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पैदल मार्च निकाल कर फातिमा शेख को किया याद
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राजेसुल्तानपुर (अंबेडकरनगर)। फातिमा शेख की जयंती पर नौजवान भारत सभा के बैनर तले पैदल मार्च का आयोजन किया गया। इस मौके पर नेवारी दुराजपुर में पैदल मार्च निकालने के साथ ही कई जगह नुक्कड़ सभा भी हुई। वक्ताओं ने कहा कि सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख ने अपने समय में जिस संघर्ष की शुरुआत की थी, वह हम सभी के लिए एक प्रेरणास्रोत है। उनके संघर्षों की रोशनी में हमें आज के समय में सबको एक समान एवं नि:शुल्क शिक्षा दिलवाने की मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने का संकल्प लेना चाहिए।
संगठन के प्रदेश सदस्य मित्रसेन ने कहा कि फातिमा शेख भारत की प्रथम महिला शिक्षिकाओं में से एक थी। फातिमा शेख ने अपने भाई उस्मान शेख की प्रेरणा पर पढ़ना-लिखना सीखा और सावित्रीबाई फुले के कार्यों में उनकी सहयोगी बनीं। ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को सामंतवादी ताकतों के विरोध और दबाव के चलते अपना घर तक छोड़ना पड़ा था। ऐसे में उस्मान शेख ने अपने घर में उन्हें जगह दी और वहीं पर महिलाओं के लिए स्कूल की शुरुआत भी की। उन्होंने कहा कि सावित्रीबाई फुले की तरह फातिमा शेख का कोई लेखन-कर्म, कविताएं, पत्र आदि तो नहीं मिलता है। सिर्फ सावित्रीबाई फुले ने ही अपने पत्रों में फातिमा शेख का जिक्र कर रखा है। इसी कारण फातिमा शेख के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी उपलब्ध नही है।
सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख अलग-अलग धर्मों की थीं, लेकिन उन्होंने मिलकर अपने दौर में लड़कियों की शिक्षा के लिए जो संघर्ष किया, वह आज भी एक मिसाल है। प़्रदेश कार्यकारिणी सदस्य विंद्रेश ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार नई शिक्षा नीति की आड़ में पूरी शिक्षण व्यवस्था को कॉरपोरेट घरानों के हवाले करने की साजिश रच रही है। इसी कारण फीस बढ़ाने और सीटें घटाने की मार से युवा त्रस्त हैं। इस लिए फातिमा शेख की जयंती पर सभी को एक समान एवं नि:शुल्क शिक्षा मुहैया करवाने का संकल्प लेकर इस मुहिम को सफल बनाने का कार्य करना चाहिए।
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संगठन के प्रदेश सदस्य मित्रसेन ने कहा कि फातिमा शेख भारत की प्रथम महिला शिक्षिकाओं में से एक थी। फातिमा शेख ने अपने भाई उस्मान शेख की प्रेरणा पर पढ़ना-लिखना सीखा और सावित्रीबाई फुले के कार्यों में उनकी सहयोगी बनीं। ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को सामंतवादी ताकतों के विरोध और दबाव के चलते अपना घर तक छोड़ना पड़ा था। ऐसे में उस्मान शेख ने अपने घर में उन्हें जगह दी और वहीं पर महिलाओं के लिए स्कूल की शुरुआत भी की। उन्होंने कहा कि सावित्रीबाई फुले की तरह फातिमा शेख का कोई लेखन-कर्म, कविताएं, पत्र आदि तो नहीं मिलता है। सिर्फ सावित्रीबाई फुले ने ही अपने पत्रों में फातिमा शेख का जिक्र कर रखा है। इसी कारण फातिमा शेख के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी उपलब्ध नही है।
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सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख अलग-अलग धर्मों की थीं, लेकिन उन्होंने मिलकर अपने दौर में लड़कियों की शिक्षा के लिए जो संघर्ष किया, वह आज भी एक मिसाल है। प़्रदेश कार्यकारिणी सदस्य विंद्रेश ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार नई शिक्षा नीति की आड़ में पूरी शिक्षण व्यवस्था को कॉरपोरेट घरानों के हवाले करने की साजिश रच रही है। इसी कारण फीस बढ़ाने और सीटें घटाने की मार से युवा त्रस्त हैं। इस लिए फातिमा शेख की जयंती पर सभी को एक समान एवं नि:शुल्क शिक्षा मुहैया करवाने का संकल्प लेकर इस मुहिम को सफल बनाने का कार्य करना चाहिए।
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