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नोट बंदी: किसी को फली तो किसी को खली
Updated Sat, 10 Nov 2018 12:26 AM IST
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उरई। दो साल पहले हुई नोट बंदी को याद कर आज भी जहां कुछ लोग खीझ पड़ते ह वहीं कुछ उसे सरकार का ऐतिहासिक फैसला भी बताते हैं। लोगों का कहना है कि नोट बंदी के बाद बैंकों और एटीएम के बाहर लगी लाइनें याद आती है तो अभी भी सिर चकरा जाता है।
कहा गया था कि नोट बंदी से देश का काला धन बाहर आएगा और आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। दो साल बीतने के बाद अभी भी लोगों को काले धन का ही इंतजार है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि नोट बंदी से जमाखोरी पर लगाम लगी है और टैक्स देने वालों की संख्या भी बढ़ी है। इसके अलावा बाजारों ई पेमेंट की सुविधा में भी बढ़ोतरी हुई है। जिससे कारोबार कुछ आसान भी हुआ है।
उद्योग व्यापार मंडल के महामंत्री दिलीप सेठ का कहना है कि नोटबंदी एक जल्दबाजी में लिया गया फैसला साबित हुआ है। जिसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव व्यापार और व्यापारी पर ही पड़ा है। दो साल बीत गए सैकड़ों व्यापारियों का कारोबार अभी भी बेपटरी ही बना हुआ है।
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एट के किसान लालजी निरंजन का कहना है कि नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ है। अधिकंाश किसान अनपढ़ है, जो डिजिटल व नेट बैंकिंग से आज भी कोसों दूर है। किसान का अधिकांश खर्च छोटे-छोटे हैं जिन्हें डिजिटल से नहीं जोड़ा जा सकता है इससे किसानों को काफी परेशानी का समाना करना पड़ रहा है।
मुहम्मदाबाद के समाजसेवी हनीफ खान का कहना है कि सरकार ने वादा किया था कि नोटबंदी के बाद देश से भ्रष्टाचार व कालाधन पूरे तरह से खत्म हो जाएगा। इस उम्मीद से पूरा देश लाइनों में लग गया था, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। अब आने वाले समय में कुछ हो जाए तो नहीं कहा जा सकता है।
कदौरा के पेट्रोल पंप संचालक संजय गौतम का कहना है कि नोटबंदी के बाद से टैक्स धारकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। पहले नौकरीपेशा के साथ सिर्फ कुछ ही लोग टैक्स देते थे, लेकिन नोटबंदी के बाद से इस संख्या में काफी इजाफा हुआ है। इससे अर्थ व्यवस्था में काफी सुधार पहुंचा है और देश में विकास दर बढ़ी है।
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कहा गया था कि नोट बंदी से देश का काला धन बाहर आएगा और आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। दो साल बीतने के बाद अभी भी लोगों को काले धन का ही इंतजार है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि नोट बंदी से जमाखोरी पर लगाम लगी है और टैक्स देने वालों की संख्या भी बढ़ी है। इसके अलावा बाजारों ई पेमेंट की सुविधा में भी बढ़ोतरी हुई है। जिससे कारोबार कुछ आसान भी हुआ है।
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उद्योग व्यापार मंडल के महामंत्री दिलीप सेठ का कहना है कि नोटबंदी एक जल्दबाजी में लिया गया फैसला साबित हुआ है। जिसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव व्यापार और व्यापारी पर ही पड़ा है। दो साल बीत गए सैकड़ों व्यापारियों का कारोबार अभी भी बेपटरी ही बना हुआ है।
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एट के किसान लालजी निरंजन का कहना है कि नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ है। अधिकंाश किसान अनपढ़ है, जो डिजिटल व नेट बैंकिंग से आज भी कोसों दूर है। किसान का अधिकांश खर्च छोटे-छोटे हैं जिन्हें डिजिटल से नहीं जोड़ा जा सकता है इससे किसानों को काफी परेशानी का समाना करना पड़ रहा है।
मुहम्मदाबाद के समाजसेवी हनीफ खान का कहना है कि सरकार ने वादा किया था कि नोटबंदी के बाद देश से भ्रष्टाचार व कालाधन पूरे तरह से खत्म हो जाएगा। इस उम्मीद से पूरा देश लाइनों में लग गया था, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। अब आने वाले समय में कुछ हो जाए तो नहीं कहा जा सकता है।
कदौरा के पेट्रोल पंप संचालक संजय गौतम का कहना है कि नोटबंदी के बाद से टैक्स धारकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। पहले नौकरीपेशा के साथ सिर्फ कुछ ही लोग टैक्स देते थे, लेकिन नोटबंदी के बाद से इस संख्या में काफी इजाफा हुआ है। इससे अर्थ व्यवस्था में काफी सुधार पहुंचा है और देश में विकास दर बढ़ी है।