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Ambedkar Nagar News: बाढ़ से 200 से ज्यादा परिवार हो जाते हैं बेघर
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आलापुर क्षेत्र के मांझा कम्हरिया गांव किनारे से निकली सरयू नदी। संवाद
राजेसुल्तानपुर। आलापुर और टांडा क्षेत्र के लोगों के लिए बरसात के दिन किसी अभिशाप से कम नहीं होते। बाढ़ के दिनों में ग्रामीणों के लिए जिंदगी की गाड़ी को खींचना मुश्किल हो जाता है। बाढ़ में फसलें और घर छिनने के बीच सबसे बड़ी मुश्किल रिहाइश की होती है। ऐसे में लोग या तो अपने रिश्तेदाराें के घर या शरणालयों में पनाह लेने के लिए मजबूर होते हैं।
मुश्किल यहीं पर कम नहीं होती। बाढ़ खत्म होने के बाद जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। जब बाढ़ का पानी कम होता है तो दोबारा पटरी पर लाने के लिए चार से पांच महीने का वक्त लोगों को लग जाता है। एक तरफ बच्चों को पढ़ाई प्रभावित होती है, तो दूसरी ओर गिर चुके कच्चे मकानों को फिर से बनाने में जद्दोजहद करनी पड़ती है। बर्बाद हो चुकी फसलों के कारण अपने भरणपोषण के साथ जानवरों के चारे का भी संकट होता है।
200 परिवारों पर पड़ता है असर
आलापुर तहसील क्षेत्र के सरयू नदी के किनारे स्थित मांझा कम्हरिया व आराजी देवरा के एक दर्जन मजरे के लोगों को बरसात शुरू होते ही धड़कने बढ़ने लगती हैं। बाढ़ आने पर मांझा कम्हरिया और आराजी देवारा गांव के करीब दो सौ परिवारों को अपना घर बार छोड़ना पड़ता है। बद्री का पूरा निवासी राजेश निषाद ने बताया कि नदी का जलस्तर अधिक बढ़ा और पानी घरों में घुसा तो सामानों को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर वही कुछ दिनों तक अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर हो जाते हैं। अब तो लोगों के लिए जुलाई से सितंबर तक लगभग तीन माह तक बाढ़ की स्थिति में रहने के आदि हो चुके हैं।
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नाव की पड़ती है जरूरत
बाढ़ के दिनों में जब सरयू नदी का जलस्तर बढ़ता है तो यहां के लोगों के लिए नाव ही एक सहारा बनती है। ग्रामीण रोजाना नाव के सहारे ही स्कूल, बाजार, अस्पताल पहुंचते हैं। यहां के लोगों की करीब 15 से 20 दिनों तक इसी तरह गुजर बसर होती है।
इस बार की है बेहतर तैयारी
बाढ़ से बचाव के लिए प्रशासन की ओर से हरसंभव प्रयास किए जाते हैं। कई स्थानों पर बाढ़ के पानी को रोकने के काम भी कराया गया है। वहीं इस बार और बेहतर तैयारी प्रशासन की है।
- ज्योतसना बंधु, एडीएम वित्त एवं राजस्व
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मुश्किल यहीं पर कम नहीं होती। बाढ़ खत्म होने के बाद जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। जब बाढ़ का पानी कम होता है तो दोबारा पटरी पर लाने के लिए चार से पांच महीने का वक्त लोगों को लग जाता है। एक तरफ बच्चों को पढ़ाई प्रभावित होती है, तो दूसरी ओर गिर चुके कच्चे मकानों को फिर से बनाने में जद्दोजहद करनी पड़ती है। बर्बाद हो चुकी फसलों के कारण अपने भरणपोषण के साथ जानवरों के चारे का भी संकट होता है।
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200 परिवारों पर पड़ता है असर
आलापुर तहसील क्षेत्र के सरयू नदी के किनारे स्थित मांझा कम्हरिया व आराजी देवरा के एक दर्जन मजरे के लोगों को बरसात शुरू होते ही धड़कने बढ़ने लगती हैं। बाढ़ आने पर मांझा कम्हरिया और आराजी देवारा गांव के करीब दो सौ परिवारों को अपना घर बार छोड़ना पड़ता है। बद्री का पूरा निवासी राजेश निषाद ने बताया कि नदी का जलस्तर अधिक बढ़ा और पानी घरों में घुसा तो सामानों को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर वही कुछ दिनों तक अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर हो जाते हैं। अब तो लोगों के लिए जुलाई से सितंबर तक लगभग तीन माह तक बाढ़ की स्थिति में रहने के आदि हो चुके हैं।
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नाव की पड़ती है जरूरत
बाढ़ के दिनों में जब सरयू नदी का जलस्तर बढ़ता है तो यहां के लोगों के लिए नाव ही एक सहारा बनती है। ग्रामीण रोजाना नाव के सहारे ही स्कूल, बाजार, अस्पताल पहुंचते हैं। यहां के लोगों की करीब 15 से 20 दिनों तक इसी तरह गुजर बसर होती है।
इस बार की है बेहतर तैयारी
बाढ़ से बचाव के लिए प्रशासन की ओर से हरसंभव प्रयास किए जाते हैं। कई स्थानों पर बाढ़ के पानी को रोकने के काम भी कराया गया है। वहीं इस बार और बेहतर तैयारी प्रशासन की है।
- ज्योतसना बंधु, एडीएम वित्त एवं राजस्व