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Amroha News: टूट रही थी जिंदगी की आस मां की किडनी ने फिर दी सांस
Mon, 13 Oct 2025 02:14 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
Updated Mon, 13 Oct 2025 02:14 AM IST
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अमरोहा। मां के संतान के प्रति स्नेह और समर्पण को शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता। यह सही है कि मुनव्वर राना समेत तमाम शायरों व कवियों ने मां के लगाव को जज्बातों की स्याही में कलम डुबोकर लिखा है लेकिन अथाह प्रेम से लवरेज मां की भावनाओं को लिखने में एक किताब के पेज भी कम पड़ जाएंगे।
संतान के लिए मां के त्याग के बेशुमार उदाहरण हैं। कुछ ऐसी ही नायाब मिसालें हैं अमरोहा के सीएमओ दफ्तर के रिकॉर्ड में। जहां मां के गुर्दों (किडनी) से बेटों के फेफड़ों को सांसें मिल रही हैं।
जिले में एक नहीं बल्कि ऐसे चार मामले हैं, जहां बचपन से सहारा देकर बेटे को खुद के पैरों पर खड़ा करने वाली माताओं ने दुआओं के साथ संतान को अपनी किडनी से भी नवाजा। इस तरह की घटनाएं साबित करती हैं कि भले ही हम कितने भी लंबे-चौड़े हो जाएं, मां जितने बड़े नहीं हो सकते। आइए जानें, अमरोहा जिले की ऐसी माताओं के बारे में जिन्होंने जिंदगी की टूटती आस के बीच बेटों को मजबूत सांस दी।
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विकास को मिला मां के गुर्दे का विश्वास
विकास कुमार की उम्र 30 साल के आसपास है। हसनपुर तहसील क्षेत्र के पीपली दाऊद गांव निवासी विकास को अचानक जानकारी हुई कि गुर्दे काम नहीं कर रहे। काफी इलाज से भी हाल नहीं सुधरा। जिंदगी बचाने के लिए डायलिसिस जीवन का हिस्सा बन गई। बेटे की यह स्थिति मां निर्वेश देवी (48) से देखी नहीं गई। विकास को बचाने के लिए उन्होंने अपना गुर्दा देने का निर्णय लिया। सीएमओ कार्यालय ने परिवार की स्थिति समझते हुए प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। जिला स्तरीय समिति की अनुमति के बाद किडनी ट्रांसप्लांट में कामयाबी मिल गई।
साइन के त्याग ने दिया शाहनवाज को नया जीवन
हसनपुर क्षेत्र के ही कटाई गांव में रहने वाले शाहनवाज (38) की दोनों किडनी खराब हो गई थीं। लंबे समय तक इलाज के बाद भी शाहनवाज की हालत में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद डायलिसिस पर निर्भर होना पड़ा लेकिन यह जीवन का स्थायी विकल्प नहीं था। किडनी देने के लिए कोई आगे नहीं आया। इसके बाद शहनवाज की 54 वर्षीय मां साइन जहां ने अपनी किडनी देकर बेटे को सुरक्षा कवच देने का फैसला किया। मां के इस फैसले को जिला स्तरीय प्राधिकरण की टीम ने स्वीकार किया। इसके बाद किडनी प्रत्यारोपित हो गई।
सविता ने बचाईं बेटे हर्ष की खुशियां
अमरोहा देहात थानाक्षेत्र के मिलक बिकनी में कुलदीप कुमार के परिवार में पत्नी सविता के अलावा बेटा हर्ष (21) और एक बेटी है। पढ़ाई में होनहार हर्ष ने वर्ष 2022 में सीबीएसई से इंटर की परीक्षा 80 प्रतिशत से अधिक अंक पाकर उत्तीर्ण की थी। इसके बाद परिवार वालों ने स्नातक की पढ़ाई के लिए दाखिला कराया लेकिन तबीयत बिगड़ने आगे की पढ़ाई आगे बढ़ने में दिक्कत आने लगी। मेरठ-दिल्ली स्तर पर हुई जांचों से पता चला कि हर्ष के दोनों गुर्दे काम नहीं कर रहे। कम उम्र बेटे की मुसीबत समझते हुए मां सविता ने बेझिझक अपनी किडनी देकर प्रत्यारोपण की प्रक्रिया पूरी कराई।
रिहान को मिला मां के गुर्दे से जहान
मां और बेटे के स्नेह का एक बड़ा उदाहरण गांव सिहाली जागीर का है। यह गांव भी हसनपुर तहसील क्षेत्र का है। सिहाली जागीर के एक परिवार के होश तब उड़ गए जब बीमार बेटे रिहान की जांच में पता चला कि महज 13 साल की उम्र में उसके गुर्दों ने काम करना बंद कर दिया है। बेटे को एक गुर्दे का दान जुटाने के लिए परिवार के सदस्यों ने काफी कोशिशें कीं लेकिन सफल नहीं हुए। आखिर में मां महजबीन बेटे की जिंदगी बचाने के लिए आगे आईं। किडनी देकर बेटे रिहान की खुशियों का जहान हरा-भरा कर दिया। सरकारी स्तर से हरी झंडी मिलते ही सबके चेहरे पर खुशी छा गई।
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संतान के लिए मां के त्याग के बेशुमार उदाहरण हैं। कुछ ऐसी ही नायाब मिसालें हैं अमरोहा के सीएमओ दफ्तर के रिकॉर्ड में। जहां मां के गुर्दों (किडनी) से बेटों के फेफड़ों को सांसें मिल रही हैं।
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जिले में एक नहीं बल्कि ऐसे चार मामले हैं, जहां बचपन से सहारा देकर बेटे को खुद के पैरों पर खड़ा करने वाली माताओं ने दुआओं के साथ संतान को अपनी किडनी से भी नवाजा। इस तरह की घटनाएं साबित करती हैं कि भले ही हम कितने भी लंबे-चौड़े हो जाएं, मां जितने बड़े नहीं हो सकते। आइए जानें, अमरोहा जिले की ऐसी माताओं के बारे में जिन्होंने जिंदगी की टूटती आस के बीच बेटों को मजबूत सांस दी।
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विकास को मिला मां के गुर्दे का विश्वास
विकास कुमार की उम्र 30 साल के आसपास है। हसनपुर तहसील क्षेत्र के पीपली दाऊद गांव निवासी विकास को अचानक जानकारी हुई कि गुर्दे काम नहीं कर रहे। काफी इलाज से भी हाल नहीं सुधरा। जिंदगी बचाने के लिए डायलिसिस जीवन का हिस्सा बन गई। बेटे की यह स्थिति मां निर्वेश देवी (48) से देखी नहीं गई। विकास को बचाने के लिए उन्होंने अपना गुर्दा देने का निर्णय लिया। सीएमओ कार्यालय ने परिवार की स्थिति समझते हुए प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। जिला स्तरीय समिति की अनुमति के बाद किडनी ट्रांसप्लांट में कामयाबी मिल गई।
साइन के त्याग ने दिया शाहनवाज को नया जीवन
हसनपुर क्षेत्र के ही कटाई गांव में रहने वाले शाहनवाज (38) की दोनों किडनी खराब हो गई थीं। लंबे समय तक इलाज के बाद भी शाहनवाज की हालत में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद डायलिसिस पर निर्भर होना पड़ा लेकिन यह जीवन का स्थायी विकल्प नहीं था। किडनी देने के लिए कोई आगे नहीं आया। इसके बाद शहनवाज की 54 वर्षीय मां साइन जहां ने अपनी किडनी देकर बेटे को सुरक्षा कवच देने का फैसला किया। मां के इस फैसले को जिला स्तरीय प्राधिकरण की टीम ने स्वीकार किया। इसके बाद किडनी प्रत्यारोपित हो गई।
सविता ने बचाईं बेटे हर्ष की खुशियां
अमरोहा देहात थानाक्षेत्र के मिलक बिकनी में कुलदीप कुमार के परिवार में पत्नी सविता के अलावा बेटा हर्ष (21) और एक बेटी है। पढ़ाई में होनहार हर्ष ने वर्ष 2022 में सीबीएसई से इंटर की परीक्षा 80 प्रतिशत से अधिक अंक पाकर उत्तीर्ण की थी। इसके बाद परिवार वालों ने स्नातक की पढ़ाई के लिए दाखिला कराया लेकिन तबीयत बिगड़ने आगे की पढ़ाई आगे बढ़ने में दिक्कत आने लगी। मेरठ-दिल्ली स्तर पर हुई जांचों से पता चला कि हर्ष के दोनों गुर्दे काम नहीं कर रहे। कम उम्र बेटे की मुसीबत समझते हुए मां सविता ने बेझिझक अपनी किडनी देकर प्रत्यारोपण की प्रक्रिया पूरी कराई।
रिहान को मिला मां के गुर्दे से जहान
मां और बेटे के स्नेह का एक बड़ा उदाहरण गांव सिहाली जागीर का है। यह गांव भी हसनपुर तहसील क्षेत्र का है। सिहाली जागीर के एक परिवार के होश तब उड़ गए जब बीमार बेटे रिहान की जांच में पता चला कि महज 13 साल की उम्र में उसके गुर्दों ने काम करना बंद कर दिया है। बेटे को एक गुर्दे का दान जुटाने के लिए परिवार के सदस्यों ने काफी कोशिशें कीं लेकिन सफल नहीं हुए। आखिर में मां महजबीन बेटे की जिंदगी बचाने के लिए आगे आईं। किडनी देकर बेटे रिहान की खुशियों का जहान हरा-भरा कर दिया। सरकारी स्तर से हरी झंडी मिलते ही सबके चेहरे पर खुशी छा गई।