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Amethi News: शहादत को सलाम, सम्मान अब भी अधूरा
Sat, 26 Jul 2025 01:11 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
Updated Sat, 26 Jul 2025 01:11 AM IST
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मुसाफिरखाना (अमेठी)। कारगिल विजय दिवस पर जब पूरा देश शौर्य को नमन कर रहा है, तब अमेठी जनपद के दादरा गांव में एक मां की आंखें नम हैं। वह अब भी इस उम्मीद में बैठी हैं कि शायद किसी दिन उनके शहीद बेटे वीरेंद्र सिंह को वह सम्मान मिल जाए, जिसका वादा 25 वर्ष पहले किया गया था।
वीरेंद्र सिंह ने वर्ष 1997 में राजपूताना राइफल्स की वर्दी पहनी थी। शुरू से ही मन में फौज में जाने का जज्बा था। गांव की गलियों में लकड़ी की बंदूक से अभ्यास करते हुए उन्होंने जो सपना देखा, उसे पूरा भी किया। वर्ष 2000 में जब कारगिल युद्ध में मोर्चा संभालने का आदेश मिला तो उन्होंने खुशी-खुशी सीमा की राह पकड़ी। सात अक्तूबर 2000 को नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी के दौरान उन्होंने प्राण न्योछावर कर दिए। गांव तक खबर एक सैन्य अधिकारी लेकर पहुंचा। पांच दिन बाद जब वीरेंद्र का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा गांव पहुंचा तो हर किसी की आंखें भर आईं। हजारों लोगों की भीड़ ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी।
नहीं पूरा हुआ वादा
शहादत के बाद बड़े-बड़े वादे किए गए। मंचों से कहा गया कि परिवार को पेट्रोल पंप मिलेगा, नौकरी दी जाएगी, जमीन और आवास भी दिया जाएगा। लेकिन आज तक केवल पौने चार लाख रुपये की आर्थिक मदद ही मिली। कोई वादा अमल में नहीं आया। वीरेंद्र सिंह के नाम पर गांव के प्राइमरी स्कूल का नाम बदलने की बात हुई थी, मगर आज भी वही पुराना नाम है। सांसद निधि से बना शहीद द्वार भी एक वाहन की टक्कर से टूट गया और अब जर्जर हाल में है। मरम्मत का कोई प्रयास नहीं किया गया।
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सिर्फ दिलासा बनकर रह गया हर वादा
शहीद की मां रामलली ने कहा कि बेटे ने देश के लिए जान दी। मंचों पर लोगों की आंखें नम थीं, मगर वादे सिर्फ भाषण तक सीमित रह गए। न किसी अधिकारी ने दरवाजा खटखटाया, न किसी योजना की फाइल चली। पेंशन भी महीनों से नहीं आई। अब तो सिर्फ भरोसा बाकी है कि शायद कोई कभी सुने।
टूटा पड़ा है शहीद द्वार
शहादत के बाद गांव के स्कूल का नाम बदलने की बात हुई थी, शहीद द्वार भी बना। लेकिन अब स्कूल पुराने नाम से चल रहा है और द्वार एक गाड़ी की टक्कर से टूट चुका है। कोई देखने नहीं आया। हर साल सेना की तरफ से सिर्फ एक फोन आता है कि सब ठीक है या नहीं।
- देवेंद्र सिंह, शहीद के भाई
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वीरेंद्र सिंह ने वर्ष 1997 में राजपूताना राइफल्स की वर्दी पहनी थी। शुरू से ही मन में फौज में जाने का जज्बा था। गांव की गलियों में लकड़ी की बंदूक से अभ्यास करते हुए उन्होंने जो सपना देखा, उसे पूरा भी किया। वर्ष 2000 में जब कारगिल युद्ध में मोर्चा संभालने का आदेश मिला तो उन्होंने खुशी-खुशी सीमा की राह पकड़ी। सात अक्तूबर 2000 को नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी के दौरान उन्होंने प्राण न्योछावर कर दिए। गांव तक खबर एक सैन्य अधिकारी लेकर पहुंचा। पांच दिन बाद जब वीरेंद्र का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा गांव पहुंचा तो हर किसी की आंखें भर आईं। हजारों लोगों की भीड़ ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी।
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नहीं पूरा हुआ वादा
शहादत के बाद बड़े-बड़े वादे किए गए। मंचों से कहा गया कि परिवार को पेट्रोल पंप मिलेगा, नौकरी दी जाएगी, जमीन और आवास भी दिया जाएगा। लेकिन आज तक केवल पौने चार लाख रुपये की आर्थिक मदद ही मिली। कोई वादा अमल में नहीं आया। वीरेंद्र सिंह के नाम पर गांव के प्राइमरी स्कूल का नाम बदलने की बात हुई थी, मगर आज भी वही पुराना नाम है। सांसद निधि से बना शहीद द्वार भी एक वाहन की टक्कर से टूट गया और अब जर्जर हाल में है। मरम्मत का कोई प्रयास नहीं किया गया।
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सिर्फ दिलासा बनकर रह गया हर वादा
शहीद की मां रामलली ने कहा कि बेटे ने देश के लिए जान दी। मंचों पर लोगों की आंखें नम थीं, मगर वादे सिर्फ भाषण तक सीमित रह गए। न किसी अधिकारी ने दरवाजा खटखटाया, न किसी योजना की फाइल चली। पेंशन भी महीनों से नहीं आई। अब तो सिर्फ भरोसा बाकी है कि शायद कोई कभी सुने।
टूटा पड़ा है शहीद द्वार
शहादत के बाद गांव के स्कूल का नाम बदलने की बात हुई थी, शहीद द्वार भी बना। लेकिन अब स्कूल पुराने नाम से चल रहा है और द्वार एक गाड़ी की टक्कर से टूट चुका है। कोई देखने नहीं आया। हर साल सेना की तरफ से सिर्फ एक फोन आता है कि सब ठीक है या नहीं।
- देवेंद्र सिंह, शहीद के भाई