उपलब्धि : कोच नहीं मिलने पर पिता ने खुद खेत में दी थी ट्रेनिंग, दो वर्ष से घर नहीं आए थे बच्चे, जीता गोल्ड
मऊआइमा के मगनपुर गांव के गौरव ने स्पर्धा में मध्य प्रदेश के लिए खेलते हुए 74.57 मी. की दूरी पर भाला फेंककर यह उपलब्धि हासिल की है। स्पर्धा में दूसरे नंबर पर तमिलनाडु के कनिश्कार टी रहे, जिन्होंने 71.70 मी.की दूरी पर थ्रो किया।
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धनतेरस पर जहां बाजार में लोग सोना खरीदने के लिए लाइन में खड़े हुए थे, वहीं दूसरी ओर गंगापार के गौरव पटेल ने तमिलनाडु के कोयंबटूर में खेले जा रहे 38वें राष्ट्रीय जूनियर खेल में जेवलिन थ्रो की स्पर्धा में देश के सभी एथलीटों को पछाड़ते हुए सोना जीत लिया। स्वर्ण पदक इसलिए भी खास रहा क्योंकि बस, चौबीस घंटे पहले ही गौरव की बहन प्रतीक्षा ने भी इसी स्पर्धा में उत्तर प्रदेश के लिए कांस्य पदक जीता था।
मऊआइमा के मगनपुर गांव के गौरव ने स्पर्धा में मध्य प्रदेश के लिए खेलते हुए 74.57 मी. की दूरी पर भाला फेंककर यह उपलब्धि हासिल की है। स्पर्धा में दूसरे नंबर पर तमिलनाडु के कनिश्कार टी रहे, जिन्होंने 71.70 मी.की दूरी पर थ्रो किया। गौरव के पदक जीतने के बाद उनके पिता रामआधार पटेल खुशी से झूम उठे। सुल्तानपुर में फायर ब्रिगेड में सिपाही रामआधार हौसला बढ़ाने के लिए विभाग से छुट्टी लेकर बच्चों के साथ कोयंबटूर में ही हैं।
बातचीत में रामआधार बोले, दीपावली से पहले बेटे और बेटी दोनों ने झोली में जो खुशियां डाली हैं, उसे कभी भी नहीं भुलाया जा सकता है। यह उनके लिए जीवन के स्वर्णिम पल है। वहीं मां कांती देवी भी सूचना पाकर भावुक हो उठीं और फोन पर बेटे को बधाई दी।
गौरव फिलहाल भोपाल में मो.हदीस खान से प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। वह बीते दो वर्षों से घर नहीं आए हैं। कोच ने उनसे कह रखा था, जब तक मेडल नहीं दोगे, घर जाने को नहीं मिलेगा। इससे पहले गौरव जेवलिंग चैलेंजर चैंपियनशिप और यूथ नेशनल में कांस्य पदक जीत चुके हैं।
खेत में वीडियो देखकर सीखा खेल, बटोरीं उपलब्धियां
गांव के एथलीट अरुण पटेल ने एथलेटिक्स में राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धा में पदक जीता तो उन्हें नौकरी मिली। यह देख रामआधार पटेल को भी खेल के क्षेत्र में बच्चों का भविष्य दिखाई दिया। हालांकि वह एथलेटिक्स की स्पर्धाओं के बारे में अन्जान थे। अरुण से जैवलिन थ्रो कराने की सलाह तो मिली लेकिन आसपास कोई कोच नहीं मिला।
रामआधार ने अरुण से ही अभ्यास, तकनीकी बातें तथा कई सुझाव लेकर उन्हें कैमरे में रिकॉर्ड कर लिए। फिर उसी वी़डियो से खेत में अभ्यास कराया। दोनों बच्चों ने इसी से खेल की बारीकियां सीखीं।
खूब खाई डांट, भाई-बहन को नॉनवेज खाने की मिली छूट
पिता के निर्णय के बाद प्रतीक्षा और गौरव दोनों को सुबह पांच बजे उठा दिया जाता। सुबह न तो प्रतीक्षा से उठा जाता और न ही गौरव से। पिता की डांट से दोनों बिस्तर छोड़ते। घर के सभी सदस्य शाकाहारी थे। खेल में ताकत की भरपूर जरूरत होती है, इसलिए दोनों को अलग कमरा दिया गया। उसी कमरे में दोनों बच्चे खुद ही नॉनवेज बनाते,खाते और फिर खुद ही पूरी साफ-सफाई भी करते।