{"_id":"6ab6e12a5e407dde010969f0","slug":"the-practice-of-becoming-absorbed-in-the-soul-is-the-supreme-virtue-of-celibacy-brahmacharya-saurabh-jain-jpnagar-news-c-284-1-smbd1013-173923-2026-09-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"आत्मा में लीन होने की साधना है उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म : सौरभ जैन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आत्मा में लीन होने की साधना है उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म : सौरभ जैन
विज्ञापन
अमरोहा। जैन मंदिर कोट में चल रहे दशलक्षण पर्व के दसवें दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना और धार्मिक कार्यक्रम हुए। सुबह श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से जिनेंद्र भगवान का अभिषेक किया। इसके बाद रिद्धि मंत्रों के साथ भव्य शांतिधारा कराई गई। श्रद्धालुओं ने श्री दशलक्षण मंडल विधान में शामिल होकर धर्म लाभ अर्जित किया। शाम को मंदिर परिसर में आरती हुई। इसके बाद बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर सभी का मन मोह लिया।
सांगानेर से आए शास्त्री सौरभ जैन ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर व्याख्यान देते हुए कहा कि दशलक्षण धर्मों में दसवां और परम पवित्र उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म आत्मा के शाश्वत, शुद्ध और आनंदमयी स्वरूप में लीन होने की साधना है। उन्होंने बताया कि ‘ब्रह्म’ का अर्थ आत्मा और ‘चर्य’ का अर्थ उसमें लीन होना अथवा उसके अनुरूप आचरण करना है। सामान्य तौर पर ब्रह्मचर्य को केवल शारीरिक और इंद्रिय संयम तक सीमित समझा जाता है, जबकि जैन दर्शन में इसका व्यापक अर्थ बाहरी विषय-वासनाओं और अशुद्ध भावों का त्याग कर निज आत्मा में स्थिर होना है।
उन्होंने कहा कि बाहरी आकर्षणों और चंचल वृत्तियों में भटकती चेतना आत्मिक शांति का अनुभव नहीं कर सकती। उत्तम ब्रह्मचर्य मन, वचन और काय से संयम की प्रेरणा देता है और व्यक्ति को राग, द्वेष, मोह तथा विषय-वासनाओं से दूर कर आत्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। गृहस्थ जीवन में मर्यादित एकदेश ब्रह्मचर्य और मुनिराजों के पूर्ण ब्रह्मचर्य की भी उन्होंने व्याख्या की। इस दौरान जैन समाज समिति अध्यक्ष योगेश जैन, मंत्री शरद जैन, कोषाध्यक्ष राजेश जैन समेत अरिहंत जैन, राहुल जैन, शुभम जैन, वैभव जैन, रविंद्र जैन, रोहित जैन, अमित जैन, विनय जैन, पीयूष जैन, सरिता जैन, परगी जैन, मीनाक्षी जैन, सुधा जैन, इंदु जैन, यामी जैन, पूजा जैन मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन
सांगानेर से आए शास्त्री सौरभ जैन ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर व्याख्यान देते हुए कहा कि दशलक्षण धर्मों में दसवां और परम पवित्र उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म आत्मा के शाश्वत, शुद्ध और आनंदमयी स्वरूप में लीन होने की साधना है। उन्होंने बताया कि ‘ब्रह्म’ का अर्थ आत्मा और ‘चर्य’ का अर्थ उसमें लीन होना अथवा उसके अनुरूप आचरण करना है। सामान्य तौर पर ब्रह्मचर्य को केवल शारीरिक और इंद्रिय संयम तक सीमित समझा जाता है, जबकि जैन दर्शन में इसका व्यापक अर्थ बाहरी विषय-वासनाओं और अशुद्ध भावों का त्याग कर निज आत्मा में स्थिर होना है।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि बाहरी आकर्षणों और चंचल वृत्तियों में भटकती चेतना आत्मिक शांति का अनुभव नहीं कर सकती। उत्तम ब्रह्मचर्य मन, वचन और काय से संयम की प्रेरणा देता है और व्यक्ति को राग, द्वेष, मोह तथा विषय-वासनाओं से दूर कर आत्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। गृहस्थ जीवन में मर्यादित एकदेश ब्रह्मचर्य और मुनिराजों के पूर्ण ब्रह्मचर्य की भी उन्होंने व्याख्या की। इस दौरान जैन समाज समिति अध्यक्ष योगेश जैन, मंत्री शरद जैन, कोषाध्यक्ष राजेश जैन समेत अरिहंत जैन, राहुल जैन, शुभम जैन, वैभव जैन, रविंद्र जैन, रोहित जैन, अमित जैन, विनय जैन, पीयूष जैन, सरिता जैन, परगी जैन, मीनाक्षी जैन, सुधा जैन, इंदु जैन, यामी जैन, पूजा जैन मौजूद रहे।
विज्ञापन