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घरों में बच्चों को बताएं सोशल मीडिया के फायदे-नुकसान
Updated Thu, 18 Jan 2018 11:52 PM IST
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उरई। लखनऊ के अलीगंज स्थित ब्राइटलैंड स्कूल में छात्रा ने जिस तरह से कक्षा एक के मासूम छात्र रितिक को लहूलुहान किया। उसने एक बार फिर अभिभावकों के दिलों में डर पैदा कर दिया है।
सितंबर माह में गुरुग्राम स्थित रेयान स्कूल का प्रद्युम्न हो या फिर रितिक इन दोनों घटनाओं ने अभिभावकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिरी बच्चों के भीतर इस तरह की हिंसक प्रवृत्ति आती कहां से है। इसका सही जवाब पुलिस अधिकारी और मनोचिकित्सक बताते हैं कि मोबाइल और खासतौर पर इंटरनेट ने कुछ भी ऐसा नहीं रखा जो बच्चों से छिप सके ।
उनके कोमल मन और दिमाग पर नेट का गलत उपयोग तेजी से प्रभाव डालता है। इसलिए अभिभावकों को चाहिए वे अपने बच्चों को मोबाइल व नेट की इन बुराइयों से दूर रखं। वहीं दूसरी ओर लगातार हो रही ऐसी घटनाओं से स्कूल प्रबंधन भी कम परेशान नहीं है। उनका मानना है क िसीसीटीवी कैमरे लगाने के अलावा उनके पास बच्चों की हरकतों को रोकने को और कौन सा रास्ता हो सकता है। इस पर मंथन जरूरी है।
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रामनगर निवासी अभिभावक पीयूष कहते हैं कि आजकल बच्चे घर की अपेक्षा स्कूल में स्वयं को ज्यादा खुला महसूस करते हैं। हो सकता है कि स्कूलों में हो रही घटनाओं की एक वजह यह भी हो। इसके लिए प्रबंधन को भी कुछ उपाय करने होंगे।
पटेल नगर निवासी अंजू वर्मा के मुताबिक स्कूल वालों को चाहिए कि वह हर एक बच्चे की मानीटरिंग रखें यदि किसी बच्चे के व्यवहार में कुछ भी गड़बड़ लगे तो उसकी शिकायत घर तक पहुंचाएं ताकी उसमें सुधार किया जा सके।
झांसी रोड स्थित एल्ड्रिच पब्लिक स्कूल के डायरेक्टर अजय इटौरिया का कहना है कि लगातार हो रही ऐसी घटनाएं वाकई चिंताजनक हैं। इन पर रोक लगाने के लिए सिर्फ कैमरों से काम नहीं चलेगा। स्कूल स्टाफ को भी बच्चों की सुरक्षा के लिए और मुस्तैद किया जाएगा। इसके अलावा बच्चों के लिए समय समय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने होंगे। जिसमें उन्हें सोशल मीडिया के फायदे और नुकसान बताए जा सकें ।
मनोचिकित्सक डॉ तारा शाहजानंद ने बताया कि आज बच्चे आउटडोर की बजाए इनडोर गेम ज्यादा खेल रहे हैं। इसकी वजह घरों में मौजूद दो-तीन फोन ही है। बच्चों को घर के बाहर जाकर पार्क व मैदान में खेलना चाहिए न कि बेड और ड्राइंग रूम में बैठकर मोबाइल चलाना चाहिए। यह देखने का काम अभिभावकों का है। बच्चों को सोशल मीडिया के बारे में ठीक से बताएं बिना बताए उनके हाथों में मोबाइल न सौंपे।
गुरुग्राम और लखनऊ की घटना से अभिवावक सहमे, स्कूल हुए चौकन्ने
अमर उजाला ब्यूरो
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सितंबर माह में गुरुग्राम स्थित रेयान स्कूल का प्रद्युम्न हो या फिर रितिक इन दोनों घटनाओं ने अभिभावकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिरी बच्चों के भीतर इस तरह की हिंसक प्रवृत्ति आती कहां से है। इसका सही जवाब पुलिस अधिकारी और मनोचिकित्सक बताते हैं कि मोबाइल और खासतौर पर इंटरनेट ने कुछ भी ऐसा नहीं रखा जो बच्चों से छिप सके ।
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उनके कोमल मन और दिमाग पर नेट का गलत उपयोग तेजी से प्रभाव डालता है। इसलिए अभिभावकों को चाहिए वे अपने बच्चों को मोबाइल व नेट की इन बुराइयों से दूर रखं। वहीं दूसरी ओर लगातार हो रही ऐसी घटनाओं से स्कूल प्रबंधन भी कम परेशान नहीं है। उनका मानना है क िसीसीटीवी कैमरे लगाने के अलावा उनके पास बच्चों की हरकतों को रोकने को और कौन सा रास्ता हो सकता है। इस पर मंथन जरूरी है।
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रामनगर निवासी अभिभावक पीयूष कहते हैं कि आजकल बच्चे घर की अपेक्षा स्कूल में स्वयं को ज्यादा खुला महसूस करते हैं। हो सकता है कि स्कूलों में हो रही घटनाओं की एक वजह यह भी हो। इसके लिए प्रबंधन को भी कुछ उपाय करने होंगे।
पटेल नगर निवासी अंजू वर्मा के मुताबिक स्कूल वालों को चाहिए कि वह हर एक बच्चे की मानीटरिंग रखें यदि किसी बच्चे के व्यवहार में कुछ भी गड़बड़ लगे तो उसकी शिकायत घर तक पहुंचाएं ताकी उसमें सुधार किया जा सके।
झांसी रोड स्थित एल्ड्रिच पब्लिक स्कूल के डायरेक्टर अजय इटौरिया का कहना है कि लगातार हो रही ऐसी घटनाएं वाकई चिंताजनक हैं। इन पर रोक लगाने के लिए सिर्फ कैमरों से काम नहीं चलेगा। स्कूल स्टाफ को भी बच्चों की सुरक्षा के लिए और मुस्तैद किया जाएगा। इसके अलावा बच्चों के लिए समय समय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने होंगे। जिसमें उन्हें सोशल मीडिया के फायदे और नुकसान बताए जा सकें ।
मनोचिकित्सक डॉ तारा शाहजानंद ने बताया कि आज बच्चे आउटडोर की बजाए इनडोर गेम ज्यादा खेल रहे हैं। इसकी वजह घरों में मौजूद दो-तीन फोन ही है। बच्चों को घर के बाहर जाकर पार्क व मैदान में खेलना चाहिए न कि बेड और ड्राइंग रूम में बैठकर मोबाइल चलाना चाहिए। यह देखने का काम अभिभावकों का है। बच्चों को सोशल मीडिया के बारे में ठीक से बताएं बिना बताए उनके हाथों में मोबाइल न सौंपे।
गुरुग्राम और लखनऊ की घटना से अभिवावक सहमे, स्कूल हुए चौकन्ने
अमर उजाला ब्यूरो