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बिना तलाक अन्य व्यक्ति के साथ रह रही महिला भरण पोषण की हकदार नहीं : हाईकोर्ट
Sun, 12 Jul 2026 02:40 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
Updated Sun, 12 Jul 2026 02:40 AM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना तलाक अन्य व्यक्ति के साथ रह रहा महिला को भरण पोषण पाने का कोई हक नहीं है। डीएनए से पुष्टि होने पर जैविक पिता को बेटी को गुजारा भत्ता देना होगा। यह फैसला न्यायमूर्ति अचल सचदेव की अदालत ने चित्रकूट निवासी एक व्यक्ति की पुनरीक्षण याचिका पर दिया है।
मामले के मुताबिक, एक महिला ने याची के खिलाफ भरण-पोषण की अर्जी परिवार अदालत ने दाखिल की थी, जिसमें उसने खुद को पत्नी बताते हुए अपने और अपनी बेटी के लिए प्रतिमाह सात हजार रुपये की मांग की थी। कोर्ट ने महिला को दो हजार रुपये और बेटी को एक हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ उस व्यक्ति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने पाया कि महिला ने अपने पहले पति से तलाक नहीं लिया था और वह जब दूसरे के साथ रह रही थी, तब भी उसका पहला पति जीवित था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भरण पोषण के प्रावधानों के मुताबिक महिला कानूनी रूप से विवाहित पत्नी की श्रेणी में नहीं आती, इसलिए वह इसकी हकदार नहीं है। वहीं, अदालत ने डीएनए रिपोर्ट के आधार पर माना कि याची बच्ची का जैविक पिता है।
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लिहाजा, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता का यह नैतिक और कानूनी कर्तव्य है कि वह अपनी संतान का भरण-पोषण करे, चाहे वह संतान वैध हो या अवैध। इस आधार पर कोर्ट ने महिला के पक्ष में दिया आदेश तो खारिज कर दिया, लेकिन बेटी के लिए भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखा।
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मामले के मुताबिक, एक महिला ने याची के खिलाफ भरण-पोषण की अर्जी परिवार अदालत ने दाखिल की थी, जिसमें उसने खुद को पत्नी बताते हुए अपने और अपनी बेटी के लिए प्रतिमाह सात हजार रुपये की मांग की थी। कोर्ट ने महिला को दो हजार रुपये और बेटी को एक हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ उस व्यक्ति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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हाईकोर्ट ने पाया कि महिला ने अपने पहले पति से तलाक नहीं लिया था और वह जब दूसरे के साथ रह रही थी, तब भी उसका पहला पति जीवित था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भरण पोषण के प्रावधानों के मुताबिक महिला कानूनी रूप से विवाहित पत्नी की श्रेणी में नहीं आती, इसलिए वह इसकी हकदार नहीं है। वहीं, अदालत ने डीएनए रिपोर्ट के आधार पर माना कि याची बच्ची का जैविक पिता है।
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लिहाजा, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता का यह नैतिक और कानूनी कर्तव्य है कि वह अपनी संतान का भरण-पोषण करे, चाहे वह संतान वैध हो या अवैध। इस आधार पर कोर्ट ने महिला के पक्ष में दिया आदेश तो खारिज कर दिया, लेकिन बेटी के लिए भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखा।