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हाइड्रोजन उपयोगी, लीथियम बेहद खतरनाक

Fri, 03 Mar 2017 01:47 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Fri, 03 Mar 2017 01:47 AM IST
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Useful hydrogen, lithium extremely dangerous
इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
कैंसर जैसी बीमारी का समय से पहले पता चले, नेक्सट जेन एलईडी शरीर की ऊर्जा से चार्ज होकर चले, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने के लिए वाहनों में ईंधन के रूप में हाइड्रोजन की उपयोगिता बढ़ाने जैसे तमाम विकल्पों पर दुनिया भर के वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। ये सारी तकनीक आमजन के लिए उपयोगी हों, इस पर मंथन विदेशों में नहीं बल्कि इस बार संगमनगरी में किया जा रहा है। विनोवा भावे शोध संस्थान के संयोजकत्व में एनआरआई टेक्नोलॉजी मीट और इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन नैनो मैटेरियल्स एंड नैनो टेक्नोलॉजी में दूसरे दिन गुरुवार को विश्व भर के शीर्ष वैज्ञानिकों ने स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी अपने शोध साझा किए।
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विनोबा भावे शोध संस्थान सैदाबाद में गुरुवार को आयोजित पहले सत्र में आचार्य विनोबा इंटरनेशनल अवॉर्ड पाने वाले स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राजीव आहूजा ने हाइड्रोजन की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में हाइड्रोजन का इस्तेमाल वाहनों में ईंधन के रूप में किया जा सकेगा। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में यह क्रांतिकारी उपलब्धि होगी। उन्होंने लीथियम के खतरों के प्रति भी आगाह किया। कहा कि लीथियम रीसाइक्लेबल नहीं है। इससे पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचता है। इसके विकल्प के रूप में सोडियम का प्रयोग करना न सिर्फ सस्ता पड़ेगा, बल्कि पर्यावरण पर इसका विपरीत प्रभाव भी नहीं होगा।
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स्वीडन से आए प्रोफेसर माइकल साइजार्दी ने नेक्स्ट जेनरेशन एलईडी के बारे में शोधपरक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सामान्य तौर पर बिजली की खपत वोल्ट में मापी जाती है, लेकिन नेक्स्ट जेन एलईडी की गणना मिली वोल्ट में होगी। इसमें सामान्य एलईडी से तकरीबन हजार गुना कम बिजली खर्च होगी। इसे घर के अलावा शर्ट, पैंट या जूते इत्यादि में भी लगाया जा सकता है। यह शरीर की ऊर्जा से ही चार्ज होकर चलेगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मैटेरियल्स साइंस जापान के निदेशक प्रो. हिसातोषी कोबयासी ने नैनो फाइबर के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि कार्निया डीजीज के सफल इलाज के लिए नैनो बायो की खोज कर ली गई है। जिसकी कीमत बहुत ही कम है और यह हर तबके के लोग उपयोग कर सकते है। आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर परमेश्वर अय्यर ने नए पॉलीमर के विषय में जानकारी देते हुए कहा कि इसके जरिए कैंसर व अल्जाइमर जैसे रोगों का पता शुरुआती स्टेज में ही चल जाता है, जिससे उनके इलाज में काफी सहूलियत होती है।
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इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के संयोजक एवं वैज्ञानिक प्रोफेसर आशुतोष तिवारी ने अपने शोध अनुभव साझा करते हुए वायरलेस टेक्नोलॉजी के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि इस तकनीक से मेटा स्टेटिस का पता चलता है, जिससे समय से पहले ही कैंसर का पता चल जाएगा। इसमें दिन-महीने नहीं बल्कि घंटों में ही कैंसर के बारे में पूरी जानकारी मिल सकेगी। चिकित्सा क्षेत्र में इसे सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है। इस तकनीक से लाखों पीड़ितों को राहत मिले, इस पर काम किया जा रहा है।

इसके अलावा विभिन्न देशों से आए करीब सौ वैज्ञानिकों ने अलग-अलग सत्र में जन जुड़ाव से संबंधित व्याख्यान दिए। इन सत्रों की अध्यक्षता क्रमश: मारिया नटालिया, स्वाति डे, रेगीना सूत, अलका सिंह, शोभा शुक्ला, रश्मि माधुरी, निधि चौहान, प्रभाकर शर्मा, सिनोज अब्राहम, अरुण सिंह, सुमित सक्सेना. मनोज पांडेय, राजू गुप्ता, हीरक कुमार पात्रा, कलावती सैनी, एम. सर्वनन, राजीव भंडारी, चंद्रशेखर राउत, मौसमी मुखोपाध्याय, संजय उपाध्याय, पोरिया छगनलाल, संजय सिंह, ब्रह्मानंद चक्रवर्ती, आलोक श्रीवास्तव, सुशील कुमार ने की। कॉन्फ्रेंस के पोस्टर सेशन में 29 वैज्ञानिकों ने अपने शोध प्रस्तुत किए। इसमें पहले सत्र की अध्यक्षता प्रशांत शर्मा व आदित्य शर्मा और दूसरे सत्र की अध्यक्षता ब्रजेश त्रिपाठी व मनोज पांडेय ने की। निधि चौहान, वसुमति वेलाची, सुशील सिंह, रतिराम चौधरी व राजीव सिन्हा सहयोगी रहे। शुक्रवार को कॉन्फेंस का समापन होगा।


शोध सत्र के बाद शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए। विदेशी वैज्ञानिकों के लिए होली आधारित कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र रहे। भारतीय संस्कृति और पारंपरिक उत्सवों के प्रति लोगों का जुड़ाव को सबको मुग्ध कर दिया। इस मौके पर होली थीम पर हुए नृत्य में रंग-गुलाल उड़ा और फाग गायन पर लोग झूमे भी। सात समंदर पार से आए विदेशी वैज्ञानिकों ने कार्यक्रम और कलाकारों सराहा।
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