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धरती पर कैसे आएगी हरियाली, जब अधिकारी नहीं होंगे गंभीर
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केदारनगर। आखिर धरती पर तेजी से हरियाली फैले भी तो कैसे जब वन विभाग का रवैया ही लचर हो। बीते दो वर्षों से टांडा तहसील क्षेत्र में वन विभाग की उदासीनता सामने आ रही है। हर साल विभाग 10 हजार से अधिक पौधे क्षेत्र की बहइया झील में लगाता है, लेकिन जलभराव होने पर ये नष्ट हो जाते हैं। ग्रामीण इसे लेकर पहले भी आवाज उठा चुके हैं कि पहले पौधों की सुरक्षा के लिए बंधा आदि बनाया जाए ताकि पौधे सुरक्षित रहें। इसके बावजूद विभाग पौध लगाने का अपना लक्ष्य तो पूरा कर लेता है, लेकिन पौधे सुरक्षित रहेंगे या नहीं इसे लेकर ध्यान नहीं दे रहा है। इस बार भी लगाए गए करीब 10 हजार पौधे जलभराव की भेंट चढ़ गए।
बताते चलें कि टांडा तहसील के उतरेथू क्षेत्र में बहइया झील है। 100 बीघा से अधिक क्षेत्रफल में फैली इस झील के चलते हर साल लोगों को जलभराव से जूझना पड़ता है। दर्जनों गांवों की जल निकासी के लिए यह एक माध्यम है। झील का अधिकांश हिस्सा बारिश खत्म होने के बाद सूखा रहता है। बारिश के समय झील में पानी का जल स्तर बढ़ने के साथ झील का दायरा बढ़ जाता है। ऐसे में वन विभाग ने झील की भूमि को उपयोग में लेने की मुहिम शुरू की। वन महोत्सव अभियान के तहत वर्ष 2018 में वन विभाग ने करीब 10 हजार पौधों का रोपण कराया। इसमें शीशम, पीपल, बरगद, गूलर, जामुन, जंगली बबूल सहित दर्जनों किस्म के पौध लगाए गए।
पौधे लगाने के दौरान ही ग्रामीणों ने हस्तक्षेप किया, और पौधे लगाने के साथ ही उसकी सुरक्षा तय करने की मांग की। ग्रामीणों का तर्क था कि पौधरोपण से पहले झील में एक बंधा बनाया जाए, और पौधों के रोपने के स्थान पर मिट्टी डाली जाए। जिससे पानी की अधिकता होने पर पेड़ नष्ट होने से बच सकें। इसके बावजूद विभाग ने ऐसा कुछ नहीं किया। परिणाम यह हुआ कि जब झील में पानी का जलस्तर बढ़ा तो अधिकांश पेड़ सूख गए।
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इसके बावजूद वर्ष 2019 में वन विभाग ने फिर एक बार अपने पौध लगाने के लक्ष्य को पूरा करने की होड़ में झील में करीब 10 हजार से अधिक पौध लगवा डाले। इस बार भी पौधों की सुरक्षा तय करने के लिए कोई प्रबंध नही किया गया। परिणाम फिर वही सामने आया। स्थानीय रामचन्द्र, नन्हेलाल उपाध्याय, ओमप्रकाश वर्मा, भावेश तिवारी व रामसुंदर मालवीय का आरोप है कि वन विभाग जानबूझ कर सिर्फ पौधरोपण के नाम पर खानापूर्ति कर रहा है। पौधों के नाम पर हजारों रुपए प्रत्येक वर्ष खर्च किए जा रहे हैं। पौधों को लगाने के बाद उन्हें सुरक्षित रखने की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ पौधरोपण के नाम पर विभाग को चूना लगाने का काम हो रहा है। उच्चाधिकारियों को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। बार बार पौधरोपण के नाम पर धन की बर्बादी करने से बेहतर है कि पहले पौधों की सुरक्षा तय करने का प्रबंध होना चाहिए। इसके बाद पौधरोपण सुनिश्चित करना चाहिए।
झील के क्षेत्रफल में रोपे गए कुछ पौधे नष्ट हो गए हैं। पानी सूखने पर दोबारा रोपा जाएगा। पौध रोपने के बाद विभाग की जिम्मेदारी होती है कि वह ढाई वर्ष तक नियमित देखरेख करे। यदि पौधे खराब होते हैं तो वहां दोबारा रोपे जाएंगे। इसी नियम के तहत दोबारा पौधरोपण वहां हुआ।
सचिन गौतम, फारेस्ट रेंजर, टांडा
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बताते चलें कि टांडा तहसील के उतरेथू क्षेत्र में बहइया झील है। 100 बीघा से अधिक क्षेत्रफल में फैली इस झील के चलते हर साल लोगों को जलभराव से जूझना पड़ता है। दर्जनों गांवों की जल निकासी के लिए यह एक माध्यम है। झील का अधिकांश हिस्सा बारिश खत्म होने के बाद सूखा रहता है। बारिश के समय झील में पानी का जल स्तर बढ़ने के साथ झील का दायरा बढ़ जाता है। ऐसे में वन विभाग ने झील की भूमि को उपयोग में लेने की मुहिम शुरू की। वन महोत्सव अभियान के तहत वर्ष 2018 में वन विभाग ने करीब 10 हजार पौधों का रोपण कराया। इसमें शीशम, पीपल, बरगद, गूलर, जामुन, जंगली बबूल सहित दर्जनों किस्म के पौध लगाए गए।
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पौधे लगाने के दौरान ही ग्रामीणों ने हस्तक्षेप किया, और पौधे लगाने के साथ ही उसकी सुरक्षा तय करने की मांग की। ग्रामीणों का तर्क था कि पौधरोपण से पहले झील में एक बंधा बनाया जाए, और पौधों के रोपने के स्थान पर मिट्टी डाली जाए। जिससे पानी की अधिकता होने पर पेड़ नष्ट होने से बच सकें। इसके बावजूद विभाग ने ऐसा कुछ नहीं किया। परिणाम यह हुआ कि जब झील में पानी का जलस्तर बढ़ा तो अधिकांश पेड़ सूख गए।
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इसके बावजूद वर्ष 2019 में वन विभाग ने फिर एक बार अपने पौध लगाने के लक्ष्य को पूरा करने की होड़ में झील में करीब 10 हजार से अधिक पौध लगवा डाले। इस बार भी पौधों की सुरक्षा तय करने के लिए कोई प्रबंध नही किया गया। परिणाम फिर वही सामने आया। स्थानीय रामचन्द्र, नन्हेलाल उपाध्याय, ओमप्रकाश वर्मा, भावेश तिवारी व रामसुंदर मालवीय का आरोप है कि वन विभाग जानबूझ कर सिर्फ पौधरोपण के नाम पर खानापूर्ति कर रहा है। पौधों के नाम पर हजारों रुपए प्रत्येक वर्ष खर्च किए जा रहे हैं। पौधों को लगाने के बाद उन्हें सुरक्षित रखने की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ पौधरोपण के नाम पर विभाग को चूना लगाने का काम हो रहा है। उच्चाधिकारियों को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। बार बार पौधरोपण के नाम पर धन की बर्बादी करने से बेहतर है कि पहले पौधों की सुरक्षा तय करने का प्रबंध होना चाहिए। इसके बाद पौधरोपण सुनिश्चित करना चाहिए।
झील के क्षेत्रफल में रोपे गए कुछ पौधे नष्ट हो गए हैं। पानी सूखने पर दोबारा रोपा जाएगा। पौध रोपने के बाद विभाग की जिम्मेदारी होती है कि वह ढाई वर्ष तक नियमित देखरेख करे। यदि पौधे खराब होते हैं तो वहां दोबारा रोपे जाएंगे। इसी नियम के तहत दोबारा पौधरोपण वहां हुआ।
सचिन गौतम, फारेस्ट रेंजर, टांडा