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न्याय व हक के लिए दर-दर भटक रहे लोग
AmbedkarNagar
Updated Tue, 20 Nov 2012 12:00 PM IST
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अंबेडकरनगर। सूबे की सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने व्यवस्था में सुधार का जो भरोसा दिलाया था, वह कम से कम इस जनपद में तो सकार होता नहीं दिख रहा है। न्याय व हक के लिए प्रतिदिन लोग मारे मारे फिर रहे हैं। सबसे बड़ी मुश्किल तो यह कि सरकारी दफ्तरों में दूर दराज से पहुंचने वाले आम लोगों का काम करने की बात तो दूर उन्हें समुचित जवाब तक देना उचित नहीं समझा जा रहा है। तमाम उम्मीदें लेकर कार्यालय पहुंचने वाले लोगों की उस मनोदशा का अंदाजा सहज ढंग से लगाया जा सकता है, जब काम न होने के साथ ही उन्हें अत्यंत रूखे व बेढंगे जवाब का सामना कर निराशा के साथ अपने कदम वापस घरों की तरफ बढ़ाने पड़ते हैं। सोमवार को ‘अमर उजाला की टीम’ ने विभिन्न कार्यालयों का जायजा लिया, तो लोग अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर परेशान दिखे। किसी का भूमि संबंधी विवाद डेढ़ दशक से नहीं तय हो पा रहा है। तो कोई अपनी पेंशन को लेकर बेहाल दिखा। एक अभिभावक अपनी पुत्री को बालिका शिक्षा मदद योजना के तहत आश्वासन के बावजूद साइकिल न मिलने को लेकर परेशान था, तो एक अन्य ग्रामीण की शिकायत थी कि बिना मान्यता के चल रहे स्कूलों को लेकर उसके द्वारा की गई शिकायत रद्दी की टोकरी में डाल दी गई।
बेवाना से आए दयाराम डीआईओएस कार्यालय में भटकते मिले। बताया कि मैंने अपनी पुत्री का बालिका शिक्षा मदद योजना के तहत आवेदन कराया था। अभी तक 10 हजार रुपये व साइकिल का लाभ नहीं मिला है। पिछले चार माह से वह डीआईओएस कार्यालय का चक्कर लगा रहा है, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही है। कर्मचारी अक्सर यहां आश्वासन ही देते हैं। जितनी बार इस कार्यालय आए, सिर्फ जल्दी ही व्यवस्था हो जाने का भरोसा दिया जाता है। नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस भागदौड़ में वह अकेला नहीं है। उसे अक्सर इस प्रकार की समस्या लेकर यहां आने वाले लोग मिलते रहते हैं।
सुरहुरपुर के वशिष्ठधर पांडेय कलक्ट्रेट में मिल गए। बताया कि जीवन के अंतिम दौर में पेंशन के लिए इतनी जिल्लत झेलनी पड़ेगी, यह सोचा नहीं था। बताया कि अक्सर ऐसा हो जाता है, जब पेंशन खाते में नहीं पहुंचती। फोन से पूछने पर समुचित जवाब नहीं दिया जाता। बताया कि कई बार कोषागार कार्यालय का चक्कर लगाना पड़ता है। कहा कि विभाग को यह प्रबंध करना चाहिए कि पेंशन धारकों को अनावश्यक मुश्किलों का सामना न करना पड़े। पेंशन धारक वैसे ही उम्र की मार से जूझ रहे होते हैं। उस पर से उन्हें बार बार दौड़ने के लिए मजबूर किया जाना उचित नहीं। सेमउर खानपुर से आए रामगोपाल शुक्ल भी कोषागार कार्यालय के निकट परेशान हालत में दिखे। कहा कि वे पेंशनधारक हैं। पेंशन मिलने से ही उन्हें कई प्रकार की राहत मिलती है। कई जरूरी काम इसी से करते हैं। ऐसे में पेंशन की जरूरत बनी रहती है। बताया कि चार माह से पेंशन नहीं गई। वे कई बार दौड़कर आ चुके हैं। कहा कि यदि सही जानकारी दे दी जाए, तो लोगों को अनावश्यक भागदौड़ न करनी पड़े। ऐसा न होने के कारण ही भागदौड़ करनी पड़ती है। बताया कि आज यहां आने पर पता चला कि जीवित प्रमाणपत्र लगाने की जरूरत है। रफीगंज से आईं शांतिदेवी ने बताया कि बुढ़ापे में भी भटकना मजबूरी बन गया है। कई चक्कर लगाने के बाद भी तीन माह से पेंशन नहीं मिली है। कहा कि उन्होंने अपने परिजनों के माध्यम से जानकारी कराई, लेकिन कोई सूचना नहीं मिली। बताया कि जानकारी करने के लिए ही कई बार उन्हें स्वयं मुख्यालय तक आना पड़ा। शांतिदेवी ने कहा कि पेंशनधारकों के लिए ऐसा प्रबंध करना चाहिए, जिससे उन्हें अनावश्यक दौड़ न लगानी पड़े। सत्यापन व अन्य कार्यों की सुविधा तहसील या ब्लॉक मुख्यालय पर उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है। फाजिलपुर के पंकज मिश्र डीएम कार्यालय के समक्ष मिले। बताया कि लगभग दो माह पूर्व बिना मान्यता के क्षेत्र में चल रहे विद्यालयों की जानकारी डीएम को पत्र लिखकर दी थी। विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहे खेल की जानकारी देने के साथ ही कार्रवाई की मांग की गई थी, लेकिन अब तक कुछ नहीं हो सका। बीच में वे एक बार जानकारी करने यहां आए थे, लेकिन कर्मचारियों ने कुछ नहीं बताया। पंकज ने कहा कि वे आज अपने प्रार्थनापत्र के बारे में फिर से जानकारी करने आए हैं, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी उनके प्रार्थनापत्र पर क्या कार्रवाई हुई, यह जानकारी नहीं मिल पाई है। बनियानी निवासी मोहम्मद शमीम चकबंदी दफ्तर के सामने भूमि पर बैठे मिले। बताया कि उनकी पांच बीघा पैतृक भूमि है। उस पर चकबंदी न्यायालय में मुकदमा चला आ रहा है। लगभग 15 वर्ष हो है, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है। फैसले के इंतजार में तमाम उम्मीदें टूट चुकी हैं। कहा कि मामलों के निस्तारण में तेजी आखिर आए भी तो कैसे? अक्सर यहां अधिकारी ही मौजूद नहीं रहते। उनके अनुपस्थित रहने पर अगली तारीख लगा दी जाती है। यदि तारीख पर अफसर बैठे भी, तो कई बार पूरी तरह सुनवाई नहीं हो पाती। इस मामले में उसे न्याय कब मिल पाएगा, यह समझ में नहीं आ रहा। रामपुर के राम खिलावन भी चकबंदी दफ्तर न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचे थे। कहा कि बाबू अब तो चक्कर लगाते-लगाते पैर भी थक गए, लेकिन न्याय नहीं मिल पाया। अब तो मुकदमा नाम से ही डर लगने लगा है। बताया कि उसकी एक भूमि पर लगभग 20 वर्ष से केस चल रहा है। इसका हल होने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है। कर्मचारियों पर मनमानी का आरोप लगाते हुए कहा कि कई बार तो नकल निकलवाने तक में पसीने छूट गए। राम खिलावन ने कहा कि मुकदमों के निस्तारण के लिए समयबद्ध कार्यक्रम बनाए जाने की जरूरत है। रसूलपुर से आए वंशराज ने बताया कि चकबंदी न्यायालय में उनकी लगभग चार बिस्वा भूमि का मुकदमा 12 वर्षों से चल रहा है। कहा कि एक-एक तारीख पर आते-आते कई चप्पल घिस गईं। लेकिन अब तक न्याय नहीं मिल पाया। अधिकारियों व कर्मचारियों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि निस्तारण की तरफ गंभीरता नजर नहीं आती। वंशराज ने कहा कि एक तरफ तो त्वरित व सस्ते न्याय की बात की जाती है, तो दूसरी तरफ मामलों के जल्द निस्तारण की तरफ गंभीरता नहीं दिखाई जाती। कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने की जरूरत है।
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___जिलाधिकारी निधि केसरवानी ने कहा कि वे कार्यालयों में समयबद्ध ढंग से समस्याओं का निस्तारण कराने का प्रयास कर रही हैं। तहसीलों में आने वाली शिकायतों को इसी ढंग से निस्तारित कराया जा रहा है। सभी कार्यालयों को भी निर्देश हैं कि वे शिकायतों को गंभीरता से लें और प्राथमिकता पूर्वक उनका निस्तारण करें। कहा कि जल्द ही वे विभिन्न कार्यालयों में लंबित शिकायतों का जायजा लेंगी। कहा कि जनता की समस्याओं का अधिकाधिक निस्तारण कराने के लिए ही वे यथासंभव स्वयं ज्याद से ज्यादा लोगों से सीधे मिल रही हैं।
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बेवाना से आए दयाराम डीआईओएस कार्यालय में भटकते मिले। बताया कि मैंने अपनी पुत्री का बालिका शिक्षा मदद योजना के तहत आवेदन कराया था। अभी तक 10 हजार रुपये व साइकिल का लाभ नहीं मिला है। पिछले चार माह से वह डीआईओएस कार्यालय का चक्कर लगा रहा है, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही है। कर्मचारी अक्सर यहां आश्वासन ही देते हैं। जितनी बार इस कार्यालय आए, सिर्फ जल्दी ही व्यवस्था हो जाने का भरोसा दिया जाता है। नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस भागदौड़ में वह अकेला नहीं है। उसे अक्सर इस प्रकार की समस्या लेकर यहां आने वाले लोग मिलते रहते हैं।
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सुरहुरपुर के वशिष्ठधर पांडेय कलक्ट्रेट में मिल गए। बताया कि जीवन के अंतिम दौर में पेंशन के लिए इतनी जिल्लत झेलनी पड़ेगी, यह सोचा नहीं था। बताया कि अक्सर ऐसा हो जाता है, जब पेंशन खाते में नहीं पहुंचती। फोन से पूछने पर समुचित जवाब नहीं दिया जाता। बताया कि कई बार कोषागार कार्यालय का चक्कर लगाना पड़ता है। कहा कि विभाग को यह प्रबंध करना चाहिए कि पेंशन धारकों को अनावश्यक मुश्किलों का सामना न करना पड़े। पेंशन धारक वैसे ही उम्र की मार से जूझ रहे होते हैं। उस पर से उन्हें बार बार दौड़ने के लिए मजबूर किया जाना उचित नहीं। सेमउर खानपुर से आए रामगोपाल शुक्ल भी कोषागार कार्यालय के निकट परेशान हालत में दिखे। कहा कि वे पेंशनधारक हैं। पेंशन मिलने से ही उन्हें कई प्रकार की राहत मिलती है। कई जरूरी काम इसी से करते हैं। ऐसे में पेंशन की जरूरत बनी रहती है। बताया कि चार माह से पेंशन नहीं गई। वे कई बार दौड़कर आ चुके हैं। कहा कि यदि सही जानकारी दे दी जाए, तो लोगों को अनावश्यक भागदौड़ न करनी पड़े। ऐसा न होने के कारण ही भागदौड़ करनी पड़ती है। बताया कि आज यहां आने पर पता चला कि जीवित प्रमाणपत्र लगाने की जरूरत है। रफीगंज से आईं शांतिदेवी ने बताया कि बुढ़ापे में भी भटकना मजबूरी बन गया है। कई चक्कर लगाने के बाद भी तीन माह से पेंशन नहीं मिली है। कहा कि उन्होंने अपने परिजनों के माध्यम से जानकारी कराई, लेकिन कोई सूचना नहीं मिली। बताया कि जानकारी करने के लिए ही कई बार उन्हें स्वयं मुख्यालय तक आना पड़ा। शांतिदेवी ने कहा कि पेंशनधारकों के लिए ऐसा प्रबंध करना चाहिए, जिससे उन्हें अनावश्यक दौड़ न लगानी पड़े। सत्यापन व अन्य कार्यों की सुविधा तहसील या ब्लॉक मुख्यालय पर उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है। फाजिलपुर के पंकज मिश्र डीएम कार्यालय के समक्ष मिले। बताया कि लगभग दो माह पूर्व बिना मान्यता के क्षेत्र में चल रहे विद्यालयों की जानकारी डीएम को पत्र लिखकर दी थी। विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहे खेल की जानकारी देने के साथ ही कार्रवाई की मांग की गई थी, लेकिन अब तक कुछ नहीं हो सका। बीच में वे एक बार जानकारी करने यहां आए थे, लेकिन कर्मचारियों ने कुछ नहीं बताया। पंकज ने कहा कि वे आज अपने प्रार्थनापत्र के बारे में फिर से जानकारी करने आए हैं, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी उनके प्रार्थनापत्र पर क्या कार्रवाई हुई, यह जानकारी नहीं मिल पाई है। बनियानी निवासी मोहम्मद शमीम चकबंदी दफ्तर के सामने भूमि पर बैठे मिले। बताया कि उनकी पांच बीघा पैतृक भूमि है। उस पर चकबंदी न्यायालय में मुकदमा चला आ रहा है। लगभग 15 वर्ष हो है, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है। फैसले के इंतजार में तमाम उम्मीदें टूट चुकी हैं। कहा कि मामलों के निस्तारण में तेजी आखिर आए भी तो कैसे? अक्सर यहां अधिकारी ही मौजूद नहीं रहते। उनके अनुपस्थित रहने पर अगली तारीख लगा दी जाती है। यदि तारीख पर अफसर बैठे भी, तो कई बार पूरी तरह सुनवाई नहीं हो पाती। इस मामले में उसे न्याय कब मिल पाएगा, यह समझ में नहीं आ रहा। रामपुर के राम खिलावन भी चकबंदी दफ्तर न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचे थे। कहा कि बाबू अब तो चक्कर लगाते-लगाते पैर भी थक गए, लेकिन न्याय नहीं मिल पाया। अब तो मुकदमा नाम से ही डर लगने लगा है। बताया कि उसकी एक भूमि पर लगभग 20 वर्ष से केस चल रहा है। इसका हल होने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है। कर्मचारियों पर मनमानी का आरोप लगाते हुए कहा कि कई बार तो नकल निकलवाने तक में पसीने छूट गए। राम खिलावन ने कहा कि मुकदमों के निस्तारण के लिए समयबद्ध कार्यक्रम बनाए जाने की जरूरत है। रसूलपुर से आए वंशराज ने बताया कि चकबंदी न्यायालय में उनकी लगभग चार बिस्वा भूमि का मुकदमा 12 वर्षों से चल रहा है। कहा कि एक-एक तारीख पर आते-आते कई चप्पल घिस गईं। लेकिन अब तक न्याय नहीं मिल पाया। अधिकारियों व कर्मचारियों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि निस्तारण की तरफ गंभीरता नजर नहीं आती। वंशराज ने कहा कि एक तरफ तो त्वरित व सस्ते न्याय की बात की जाती है, तो दूसरी तरफ मामलों के जल्द निस्तारण की तरफ गंभीरता नहीं दिखाई जाती। कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने की जरूरत है।
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___जिलाधिकारी निधि केसरवानी ने कहा कि वे कार्यालयों में समयबद्ध ढंग से समस्याओं का निस्तारण कराने का प्रयास कर रही हैं। तहसीलों में आने वाली शिकायतों को इसी ढंग से निस्तारित कराया जा रहा है। सभी कार्यालयों को भी निर्देश हैं कि वे शिकायतों को गंभीरता से लें और प्राथमिकता पूर्वक उनका निस्तारण करें। कहा कि जल्द ही वे विभिन्न कार्यालयों में लंबित शिकायतों का जायजा लेंगी। कहा कि जनता की समस्याओं का अधिकाधिक निस्तारण कराने के लिए ही वे यथासंभव स्वयं ज्याद से ज्यादा लोगों से सीधे मिल रही हैं।