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Amethi News: श्रीकृष्ण की शरण में जाने से दूर हो जाते हैं कष्ट
Tue, 07 Jan 2025 12:20 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
Updated Tue, 07 Jan 2025 12:20 AM IST
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अमेठी सिटी। भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाने से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ये बातें गौरीगंज शहर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन सोमवार को प्रवाचक सुभाष शांडिल्य महाराज ने कहीं।
प्रवाचक ने कहा कि महारास में भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाकर गोपियों का आह्वान किया और महारास लीला से ही जीवात्मा परमात्मा का मिलन हुआ। जीव और ब्रह्म के मिलने को ही महारास कहते हैं। जब जीव में अभिमान आता है तो वह भगवान से दूर हो जाता है, लेकिन जब कोई भगवान को न पाकर विरह में होता है तो श्रीकृष्ण उस पर अनुग्रह करते हैं।
प्रवाचक ने कहा कि शुकदेवजी ने परीक्षित को आसन्न मृत्यु से कुछ समय ही पूर्व रुक्मिणी-कृष्ण विवाह की कथा इसलिए सुनाई, क्योंकि यह किसी साधारण वर-कन्या का नहीं, बल्कि जीव का ईश्वर के साथ विवाह है। प्रवाचक ने कहा कि रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को पत्र लिखा कि जैसे आप निर्विकार हैं, वैसे ही मैं भी निष्काम हूं। मेरा जीवन आपको समर्पित है। कृपया आकर मेरा हाथ पकड़ कर मेरा उद्धार करें।
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रुक्मिणी की भांति जब जीव निष्काम होकर निर्विकार परमात्मा को पुकारता है तो भगवान उसका उद्धार करने में देर नहीं करते। प्रवाचक ने कहा कि प्रभु की यह लीला जीवात्मा के परमात्मा से मिलन का प्रतीक है। जीव परमात्मा का अंश हैं, भगवान को प्राप्त करने के लिए भक्ति ही एकमात्र उपाय है। उन्होंने कहा कि महारास में पांच अध्याय हैं, जो भी ठाकुरजी के इन पांच गीतों को भाव से गाता है, वह भवसागर से पार हो जाता है। इस मौके पर तमाम श्रद्धालु मौजूद रहे।
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प्रवाचक ने कहा कि महारास में भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाकर गोपियों का आह्वान किया और महारास लीला से ही जीवात्मा परमात्मा का मिलन हुआ। जीव और ब्रह्म के मिलने को ही महारास कहते हैं। जब जीव में अभिमान आता है तो वह भगवान से दूर हो जाता है, लेकिन जब कोई भगवान को न पाकर विरह में होता है तो श्रीकृष्ण उस पर अनुग्रह करते हैं।
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प्रवाचक ने कहा कि शुकदेवजी ने परीक्षित को आसन्न मृत्यु से कुछ समय ही पूर्व रुक्मिणी-कृष्ण विवाह की कथा इसलिए सुनाई, क्योंकि यह किसी साधारण वर-कन्या का नहीं, बल्कि जीव का ईश्वर के साथ विवाह है। प्रवाचक ने कहा कि रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को पत्र लिखा कि जैसे आप निर्विकार हैं, वैसे ही मैं भी निष्काम हूं। मेरा जीवन आपको समर्पित है। कृपया आकर मेरा हाथ पकड़ कर मेरा उद्धार करें।
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रुक्मिणी की भांति जब जीव निष्काम होकर निर्विकार परमात्मा को पुकारता है तो भगवान उसका उद्धार करने में देर नहीं करते। प्रवाचक ने कहा कि प्रभु की यह लीला जीवात्मा के परमात्मा से मिलन का प्रतीक है। जीव परमात्मा का अंश हैं, भगवान को प्राप्त करने के लिए भक्ति ही एकमात्र उपाय है। उन्होंने कहा कि महारास में पांच अध्याय हैं, जो भी ठाकुरजी के इन पांच गीतों को भाव से गाता है, वह भवसागर से पार हो जाता है। इस मौके पर तमाम श्रद्धालु मौजूद रहे।