उरई जेल
Sun, 25 May 2025 11:47 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Sun, 25 May 2025 11:47 PM IST
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पुलिस की गिरफ्त में पूर्व विधायक शेखर तिवारी।
- फोटो : पुलिस की गिरफ्त में पूर्व विधायक शेखर तिवारी।
औरैया। करीब 17 साल पहले पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर मनोज गुप्ता की हत्या में मुख्य दोषी बसपा के पूर्व विधायक शेखर तिवारी की जमानत खारिज होने पर पुलिस ने रविवार को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें उरई जेल भेजा गया है।
शेखर के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी हुआ था, लेकिन वह हाजिर नहीं हो रहे थे। पिछले साल फरवरी में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को निरस्त कर दिया था। मामले में 2011 में हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने शेखर को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
औरैया के दिबियापुर निवासी शेखर तिवारी वर्ष 2007 में सदर विधानसभा सीट से बसपा के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए थे। वर्ष 2008 में लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के अधिशासी अभियंता मनोज गुप्ता की हत्या हो गई थी।
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इस मामले में उन्हें हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। तब से वह जेल में थे। फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत पर उन्हें रिहा किया गया था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश निरस्त कर दिया था। इससे उनकी जमानत रद्द हो गई थी।
इस संबंध में पूर्व विधायक शेखर तिवारी ने शासन में अर्जी लगाई थी, जिसे राज्यपाल ने नामंजूर कर दिया। वह हाईकोर्ट भी गए और हाईकोर्ट में मामला होने का हवाला देकर उन्होंने कोर्ट में सरेंडर नहीं किया। ऐसे में सीजेएम कोर्ट ने उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। रविवार की सुबह दिबियापुर पुलिस ने शेखर को गिरफ्तार कर लिया।
अपहरण कर हुई थी इंजीनियर की हत्या
24 दिसंबर 2008 को औरैया के लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता मनोज गुप्ता का अपहरण करने के बाद पीट-पीटकर हत्या की गई थी। तत्कालीन बसपा विधायक शेखर तिवारी व उनके नौ साथियों पर हत्याकांड को अंजाम देने का आरोप लगा था।
चर्चा थी पार्टी के लिए फंड जुटाने के लिए इंजीनियर पर दबाव बनाया था। इन्कार करने पर एक गेस्ट हाउस में बंधक बनाकर उन्हें पीटा गया था, जिससे उनकी मौत हो गई थी। मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने शेखर को छह मई 2011 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। यह हत्याकांड तब काफी सुर्खियों में रहा था। इसे लेकर खूब सियासत भी हुई थी।
सुबूत मिटाने पर पत्नी को भी हुई थी सजा
इस हाईप्रोफाइल मामले में शेखर तिवारी के साथ उनकी पत्नी विभा तिवारी को भी सुबूत नष्ट करने के आरोप में दो वर्ष की सजा हुई थी। हालांकि जमानत मिलने पर वह जेल नहीं गई थीं। पिछले दिनों उनका निधन हो चुका है। इस मामले में दिबियापुर के तत्कालीन निरीक्षक होशियार सिंह को भी आरोपी बनाया गया था। पुलिस ने तब मामले को दबाने की कोशिश की थी, लेकिन मामला तूल पकड़ने पर तत्कालीन विधायक पर कानून का शिकंजा कसा था।
विधायक संग नौ आरोपी हैं सजायाफ्ता
इंजीनियर हत्याकांड में पूर्व बसपा विधायक शेखर तिवारी मुख्य आरोपी थे। उनकी पत्नी विभा तिवारी के अलावा संतोष तिवारी, गजराज सिंह, पान सिंह, विनय तिवारी उर्फ त्यागी, राम बाबू उर्फ पूती, योगेंद्र दोहरे उर्फ भाटिया, मनोज अवस्थी, देवेंद्र राजपूत, तत्कालीन थानाध्यक्ष दिबियापुर होशियार सिंह के खिलाफ चार्जशीट दायर किया था। इसमें कुछ लोग जमानत पर बाहर ही हैं।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने में की लापरवाही, सख्ती बढ़ी तो गए हाईकोर्ट
पूर्व विधायक को जमानत देने के 10 महीने बाद अपना आदेश वापस लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने मामले को हाईकोर्ट में ले जाने को कहा था। लेकिन पूर्व विधायक ने इसमें लापरवाही बरती। तीन महीने बाद उनके खिलाफ वारंट जारी हुआ तो वह सक्रिय हुए और हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। इस बीच वहां मामला लंबित रहा।
इधर सीजीएम कोर्ट ने वारंट के बाद गैर जमानती वारंट जारी कर दिया तो वह गिरफ्तारी से बचने की जुगत में लगे रहे। आखिर में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने हाईकोर्ट में दायर की अपनी याचिका में सजा पूरी होने का हवाला देते हुए सामान्य जीवन जीने की गुहार लगाई थी। पत्नी का निधन हो चुका है। माता-पिता भी नहीं हैं। एक बेटी है, उसकी परवरिश का भी हवाला दिया।
उन्हें भरोसा था कि जेल में उनके सामान्य आचरण और परिवार का हवाला देने से उन्हें हाईकोर्ट से राहत मिल सकती है। इसीलिए वह गिरफ्तारी से बच रहे थे। हालांकि अब तक उनकी याचिका पर सुनवाई नहीं हुई है। परिवार की निगाहें हाईकोर्ट पर लगी हैं। अब सबकुछ हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर ही निर्भर है।
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शेखर के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी हुआ था, लेकिन वह हाजिर नहीं हो रहे थे। पिछले साल फरवरी में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को निरस्त कर दिया था। मामले में 2011 में हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने शेखर को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
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औरैया के दिबियापुर निवासी शेखर तिवारी वर्ष 2007 में सदर विधानसभा सीट से बसपा के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए थे। वर्ष 2008 में लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के अधिशासी अभियंता मनोज गुप्ता की हत्या हो गई थी।
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इस मामले में उन्हें हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। तब से वह जेल में थे। फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत पर उन्हें रिहा किया गया था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश निरस्त कर दिया था। इससे उनकी जमानत रद्द हो गई थी।
इस संबंध में पूर्व विधायक शेखर तिवारी ने शासन में अर्जी लगाई थी, जिसे राज्यपाल ने नामंजूर कर दिया। वह हाईकोर्ट भी गए और हाईकोर्ट में मामला होने का हवाला देकर उन्होंने कोर्ट में सरेंडर नहीं किया। ऐसे में सीजेएम कोर्ट ने उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। रविवार की सुबह दिबियापुर पुलिस ने शेखर को गिरफ्तार कर लिया।
अपहरण कर हुई थी इंजीनियर की हत्या
24 दिसंबर 2008 को औरैया के लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता मनोज गुप्ता का अपहरण करने के बाद पीट-पीटकर हत्या की गई थी। तत्कालीन बसपा विधायक शेखर तिवारी व उनके नौ साथियों पर हत्याकांड को अंजाम देने का आरोप लगा था।
चर्चा थी पार्टी के लिए फंड जुटाने के लिए इंजीनियर पर दबाव बनाया था। इन्कार करने पर एक गेस्ट हाउस में बंधक बनाकर उन्हें पीटा गया था, जिससे उनकी मौत हो गई थी। मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने शेखर को छह मई 2011 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। यह हत्याकांड तब काफी सुर्खियों में रहा था। इसे लेकर खूब सियासत भी हुई थी।
सुबूत मिटाने पर पत्नी को भी हुई थी सजा
इस हाईप्रोफाइल मामले में शेखर तिवारी के साथ उनकी पत्नी विभा तिवारी को भी सुबूत नष्ट करने के आरोप में दो वर्ष की सजा हुई थी। हालांकि जमानत मिलने पर वह जेल नहीं गई थीं। पिछले दिनों उनका निधन हो चुका है। इस मामले में दिबियापुर के तत्कालीन निरीक्षक होशियार सिंह को भी आरोपी बनाया गया था। पुलिस ने तब मामले को दबाने की कोशिश की थी, लेकिन मामला तूल पकड़ने पर तत्कालीन विधायक पर कानून का शिकंजा कसा था।
विधायक संग नौ आरोपी हैं सजायाफ्ता
इंजीनियर हत्याकांड में पूर्व बसपा विधायक शेखर तिवारी मुख्य आरोपी थे। उनकी पत्नी विभा तिवारी के अलावा संतोष तिवारी, गजराज सिंह, पान सिंह, विनय तिवारी उर्फ त्यागी, राम बाबू उर्फ पूती, योगेंद्र दोहरे उर्फ भाटिया, मनोज अवस्थी, देवेंद्र राजपूत, तत्कालीन थानाध्यक्ष दिबियापुर होशियार सिंह के खिलाफ चार्जशीट दायर किया था। इसमें कुछ लोग जमानत पर बाहर ही हैं।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने में की लापरवाही, सख्ती बढ़ी तो गए हाईकोर्ट
पूर्व विधायक को जमानत देने के 10 महीने बाद अपना आदेश वापस लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने मामले को हाईकोर्ट में ले जाने को कहा था। लेकिन पूर्व विधायक ने इसमें लापरवाही बरती। तीन महीने बाद उनके खिलाफ वारंट जारी हुआ तो वह सक्रिय हुए और हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। इस बीच वहां मामला लंबित रहा।
इधर सीजीएम कोर्ट ने वारंट के बाद गैर जमानती वारंट जारी कर दिया तो वह गिरफ्तारी से बचने की जुगत में लगे रहे। आखिर में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने हाईकोर्ट में दायर की अपनी याचिका में सजा पूरी होने का हवाला देते हुए सामान्य जीवन जीने की गुहार लगाई थी। पत्नी का निधन हो चुका है। माता-पिता भी नहीं हैं। एक बेटी है, उसकी परवरिश का भी हवाला दिया।
उन्हें भरोसा था कि जेल में उनके सामान्य आचरण और परिवार का हवाला देने से उन्हें हाईकोर्ट से राहत मिल सकती है। इसीलिए वह गिरफ्तारी से बच रहे थे। हालांकि अब तक उनकी याचिका पर सुनवाई नहीं हुई है। परिवार की निगाहें हाईकोर्ट पर लगी हैं। अब सबकुछ हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर ही निर्भर है।