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महंगाई से खत्म हो रही बटाई पर खेती की व्यवस्था
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14 : संग्रामपुर : बटाईदार के मना करने के बाद परती पड़ा खेत। -संवाद
- फोटो : AMETHI
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संग्रामपुर (अमेठी)। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिया (बटाई) खेती की प्रथा समाप्त होने केे कगार पर है। इसका मुख्य कारण डीजल के दामों में लगातार बढ़ोतरी को माना जा रहा है। पांच सालों में डीजल के दाम डेढ़ गुना तो जोताई, सिंचाई और उर्वरक के दाम ढाई से तीन गुना बढ़ने के चलते बटाईदार अब खेत अधिया पर लेने को तैयार नहीं हैं। बटाईदारों के हाथ खड़ा कर देने से अधिकांश गांवों में ऐसे लोगों के खेत खाली पड़े हैं जिनके घर के अधिकांश पुरुष सदस्य बाहर रहते हैं।
गांवों में बहुत से ऐसे परिवार निवास करते हैं जिनके घर के पुरुष सदस्य बाहर रहते हैं। ऐसे लोगों की खेती बटाईदारों के जिम्मे होती है। इसके अलावा बुजुर्ग व अन्य लोग जो खेती करने में समर्थ नहीं होते वो भी अपने खेत बटाई पर देते हैं। खेतों में फसल तैयार करने पर आने वाला पूरा खर्च (जोताई, बीज, उर्वरक व सिंचाई के अलावा मेहनत) बटाईदार को उठाना पड़ता है।
तैयार फसल भू-स्वामी व बटाईदार के बीच 50-50 प्रतिशत के हिसाब से बंटती है। इससे खेत पर मालिकाना हक रखने वालों को कुछ करना भी नहीं पड़ता और उन्हें परिवार के साल भर का राशन भी मिल जाता है। दूसरी तरफ बटाईदार भी भूमिहीन होने के बावजूद मतलब भर का अनाज पैदा कर लेता है। लेकिन पिछले पांच सालों में डीजल के दामों में आई बेतहाशा वृद्धि ने न सिर्फ बटाईदारों को इस विधा से वापस लौटने को मजबूर कर दिया है बल्कि बल्कि बड़ी संख्या में लोगों के खेत खाली पड़े हैं।
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पांच सालों में कुछ यूं बढे़ जोताई-सिंचाई के दाम
पांच साल पहले डीजल की कीमत 55 रुपये प्रति लीटर थी। वहीं मौजूदा समय 88 से 89 रुपये प्रति लीटर है। जिस समय डीजल की कीमत 55 रुपये लीटर थी उस समय ट्रैक्टर से जोताई चार से पांच सौ रुपये प्रति घंटा थी।
अब जबकि डीजल के दाम महज डेढ़ गुना ज्यादा हैं तो जोताई कल्टीवेटर से एक हजार रुपये तो रोटावेटर से 1500 रुपये प्रति घंटा हो गई है। इसी तरह पांच साल पहले इंजन से सिंचाई पहले 50 रुपये तो अब ढाई सौ रुपये प्रति घंटा हो गई है। बिजली से सिंचाई भी ढाई गुना बढ़कर 120-150 रुपये हो गई है।
बीज और उर्वरक भी डेढ़ से दो गुना महंगे
पांच साल में उर्वरक और बीज की कीमतें भी डेढ़ से दो गुना बढ़ गईं हैं। पांच साल पहले डीएपी छह से सात सौ रुपये बोरी थी तो अब यह 1200 रुपये में है। यूरिया की कीमत भी 200 रुपये से बढ़कर 266 रुपये हो गई है। इसी तरह गेहूं, धान, चना, मटर, सरसों समेत तकरीबन सभी बीज की कीमत डेढ़ से दो गुना ज्यादा हो गई है।
नहीं मिल रही फसल की वाजिब कीमत
किसानों के अनुसार इतनी मेहनत व लागत का कोई मूल्य नहीं मिल रहा है। मौजूदा समय में सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं की कीमत महज 1975 रुपये प्रति क्विंटल तो धान की कीमत 1940 रुपये प्रति क्विंटल ही मिल रही है। बाजार में फसलों की कीमत दो से तीन सौ रुपये प्रति क्विंटल कम मिलती है।
जिनके पास ट्रैक्टर वह भी परेशान
शुकुलपुर निवासी कामता प्रसाद ने बताया कि डीजल के दाम महंगे होने से ट्रैक्टर रखने का फायदा नहीं मिल रहा है। पहले जो किसान एक खेत की तीन बार जोताई कराते थे। अब वही किसान मात्र एक बार ही जोताई कराते हैं। डीजल इन पांच सालों में डेढ़ गुना हो गया है। सरकार को डीजल का दाम और कम करना चाहिए।
खेती में अब लाभ नहीं
खुशियाल तिवारी का पुरवा निवासी त्रिवेणी प्रसाद तिवारी ने बताया कि उनका खुद का ट्रैक्टर है। भाड़ा तो नही पड़ता, लेकिन डीजल के दाम बढ़ने से जोताई अब महंगी हो गई है। जिस हिसाब से डीजल महंगा हुआ है, उस हिसाब से फसल के दाम नहीं बढ़ाए गए हैं। इसलिए खेती में लाभ न के बराबर है।
बटाई पर खेती में लाभ नहीं
धोएं निवासी अभिमन्यु कुमार ने बताया कि ठेके (अधिया) पर खेत लेकर बोआई करने का काम अरसा पूर्व से करते आ रहे थे। तीन सालों में ट्रैक्टर की जोताई 100 से 300 रुपये प्रति घंटे बढ़ जाने से अब खेती में लाभ नही रहा। वहीं बिजली के दाम बढ़ने से सिंचाई भी महंगी हो गई। इस बार बटाई पर लिए गए खेत की बोआई नहीं की।
लोग बटाई पर नहीं ले रहे खेत
तिवारीपुर निवासी दुर्गा दत्त तिवारी ने बताया की नौकरी करने से खेती नही कर पाते। पहले अपने खेतों को बटाई पे दे देते थे। गांव के ही लोग अधिया पर बोआई करते थे। खेती करके आधा फसल दे देते थे। पर मौजूदा समय में गांव में कोई भी किसान अधिया पर खेत लेने को तैयार नहीं है। सभी यही कह रहे हैं कि अब इसमें कोई लाभ नहीं।
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गांवों में बहुत से ऐसे परिवार निवास करते हैं जिनके घर के पुरुष सदस्य बाहर रहते हैं। ऐसे लोगों की खेती बटाईदारों के जिम्मे होती है। इसके अलावा बुजुर्ग व अन्य लोग जो खेती करने में समर्थ नहीं होते वो भी अपने खेत बटाई पर देते हैं। खेतों में फसल तैयार करने पर आने वाला पूरा खर्च (जोताई, बीज, उर्वरक व सिंचाई के अलावा मेहनत) बटाईदार को उठाना पड़ता है।
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तैयार फसल भू-स्वामी व बटाईदार के बीच 50-50 प्रतिशत के हिसाब से बंटती है। इससे खेत पर मालिकाना हक रखने वालों को कुछ करना भी नहीं पड़ता और उन्हें परिवार के साल भर का राशन भी मिल जाता है। दूसरी तरफ बटाईदार भी भूमिहीन होने के बावजूद मतलब भर का अनाज पैदा कर लेता है। लेकिन पिछले पांच सालों में डीजल के दामों में आई बेतहाशा वृद्धि ने न सिर्फ बटाईदारों को इस विधा से वापस लौटने को मजबूर कर दिया है बल्कि बल्कि बड़ी संख्या में लोगों के खेत खाली पड़े हैं।
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पांच सालों में कुछ यूं बढे़ जोताई-सिंचाई के दाम
पांच साल पहले डीजल की कीमत 55 रुपये प्रति लीटर थी। वहीं मौजूदा समय 88 से 89 रुपये प्रति लीटर है। जिस समय डीजल की कीमत 55 रुपये लीटर थी उस समय ट्रैक्टर से जोताई चार से पांच सौ रुपये प्रति घंटा थी।
अब जबकि डीजल के दाम महज डेढ़ गुना ज्यादा हैं तो जोताई कल्टीवेटर से एक हजार रुपये तो रोटावेटर से 1500 रुपये प्रति घंटा हो गई है। इसी तरह पांच साल पहले इंजन से सिंचाई पहले 50 रुपये तो अब ढाई सौ रुपये प्रति घंटा हो गई है। बिजली से सिंचाई भी ढाई गुना बढ़कर 120-150 रुपये हो गई है।
बीज और उर्वरक भी डेढ़ से दो गुना महंगे
पांच साल में उर्वरक और बीज की कीमतें भी डेढ़ से दो गुना बढ़ गईं हैं। पांच साल पहले डीएपी छह से सात सौ रुपये बोरी थी तो अब यह 1200 रुपये में है। यूरिया की कीमत भी 200 रुपये से बढ़कर 266 रुपये हो गई है। इसी तरह गेहूं, धान, चना, मटर, सरसों समेत तकरीबन सभी बीज की कीमत डेढ़ से दो गुना ज्यादा हो गई है।
नहीं मिल रही फसल की वाजिब कीमत
किसानों के अनुसार इतनी मेहनत व लागत का कोई मूल्य नहीं मिल रहा है। मौजूदा समय में सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं की कीमत महज 1975 रुपये प्रति क्विंटल तो धान की कीमत 1940 रुपये प्रति क्विंटल ही मिल रही है। बाजार में फसलों की कीमत दो से तीन सौ रुपये प्रति क्विंटल कम मिलती है।
जिनके पास ट्रैक्टर वह भी परेशान
शुकुलपुर निवासी कामता प्रसाद ने बताया कि डीजल के दाम महंगे होने से ट्रैक्टर रखने का फायदा नहीं मिल रहा है। पहले जो किसान एक खेत की तीन बार जोताई कराते थे। अब वही किसान मात्र एक बार ही जोताई कराते हैं। डीजल इन पांच सालों में डेढ़ गुना हो गया है। सरकार को डीजल का दाम और कम करना चाहिए।
खेती में अब लाभ नहीं
खुशियाल तिवारी का पुरवा निवासी त्रिवेणी प्रसाद तिवारी ने बताया कि उनका खुद का ट्रैक्टर है। भाड़ा तो नही पड़ता, लेकिन डीजल के दाम बढ़ने से जोताई अब महंगी हो गई है। जिस हिसाब से डीजल महंगा हुआ है, उस हिसाब से फसल के दाम नहीं बढ़ाए गए हैं। इसलिए खेती में लाभ न के बराबर है।
बटाई पर खेती में लाभ नहीं
धोएं निवासी अभिमन्यु कुमार ने बताया कि ठेके (अधिया) पर खेत लेकर बोआई करने का काम अरसा पूर्व से करते आ रहे थे। तीन सालों में ट्रैक्टर की जोताई 100 से 300 रुपये प्रति घंटे बढ़ जाने से अब खेती में लाभ नही रहा। वहीं बिजली के दाम बढ़ने से सिंचाई भी महंगी हो गई। इस बार बटाई पर लिए गए खेत की बोआई नहीं की।
लोग बटाई पर नहीं ले रहे खेत
तिवारीपुर निवासी दुर्गा दत्त तिवारी ने बताया की नौकरी करने से खेती नही कर पाते। पहले अपने खेतों को बटाई पे दे देते थे। गांव के ही लोग अधिया पर बोआई करते थे। खेती करके आधा फसल दे देते थे। पर मौजूदा समय में गांव में कोई भी किसान अधिया पर खेत लेने को तैयार नहीं है। सभी यही कह रहे हैं कि अब इसमें कोई लाभ नहीं।