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महंगाई से जूझ रहे देवी प्रतिमाओं के शिल्पकार
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07 : संग्रामपुर : मां की मूर्ति तैयार करता शिल्पकार। -संवाद
- फोटो : AMETHI
संग्रामपुर (अमेठी)। नवरात्र पर्व व दुर्गापूजा पांडालों में स्थापित होने वाली प्रतिमाओं को बनाने वाले शिल्पकार महंगाई से जूझ रहे हैैं। बावजूद इसके कुछ कलाकार पुश्तैनी धंधे को छोड़ नहीं पा रहे। मूर्तियों में जान डालने वाले इन शिल्पकारों के चेहरे पर महंगाई की बेबसी साफ झलकती है। बेबसी इस बात को लेकर भी है कि मूर्ति बनाने में प्रयुक्त होने वाले सामान के दाम भले ही बढ़ गए लेकिन कोरोना व अन्य वजहों से मूर्तियों के दाम दो साल पहले जितने हैं।
शिल्पकार प्रमोद कुमार मौर्य अमेठी-किठावर मार्ग पर बड़गांव में मूर्तियों को बनाने व बेचने का काम करते हैं। प्रमोद ऐसे कलाकर हैं जिनकी बनाई हुई दुर्गा व अन्य प्रतिमाओं को देखकर किसी के भी मुंह से वाह निकल जाए। हर कोई उनके काम की तारीफ करता है।
मंगलवार को बातचीत में प्रमोद ने बताया कि उनके यहां करीब तीस बड़ी प्रतिमाएं तैयार की जा रही है। घर वालों के अलावा कुछ अन्य कलाकार अपनी कला को उकेरने में लगे हैं, मगर अभी तक जिस तरह ऑर्डर आ रहे हैं उसको देख ऐसा लग रहा है कुछ प्रतिमाएं यहीं रखी रह जाएंगी।
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प्रतिमाओं की कीमत पर प्रमोद का कहना था कि जो सोचा था उससे काफी कम रकम मिलने की उम्मीद है। घाटा हो जाए तो कुछ आश्चर्य नहीं होगा। पर क्या करें। पुश्तैनी धंधा है। इसको बंद करना भी अच्छा नहीं लगता। इसी काम का हुनर होने की वजह से उनकी मजबूरी भी है। मूर्तियों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के मूल्य एक वर्ष में दोगुने हो गए हैं, जबकि मूर्तियों के दाम वही हैं।
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शिल्पकार प्रमोद कुमार मौर्य अमेठी-किठावर मार्ग पर बड़गांव में मूर्तियों को बनाने व बेचने का काम करते हैं। प्रमोद ऐसे कलाकर हैं जिनकी बनाई हुई दुर्गा व अन्य प्रतिमाओं को देखकर किसी के भी मुंह से वाह निकल जाए। हर कोई उनके काम की तारीफ करता है।
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मंगलवार को बातचीत में प्रमोद ने बताया कि उनके यहां करीब तीस बड़ी प्रतिमाएं तैयार की जा रही है। घर वालों के अलावा कुछ अन्य कलाकार अपनी कला को उकेरने में लगे हैं, मगर अभी तक जिस तरह ऑर्डर आ रहे हैं उसको देख ऐसा लग रहा है कुछ प्रतिमाएं यहीं रखी रह जाएंगी।
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प्रतिमाओं की कीमत पर प्रमोद का कहना था कि जो सोचा था उससे काफी कम रकम मिलने की उम्मीद है। घाटा हो जाए तो कुछ आश्चर्य नहीं होगा। पर क्या करें। पुश्तैनी धंधा है। इसको बंद करना भी अच्छा नहीं लगता। इसी काम का हुनर होने की वजह से उनकी मजबूरी भी है। मूर्तियों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के मूल्य एक वर्ष में दोगुने हो गए हैं, जबकि मूर्तियों के दाम वही हैं।