जौन एलिया: पाकिस्तान जाने के बाद भी अमरोहा की इस नदी को नहीं भूल पाए..लिखा था बान तुम अब भी बह रही हो
Jaun Elia Death Anniversary: सैयद जौन असगर जौन एलिया यानि जौन एलिया का जन्म 14 दिसंबर 1931 को अमरोहा मोहल्ला लकड़ा मोहल्ला में हुआ। उनका संबंध दरबार शाह विलायत लकड़ा में कयाम पजीर अमरोहा के एक मशहूर अदबी घराने से था। उनके पिता अल्लामा सैयद शफीक हसन एलिया उस भी अपने दौर के विद्वान शायर थे।
विस्तार
सात समंदर पार भी अपनी शायरी के दौरान उन्होंने खुद को मंच से अमरोहा का ही शायर कहा। सैयद जौन असगर जौन एलिया यानि जौन एलिया। 14 दिसंबर 1931 को अमरोहा मोहल्ला लकड़ा मोहल्ला में इनका जन्म हुआ। उनका संबंध दरबार शाह विलायत लकड़ा में कयाम पजीर अमरोहा के एक मशहूर अदबी घराने से था। उनके पतता अल्लामा सैयद शफीक हसन ऐलिया उस भी अपने दौर के विद्वान शायर थे।
1957 में वह पाकिस्तान के कराची में जाकर बस गए थे। लेकिन, वहां रहकर भी अमरोहा उनके दिलों दिमाग में बसा रहा। उनकी शायरी में भी अमरोहा से बिछड़ने की टीस झलकती थी। यही वजह है कि उनका अमरोहा आना जाना लगा रहा। आखिरी बार वह 1999 में अमरोहा आए। जो अमरोहा के लिए उनका आखिरी सफर रहा। वह अपनी शायरी में अमरोहा से दूर होने का दर्द बयान करते रहे। आठ नवंबर 2002 को उनका देहांत हो गया।
समुंदर की बहती लहरों के बीच याद आई बान नदी
लकड़ा में उनके मकान की देखभाल करने वाले 70 वर्षीय निहाल जाफर ने बताया कि पाकिस्तान जाने के बाद वह अमरोहा में तीन से चार बार आए। आखिरी बार वह 1999 में अपने पुश्तैनी मकान पर पहुंचे। उनसे बातचीत हुई तो उन्होंने बान नदी का जिक्र किया। बताया कि बचपन में दोस्तों संग वह अमरोहा के बाहरी छोर से गुजर रही बान नदी पर काफी समय बिताते थे।पाकिस्तान के कराची में समुंदर किनारे बैठकर यहां की बान नदी बहुत याद आई। जिसके बाद उन्होंने लिखा इस समंदर पे तृष्णाकाम हूं मैं, बान तुम अब भी बह रही हो क्या। आज उनका मकान पूरी तरह सुना है। निहाल ही घर की देखभाल करते हैं। बताते हैं कि उनके परिवार का कोई व्यक्ति अब यहां नहीं रहता है। कमाल अमरोही उनके तहेरे भाई थे। कमाल अमरोही की बेटी ही कभी-कभार यहां आती रहती हैं। जो अधिकतर मुंबई और पुणे रहती हैं।
अमरोहा की धरती पहुंचते ही किया सजदा
जौन एलिया के पड़ोसी और मोहल्ला लकड़ा निवासी सिराज नकवी ने बताया कि पाकिस्तान कराची जाने के बाद 18 वर्ष बाद वह 1975 में अमरोहा लौटे थे। उन्होंने अमरोहा पहुंचते ही सबसे पहले यहां की धरती को सजदा किया था। अमरोहा पहुंचने पर लिखा था- इस गली ने यह कहकर सब्र किया, जाने वाले यहां के थे ही नहीं।
अब हमारा मकान किसका है, हम तो अपने मकां के थे ही नहीं। बताया कि अमरोहा में अपने स्वागत से वह चिढ़ते थे क्योंकि, वह खुद को इसी जमीन का मानते थे। एलिया से उनकी मुलाकात उनके चाचा ने कराई थी। वह बातों ही बातों में गजल लिख दिया करते थे। उन्हें हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, अरबी और फारसी का भी ज्ञान था।
समय के साथ सूख गई बान नदी
जिस बान नदी के पानी की लहरों के साथ जौन एलिया अपना समय व्यतीत करते थे। वह नदी आज सूख चुकी है। यह नदी अमरोहा के बाहरी छोर से होते हुए कैलसा और मुरादाबाद को गुजर रही है। समय के साथ आज यह नदी भी सूख गई है। कई बार स्थानीय लोग इस नदी के जीर्णोद्धार की मांग कर चुके हैं, लेकिन होता कुछ नहीं।
प्रमुख शायरी
मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बसखुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।
मैं जो हूं जौन एलिया हूं, जनाब।
इसका बहुत लिहाज कीजेगा
हम आंधियों के वन में किसी कारवां के थे
जाने कहां से आए हैं, जाने कहां के थे।
हम तो जैसे यहां के थे ही नहीं
धूप थे साइबां के थे ही नहीं।
मत पूछो कितना गमगीं है गंगा जी और जमुना जी
क्या मैं तुमको याद नहीं हूं गंगा जी और जमुना जी