मेरे राम : सीएम ने किया सस्पेंड तो कलक्टरी छोड़ करने लगे रामलला की वकालत
1949 में उनके डीएम रहते विवादित ढांचा परिसर में न सिर्फ रामलला की प्रतिमा रखवाई गई थी, बल्कि सैकड़ों लोगों का दर्शन के लिए तांता लग गया था। तब पीएम रहे पं. जवाहर लाल नेहरू और सीएम गोविंद वल्लभ पंत के आदेश के बाद भी उन्होंने रामलला की मूर्ति वहां से नहीं हटवाई थी।
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22 जनवरी को जब जन्मभूमि पर रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा होने जा रही है, तब मंदिर आंदोलन के नायक भी सुर्खियों में हैं। उन्हीं नायकों में से एक हैं कृष्ण कुमार करुणाकरन नायर। 1949 में उनके डीएम रहते विवादित ढांचा परिसर में न सिर्फ रामलला की प्रतिमा रखवाई गई थी, बल्कि सैकड़ों लोगों का दर्शन के लिए तांता लग गया था। तब पीएम रहे पं. जवाहर लाल नेहरू और सीएम गोविंद वल्लभ पंत के आदेश के बाद भी उन्होंने रामलला की मूर्ति वहां से नहीं हटवाई थी। इस पर जब उन्हें सस्पेंड किया गया, जब वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर हाईकोर्ट में रामलला की वकालत करने लगे थे।
उन दिनों राज्य बनाम केके नायर मुकदमे की फाइल के बारे में कई रोचक जानकारी लोट्स अपार्टमेंट में रहने वाले उमेश माथुर को मिली थी। तब माथुर के पिता हाईकोर्ट में कर्मचारी थे। उमेश अमर उजाला से उस संस्मरण को साझा कर भावुक हो उठते हैं। बताते हैं कि पिता जी रोज़ साढ़े नो बजे साइकिल से चले जाते थे और पांच -सवा पांच बजे तक वापस आ जाते थे। छुट्टी के बावजूद शनिवार को भी हाईकोर्ट जाते थे।
हम बहुत छोटे थे। अक्सर जिद करके और फिर अच्छी तरह से तैयार हो कर हम भी कभी किसी-किसी शनिवार को उनकी साइकिल पर लद कर हाईकोर्ट चले जाते थे। पिता जी जज साहब के चैंबर में काम करते रहते थे और हम चपरासी से समोसा, केला, फलों का रस आदि मंगवाते रहते थे। अक्सर मेज पर पड़ी फाइलों को भी नासमझी में उलट- पलट लिया करते थे।
मेरे इन हाईकोर्ट के चक्करों में, कई सालों तक एक विशेष केस की फाइल बराबर दिखती रही, राज्य बनाम केके नायर। बहुत हिम्मत करके हमने पिताजी से एक दिन पूछा कि यह केके नायर कौन हैं और यह मुकदमा खत्म क्यों नहीं होता? कई बार पूछने पर जवाब मिला-यह बहुत बड़ा मुकदमा है। चीफ मिनिस्टर गोविंद वल्लभ पंत और प्राइम मिनिस्टर जवाहर लाल नेहरू इस केस में पार्टी हैं। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। दो महीने बाद फिर हाईकोर्ट पहुंचे तो फिर वही फाइल दिख गई। फिर पूछा कि यह मुक़दमा अभी भी चल रहा है? जवाब मिला-हां, अभी न जाने कब तक चलता भी रहेगा।
मैंने पूछा कि तो नायर ने ऐसा किया क्या है, जो मामला ख़त्म ही नहीं हो रहा। उन्होंने कहा लौटते वक्त याद दिलाना, बताएंगे। पिता जी को याद था, हम लोग पैदल ही चल दिए। वह एक हाथ से साइकिल पकड़े हुए थे। वह बताने लगे कि फैजाबाद के पास अयोध्या है। राम चरित मानस के अनुसार भगवान श्री राम का जन्म वहीं अयोध्या में हुआ था। वहां एक पुरानी मस्जिद है। मुसलमानों के अनुसार, उसे बाबर ने बनवाया था। हिंदू कहते आ रहे है कि जहां मस्जिद है, उसी स्थान पर भगवान रामचंद्र जी का जन्म स्थान है।
22 दिसंबर 1949 की रात 12 बजे बाबरी मस्जिद में बहुत प्रकाश फैल गया। रात में दिन सा उजाला हो गया। घंटे- घड़ियाल के बीच शंख बजने लगे। सैंकड़ों लोग ठंड में नाचने लगे। कीर्तन करने लगे। शोर मच गया कि धरती को फाड़ कर राम लला अवतरित हुए हैं। आधीरात थी । लोगों ने प्रशासन तक पहुंचने की कोशिश की। कोई मिल ही नहीं रहा था।
फैजाबाद के कलक्टर थे केके नायर
जिले में न कलक्टर ढूंढे़ मिल रहा था न ही पुलिस कप्तान। बाद में पता चला कि दोनों अधिकारी जिले में ही अलग अलग स्थानों पर थे। वह ऐसे इलाके में थे कि उन तक संचार माध्यम से भी पहुंचना नामुमकिन था। लखनऊ से सीएम पंत उनसे संपर्क नहीं कर सके। दिल्ली से पीएम रहे पं. नेहरू भी डीएम को नहीं ढूंढ़ पाए। इधर, राम रातों रात अवतरित हुए थे इसलिए दूर- दूर से लोग दर्शन के लिए आते जा रहे थे। दो दिन में ही इतनी भीड़ हो गई कि नियंत्रण करना मुश्किल हो गया। अब तक वहां पुलिस भी आ चुकी थी। कलक्टर भी पहुंच गए थे। मुख्यमंत्री पंत भी फैजाबाद आ चुके थे ।
स्थिति को नियंत्रण में ले लिया गया। राम लला जहां जन्मे थे वहां अखंड कीर्तन जोर शोर से चलता रहा। मस्जिद जो कि खाली पड़ी रहती थी, वह गुलज़ार हो गई थी। संपर्क न होने पर पीएम नेहरू ने आदेश जारी कर मूर्तियों को हटवाने के लिए कहा था। इसके बाद भी नायर ने पीएम और सीएम की नहीं सुनी। यह नेहरु और पंत को काफी नागवार लगा। इसके बाद डीएम नायर को सीएम ने निलंबित कर दिया। बाद में उनका ट्रांसफर भी कर दिया गया। इससे आहत होकर नायर ने 1952 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली और हाईकोर्ट में रामलला की वकालत करने लगे।