{"_id":"60ba67b18ebc3eb4e76c9299","slug":"no-bsp-mla-left-in-ambedkarnagar-ambedkar-nagar-news-lko5809934125","type":"story","status":"publish","title_hn":"अंबेडकरनगर में नहीं रह गया बसपा का कोई विधायक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अंबेडकरनगर में नहीं रह गया बसपा का कोई विधायक
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अंबेडकरनगर। तत्कालीन फैजाबाद जनपद को 1995 में विभक्त कर अंबेडकरनगर नाम से बने इस जनपद की पहचान बसपा के गढ़ के तौर पर दशकों से बनी है। हालांकि बदली हुई परिस्थितियों में बसपा से यह पहचान छिनती हुई नजर आ रही है। इसके चलते कार्यकर्ता मायूस हैं। कभी सभी पांच विधानसभा सीटों पर कब्जा जमाने वाली बसपा के पास अब तक सिर्फ दो सीट थी।
राम अचल राजभर और लालजी वर्मा को निकाले जाने के बाद अब बसपा का कोई विधायक जिले में नहीं रह गया है। राजनीतिक समीक्षक के साथ-साथ आम नागरिक आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ही बसपा के इस किले को ढहा मान रहे हैं। इसकी कितनी भरपाई हो पाती है यह जिले में सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरा है। बहरहाल पूरे घटनाक्रम से बसपा के ज्यादातर कार्यकर्ता और समर्थक मायूस हैं।
अंबेडकरनगर में बसपा का शुरुआती दौर यूं तो बहुत दबदबे वाला नहीं रहा, लेकिन धीरे धीरे पार्टी का गढ़ यह क्षेत्र बनने लगा। इसे देखते हुए ही 29 सितंबर 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने फैजाबाद जनपद को विभक्त कर अंबेडकरनगर जनपद के नाम से नये जिले की घोषणा की थी। बसपा नेता राम अचल राजभर और लालजी वर्मा आदि के प्रयासों से लाखों लोग जनपद घोषणा का गवाह बनने पवित्र शिवबाबा मैदान पर पहुंचे थे।
विज्ञापन
भीड़ ने बड़ा रिकार्ड कायम किया था। बसपा के प्रति नागरिकों के लगाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक समय सभी पांच विधानसभा सीट पर बसपा का कब्जा रहा। बसपा के गढ़ के तौर पर प्रसिद्ध हो चुके इस जनपद की चर्चा प्रदेश की राजनीति में तब और प्रमुखता से होने लगी जब मायावती ने वर्ष 1998 में जिले की तत्कालीन अकबरपुर सुरक्षित लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। समूचे पूर्वांचल के कार्यकर्ताओं में इससे खुशी की लहर दौड़ गई। वे बाद में 1999 और 2004 में भी लड़ीं। मायावती तीनों बार लोकसभा सीट जीतने में सफल रहीं।
बसपा का गढ़ होने का ही नतीजा था कि अपनी परंपरागत सीट के अलावा उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए भी जिले को प्राथमिकता दी। मायावती ने वर्ष 2002 में तत्कालीन जहाँगीरगंज सुरक्षित विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और विजयी रहीं। बसपा सरकार में जिले से कम से कम दो मंत्री जरूर बनाए जाते रहे, जबकि एक बार तीन मंत्री शामिल किए गए थे। लोकसभा सीट पर भी बसपा का दबदबा रहता आया है। मौजूदा समय में भी बसपा से रितेश पांडेय सांसद है।
बीते चुनाव में जब प्रदेश में बीजेपी की लहर थी तो भी पांच विधानसभा सीट में से अकबरपुर में राम अचल राजभर, कटेहरी में लालजी वर्मा और जलालपुर में रितेश पांडेय बसपा विधायक चुने जाने में सफल हुए थे। टांडा और आलापुर सीट बीजेपी के पास गई थी। बाद में जलालपुर विधायक रितेश के सांसद चुने जाने के बाद हुए उपचुनाव में सपा प्रत्याशी सुभाष राय विधायक बने। अब लालजी और राम अचल को निकाले जाने के बाद जिले में बसपा का कोई विधायक नहीं बचा है। आलापुर के पूर्व विधायक कद्दावर नेता त्रिभुवन दत्त बीते दिनों खुद ही बसपा छोड़ सपा में शामिल हो चुके हैं।
ऐसे में राजनीतिक समीक्षक और आम नागरिक इसे बसपा के ढहते हुए किले के तौर पर देख रहे हैं। कारण यह कि त्रिभुवन, राम अचल और लालजी ही जिले में लंबे समय से बसपा की रीढ़ माने जाते रहे हैं। इन तीनों के पार्टी से बाहर होने के बाद आगामी विधानसभा चुनाव बसपा के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा। उससे पहले जिला पंचायत अध्यक्ष और नौ ब्लॉक प्रमुख पद के चुनाव में भी बसपा को यह साबित करना होगा कि इन बड़े नेताओं के पार्टी से अलग होने का कोई प्रभाव परिणाम पर नहीं पड़ेगा।
विज्ञापन
राम अचल राजभर और लालजी वर्मा को निकाले जाने के बाद अब बसपा का कोई विधायक जिले में नहीं रह गया है। राजनीतिक समीक्षक के साथ-साथ आम नागरिक आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ही बसपा के इस किले को ढहा मान रहे हैं। इसकी कितनी भरपाई हो पाती है यह जिले में सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरा है। बहरहाल पूरे घटनाक्रम से बसपा के ज्यादातर कार्यकर्ता और समर्थक मायूस हैं।
विज्ञापन
अंबेडकरनगर में बसपा का शुरुआती दौर यूं तो बहुत दबदबे वाला नहीं रहा, लेकिन धीरे धीरे पार्टी का गढ़ यह क्षेत्र बनने लगा। इसे देखते हुए ही 29 सितंबर 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने फैजाबाद जनपद को विभक्त कर अंबेडकरनगर जनपद के नाम से नये जिले की घोषणा की थी। बसपा नेता राम अचल राजभर और लालजी वर्मा आदि के प्रयासों से लाखों लोग जनपद घोषणा का गवाह बनने पवित्र शिवबाबा मैदान पर पहुंचे थे।
विज्ञापन
भीड़ ने बड़ा रिकार्ड कायम किया था। बसपा के प्रति नागरिकों के लगाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक समय सभी पांच विधानसभा सीट पर बसपा का कब्जा रहा। बसपा के गढ़ के तौर पर प्रसिद्ध हो चुके इस जनपद की चर्चा प्रदेश की राजनीति में तब और प्रमुखता से होने लगी जब मायावती ने वर्ष 1998 में जिले की तत्कालीन अकबरपुर सुरक्षित लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। समूचे पूर्वांचल के कार्यकर्ताओं में इससे खुशी की लहर दौड़ गई। वे बाद में 1999 और 2004 में भी लड़ीं। मायावती तीनों बार लोकसभा सीट जीतने में सफल रहीं।
बसपा का गढ़ होने का ही नतीजा था कि अपनी परंपरागत सीट के अलावा उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए भी जिले को प्राथमिकता दी। मायावती ने वर्ष 2002 में तत्कालीन जहाँगीरगंज सुरक्षित विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और विजयी रहीं। बसपा सरकार में जिले से कम से कम दो मंत्री जरूर बनाए जाते रहे, जबकि एक बार तीन मंत्री शामिल किए गए थे। लोकसभा सीट पर भी बसपा का दबदबा रहता आया है। मौजूदा समय में भी बसपा से रितेश पांडेय सांसद है।
बीते चुनाव में जब प्रदेश में बीजेपी की लहर थी तो भी पांच विधानसभा सीट में से अकबरपुर में राम अचल राजभर, कटेहरी में लालजी वर्मा और जलालपुर में रितेश पांडेय बसपा विधायक चुने जाने में सफल हुए थे। टांडा और आलापुर सीट बीजेपी के पास गई थी। बाद में जलालपुर विधायक रितेश के सांसद चुने जाने के बाद हुए उपचुनाव में सपा प्रत्याशी सुभाष राय विधायक बने। अब लालजी और राम अचल को निकाले जाने के बाद जिले में बसपा का कोई विधायक नहीं बचा है। आलापुर के पूर्व विधायक कद्दावर नेता त्रिभुवन दत्त बीते दिनों खुद ही बसपा छोड़ सपा में शामिल हो चुके हैं।
ऐसे में राजनीतिक समीक्षक और आम नागरिक इसे बसपा के ढहते हुए किले के तौर पर देख रहे हैं। कारण यह कि त्रिभुवन, राम अचल और लालजी ही जिले में लंबे समय से बसपा की रीढ़ माने जाते रहे हैं। इन तीनों के पार्टी से बाहर होने के बाद आगामी विधानसभा चुनाव बसपा के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा। उससे पहले जिला पंचायत अध्यक्ष और नौ ब्लॉक प्रमुख पद के चुनाव में भी बसपा को यह साबित करना होगा कि इन बड़े नेताओं के पार्टी से अलग होने का कोई प्रभाव परिणाम पर नहीं पड़ेगा।