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धार्मिक व वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणिक है नवरात्र व्रत
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टांडा (अंबेडकरनगर)। ऋषि-मुनियों ने सामाजिक, आध्यात्मिक, स्वास्थ्य एवं आर्थिक व्यवस्थाओं को चलाने के लिये वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों और पुराणों की रचना की। उनमें से कुछ मुख्य बातों को हमारे त्यौहारों के साथ जोड़ दिया। नवरात्र की रचना भी धार्मिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से की गई है। यह विचार बुधवार को टांडा नगर में नवरात्र पर्व की तैयारियों को लेकर आयोजित बैठक में प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं राकेश मिश्र ने प्रकट किया।
बताया कि नवरात्र का पर्व वर्ष में चार बार मनाया जाता है। चैत्र और अश्विन मास में जो नवरात्र आते हैं, वह सभी को मालूम हैं। शेष दो नवरात्र गुप्त हैं। यह नवरात्र आषाढ़ व माघ मास में आते हैं। चैत्र व अश्विन मास के नवरात्र को विशेष रूप से मनाया जाता है। इन महीने में ऋतुएं बदलती हैं और जब ऋतु परिवर्तन होता है तो हमारे शरीर पर उनका प्रभाव पड़ता है। यह परिवर्तन सृष्टि के सभी जीवित प्राणियों एवं वनस्पतियों में भी होता है। मनुष्य में इस परिवर्तन का प्रभाव वात, पित्त, कफ के रूप में होता है।
इन सभी प्रकार की बीमारियों से बचाने के लिये लगातार नौ दिन तक पूजन एवं उपवास का विधान है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मां दुर्गा को सभी शास्त्रों में शक्ति के रूप में माना गया है। उनसे जीवन रूपी शक्ति प्राप्त करने के लिये ऐसा विधान किया गया है। इसका शास्त्रों, रामायण व महाभारत में स्पष्ट प्रमाण है कि जब भी देवता अथवा मनुष्यों को शक्ति की आवश्यकता हुई तो उन्होंने मां दुर्गा की पूजा और आराधना की। ऋतु परिवर्तन के कारण ही नव अर्थात नवरात्रे इसका नाम रखा गया। मां दुर्गा के नव स्वरूप हैं। मनुष्य की उत्पत्ति भी पांच महाभूतों से और चार अंत:कारण से मिल कर हुई है। मौसम की तब्दीली के समय इन तत्वों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उस प्रभाव को दूर करने के लिये ही कम से कम दोनों ऋतुओं के बदलने के समय नौ दिन का व्रत रखें।
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साधकों ने नव तत्वों को ही मां दुर्गा का स्वरूप भी माना गया है। शक्ति की नारी रूप में उपासना तंत्र शास्त्र के अनुसार नवदुर्गा इस महाशक्ति के नौ रूप और नौ नाम हैं, जो इस प्रकार हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री। पं. राकेश मिश्र बताते हैं कि वासंातिक नवरात्र पर यथाशक्ति कम से कम 9 माला जाप करना चाहिय। अलग अलग दिन विभिन्न सामग्री से हवन करना लाभप्रद होता है, और परिवार में रोग, शोक की निवृत्ति तथा सभी प्रकार का कार्य सिद्ध होता है। ऐसा करने से मां आदि शक्ति भगवती अपने भक्तों का कल्याण करती है। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
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बताया कि नवरात्र का पर्व वर्ष में चार बार मनाया जाता है। चैत्र और अश्विन मास में जो नवरात्र आते हैं, वह सभी को मालूम हैं। शेष दो नवरात्र गुप्त हैं। यह नवरात्र आषाढ़ व माघ मास में आते हैं। चैत्र व अश्विन मास के नवरात्र को विशेष रूप से मनाया जाता है। इन महीने में ऋतुएं बदलती हैं और जब ऋतु परिवर्तन होता है तो हमारे शरीर पर उनका प्रभाव पड़ता है। यह परिवर्तन सृष्टि के सभी जीवित प्राणियों एवं वनस्पतियों में भी होता है। मनुष्य में इस परिवर्तन का प्रभाव वात, पित्त, कफ के रूप में होता है।
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इन सभी प्रकार की बीमारियों से बचाने के लिये लगातार नौ दिन तक पूजन एवं उपवास का विधान है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मां दुर्गा को सभी शास्त्रों में शक्ति के रूप में माना गया है। उनसे जीवन रूपी शक्ति प्राप्त करने के लिये ऐसा विधान किया गया है। इसका शास्त्रों, रामायण व महाभारत में स्पष्ट प्रमाण है कि जब भी देवता अथवा मनुष्यों को शक्ति की आवश्यकता हुई तो उन्होंने मां दुर्गा की पूजा और आराधना की। ऋतु परिवर्तन के कारण ही नव अर्थात नवरात्रे इसका नाम रखा गया। मां दुर्गा के नव स्वरूप हैं। मनुष्य की उत्पत्ति भी पांच महाभूतों से और चार अंत:कारण से मिल कर हुई है। मौसम की तब्दीली के समय इन तत्वों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उस प्रभाव को दूर करने के लिये ही कम से कम दोनों ऋतुओं के बदलने के समय नौ दिन का व्रत रखें।
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साधकों ने नव तत्वों को ही मां दुर्गा का स्वरूप भी माना गया है। शक्ति की नारी रूप में उपासना तंत्र शास्त्र के अनुसार नवदुर्गा इस महाशक्ति के नौ रूप और नौ नाम हैं, जो इस प्रकार हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री। पं. राकेश मिश्र बताते हैं कि वासंातिक नवरात्र पर यथाशक्ति कम से कम 9 माला जाप करना चाहिय। अलग अलग दिन विभिन्न सामग्री से हवन करना लाभप्रद होता है, और परिवार में रोग, शोक की निवृत्ति तथा सभी प्रकार का कार्य सिद्ध होता है। ऐसा करने से मां आदि शक्ति भगवती अपने भक्तों का कल्याण करती है। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।