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Amroha News: गंगा की गोद में बैठकर मुनिदेव ने अंग्रेजों को सिखाया था सबक
Wed, 09 Aug 2023 02:07 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
Updated Wed, 09 Aug 2023 02:07 AM IST
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हसनपुर (अमरोहा)। आजादी के आंदोलन के इतिहास में हसनपुर का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। यह संभव हुआ 10 सितंबर 1914 को गंगेश्वरी गांव में जन्मे मुनिदेव त्यागी की वजह से। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने 24 क्रांतिकारियों की टीम बनाकर अंग्रेजों से खूब लोहा लिया था। अंग्रेज सैनिकों को तैरना नहीं आता था इसलिए मुनिदेव ने गंगा के बीच बने टापू को अपना ठिकाना बनाया। बाद में उन्हें जेल भी जाना पड़ा लेकिन वे हमेशा अंग्रेजों के सामने डटे रहे।
आठ अगस्त 1947 को जब भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई तो अमरोहा तक इसकी आवाज पहुंची और आजादी के मतवाले जंग में कूद पड़े। यहां आंदोलन की कमान मुनिदेव त्यागी ने संभाली। मुनिदेव त्यागी के नेतृत्व में क्रांतिकारी टापू पर रातभर रणनीति बनाते थे और अंग्रेज सैनिकों पर हमले करने के बाद गंगा में तैरकर इसी टापू पर छिप जाते थे। तैराना नहीं आने की वजह से अंग्रेज सैनिक पानी में जाने से कतराते थे।
मुनिदेव के नेतृत्व में उनके भाई पृथ्वी सिंह, कैलाश देव त्यागी, गंगाराम, राजेश्वर सिंह, मुंशी सिंह, छज्जू सिंह, सिद्धार्थ सिंह, मुकुट बिहारीलाल शर्मा, सरवन सिंह, वेद राम, ध्यान सिंह, पूरन सिंह, बाबू सिंह, नरेंद्र सिंह, रामचरण शर्मा, अजब सिंह आदि ने टीम बनाई। उन्होंने गांव-गांव पहुंचकर आंदोलन की आवाज बुलंद की।
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लाल बहादुर शास्त्री के गुरु को कंधे पर बैठाकर मंजिल तक पहुंचाया था
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में खादर क्षेत्र गंगा नदी के किनारे आसपास के गांवों में बाढ़ आई हुई थी। दूर-दूर तक पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। लाल बहादुर शास्त्री के गुरु प्रोफेसर रामशरण युवाओं में जोश भरने गंगेश्वरी गांव आए थे। उनके पैरों में जख्म हो गए थे और वे चलने में असमर्थ थे। तब मुनिदेव त्यागी ने उन्हें कंधे पर बैठाकर 12 किलोमीटर दूर गांव बरतौरा पहुंचाया था। मुनिदेव के बेटे एडवोकेट महेश चंद्र त्यागी ने बताया कि उस समय उनके पिता की उम्र करीब 28 साल थी। यह उनके परिवार व क्षेत्र के लोगों के लिए गर्व की बात है कि देश की आजादी में उनके पिता ने अहम योगदान दिया।
जेल से लेकर अर्थदंड तक की झेली सजा
पुत्र महेश चंद्र त्यागी का कहना है कि अंग्रेजों से बगावत के चलते मुनिदेव त्यागी को दो जून 1941 को छह माह की कैद और 250 रुपये का अर्थदंड की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद फिर उन्हें 23 जनवरी 1947 को एक वर्ष की सजा सुनाई गई। दो दिसंबर 1980 को मुनिदेव त्यागी का निधन हो गया था।
आजादी के बाद जिला बोर्ड के अध्यक्ष रहे मुनिदेव
महेश चंद्र त्यागी ने बताया कि आजादी के बाद 1948 से 1962 तक उनके पिता लगातार 14 साल जिला बोर्ड के अध्यक्ष रहे। इसके बाद जिला बोर्ड को जिला पंचायत बना दिया गया। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया था, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने उनके लिए कुछ नहीं किया। हालांकि, बाद में सिविल लाइंस में महिला थाना के पास मुनिदेव त्यागी के नाम से स्मृति द्वारा जरूर बनाया गया।
आजादी के बाद जलाई शिक्षा की अलख
देश के आजाद होने के बाद मुनिदेव त्यागी ने 1958 में विद्यालय की स्थापना की। जो आज ग्रामोदय इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है। गंगेश्वरी गांव को ब्लॉक का दर्जा भी उन्हीं की याद में दिया गया था। गंगेश्वरी को पहले विधानसभा का भी दर्जा दिया गया था, लेकिन बाद में गंगेश्वरी विधानसभा को हसनपुर विधानसभा में बदल दिया गया।
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आठ अगस्त 1947 को जब भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई तो अमरोहा तक इसकी आवाज पहुंची और आजादी के मतवाले जंग में कूद पड़े। यहां आंदोलन की कमान मुनिदेव त्यागी ने संभाली। मुनिदेव त्यागी के नेतृत्व में क्रांतिकारी टापू पर रातभर रणनीति बनाते थे और अंग्रेज सैनिकों पर हमले करने के बाद गंगा में तैरकर इसी टापू पर छिप जाते थे। तैराना नहीं आने की वजह से अंग्रेज सैनिक पानी में जाने से कतराते थे।
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मुनिदेव के नेतृत्व में उनके भाई पृथ्वी सिंह, कैलाश देव त्यागी, गंगाराम, राजेश्वर सिंह, मुंशी सिंह, छज्जू सिंह, सिद्धार्थ सिंह, मुकुट बिहारीलाल शर्मा, सरवन सिंह, वेद राम, ध्यान सिंह, पूरन सिंह, बाबू सिंह, नरेंद्र सिंह, रामचरण शर्मा, अजब सिंह आदि ने टीम बनाई। उन्होंने गांव-गांव पहुंचकर आंदोलन की आवाज बुलंद की।
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लाल बहादुर शास्त्री के गुरु को कंधे पर बैठाकर मंजिल तक पहुंचाया था
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में खादर क्षेत्र गंगा नदी के किनारे आसपास के गांवों में बाढ़ आई हुई थी। दूर-दूर तक पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। लाल बहादुर शास्त्री के गुरु प्रोफेसर रामशरण युवाओं में जोश भरने गंगेश्वरी गांव आए थे। उनके पैरों में जख्म हो गए थे और वे चलने में असमर्थ थे। तब मुनिदेव त्यागी ने उन्हें कंधे पर बैठाकर 12 किलोमीटर दूर गांव बरतौरा पहुंचाया था। मुनिदेव के बेटे एडवोकेट महेश चंद्र त्यागी ने बताया कि उस समय उनके पिता की उम्र करीब 28 साल थी। यह उनके परिवार व क्षेत्र के लोगों के लिए गर्व की बात है कि देश की आजादी में उनके पिता ने अहम योगदान दिया।
जेल से लेकर अर्थदंड तक की झेली सजा
पुत्र महेश चंद्र त्यागी का कहना है कि अंग्रेजों से बगावत के चलते मुनिदेव त्यागी को दो जून 1941 को छह माह की कैद और 250 रुपये का अर्थदंड की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद फिर उन्हें 23 जनवरी 1947 को एक वर्ष की सजा सुनाई गई। दो दिसंबर 1980 को मुनिदेव त्यागी का निधन हो गया था।
आजादी के बाद जिला बोर्ड के अध्यक्ष रहे मुनिदेव
महेश चंद्र त्यागी ने बताया कि आजादी के बाद 1948 से 1962 तक उनके पिता लगातार 14 साल जिला बोर्ड के अध्यक्ष रहे। इसके बाद जिला बोर्ड को जिला पंचायत बना दिया गया। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया था, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने उनके लिए कुछ नहीं किया। हालांकि, बाद में सिविल लाइंस में महिला थाना के पास मुनिदेव त्यागी के नाम से स्मृति द्वारा जरूर बनाया गया।
आजादी के बाद जलाई शिक्षा की अलख
देश के आजाद होने के बाद मुनिदेव त्यागी ने 1958 में विद्यालय की स्थापना की। जो आज ग्रामोदय इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है। गंगेश्वरी गांव को ब्लॉक का दर्जा भी उन्हीं की याद में दिया गया था। गंगेश्वरी को पहले विधानसभा का भी दर्जा दिया गया था, लेकिन बाद में गंगेश्वरी विधानसभा को हसनपुर विधानसभा में बदल दिया गया।