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हाल्ट पर ट्रेनों के न रुकने से किसान, छात्र व व्यापारी परेशान

Wed, 24 Nov 2021 11:18 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 24 Nov 2021 11:18 PM IST
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Farmers, students and traders upset due to non-stop of trains at halts
संग्रामपुर (अमेठी)। कोरोना काल से पैसेंजर ट्रेनों का संचालन बंद होने से सहजीपुर स्थित रेलवे हाल्ट निष्प्रयोज्य साबित हो रहा है। कोरोना काल से लेकर अब तक यहां एक भी ट्रेन का ठहराव नहीं हो रहा है। इससे यहां के लोगों को मिसरौली व अंतू रेलवे स्टेशन जाना पड़ता है।
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लखनऊ-वाराणसी रेल मार्ग पर संग्रामपुर ब्लॉक क्षेत्र के मिसरौली स्टेशन के आगे यात्रियों की सुविधा के लिए सहजीपुर में हाल्ट बनाया गया था। ट्रेनों का ठहराव न होने से सहजीपुर हाल्ट की रौनक फीकी पड़ने के साथ वह वीरान सा हो गया है। 22 मार्च 2020 से कोविड की रोकथाम के लिए देशभर में लॉकडाउन लगाए जाने के बाद से ट्रेनों का परिचालन बंद कर दिया गया था।
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लॉकडाउन में पैसेंजर ट्रेनों के पहिए क्या थमे, संग्रामपुर के बहुत से किसानों की आमदनी ही कम हो गई। पहले वे कम भाड़े में अपने गांव के अलावा आसपास के जिलों और कस्बों की मंडी तक अपने उत्पाद पहुंचा देते थे। लॉकडाउन से पहले पैसेंजर ट्रेनों के माध्यम से हर रोज संग्रामपुर के अम्मरपुर, धोएं, तिवारीपुर, मोहनपुर, पातीपुर, खौपुर, सहजीपुर व कोलवा समेत कई गांवों के किसान हर सुबह यहां रुकने वाली पैसेंजर ट्रेनों से एक-दो बोरी सब्जी भरकर ले जाते थे और शाम को उसी ट्रेन से लौट आते थे।
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आसपास के जिलों तक इस आवागमन में उनके बमुश्किल 20 से 30 रुपये खर्च होते थे। ऐसे में उनकी बचत ज्यादा होती थी और सब्जी बेचने के स्थान भी बढ़ जाते थे। लॉकडाउन से पहले मिसरौली व सहजीपुर हाल्ट से किसान प्रतापगढ़, अमेठी, प्रयागराज, रायबरेली, लखनऊ व वाराणसी आदि शहरों में आसानी से जाकर व्यापारिक कार्य संपादित करते थे।
सड़क मार्ग से आने-जाने में उन्हें अधिक किराया देना पड़ता है। सब्जी की एक-दो बोरी परिवहन में सड़क मार्ग और पैसेंजर ट्रेन के भाड़े में पांच गुना का अंतर पड़ता है। सहजीपुर हाल्ट से ट्रेन के परिचालन से दैनिक यात्री से लेकर व्यवसायी, छात्र-छात्राओं व किसान, सभी को सहूलियत मिलती थी। हालांकि सामान्य यात्रियों की संख्या कम रहती थी।
व्यवसायी राहुल के अनुसार उनकी दुकान सहजीपुर में है। पहले अमेठी और प्रतापगढ़ से दुकान का सामान पैसेंजर ट्रेन से लेकर आ जाते थे। इसमें खर्च भी बहुत कम होता था लेकिन ट्रेन का संचालन न होने से अब परेशानी उठानी पड़ रही है। सरकार को पैसेंजर ट्रेनों का संचालन जल्द बहाल करना चाहिए।
छात्र उत्कर्ष कुमार कहते हैं कि पढ़ने के लिए अमेठी जाने के लिए पहले बहुत सहूलियत मिलती थी। घर के समीप से निर्धारित समय पर ट्रेन मिल जाती थी। पहले 10 रुपये में स्कूल पहुंच जाते थे अब ऑटो वाले 30 रुपये किराया लेते हैं और मानक से ज्यादा सवारी भी बैठाते हैं। मानक से अधिक सवारी बैठाने से हादसे का डर बना रहता है।

सब्जी व्यवसायी पप्पू पांडेय बताते हैं कि पहले कम पैसे में एक-दो बोरी सब्जी मंडी लेकर चले जाते थे। किराया भी बहुत कम लगता था। अब पांच गुना किराया लगता है। ऐसे में अब वह बाहर की मंडी में सब्जी नहीं ले जा पा रहे हैं। स्थानीय बाजार में ही मजबूरन सब्जी बेचनी पड़ती है। पैसेंजर ट्रेनों के परिचालन से बहुत राहत मिलती थी।
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