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अढ़ाई बरस तक बना ‘विवादों का आयोग’
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Wed, 14 Oct 2015 11:54 PM IST
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उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ.अनिल यादव की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने बुधवार को अवैध करार दे दिया। दो अप्रैल 2013 को अध्यक्ष का कार्यभार संभालने वाले डॉ.अनिल के कार्यकाल के दौरान आयोग भर्ती के लिए कम, विवादों के लिए ज्यादा जाना गया। भर्तियों को लेकर पहले भी समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं, लेकिन डॉ.अनिल के अध्यक्ष बनने के बाद से तो जैसे आयोग का विवादों से ही नाता हो गया।
विवाद की शुरुआत उनके ज्वाइन करने के मात्र एक महीने बाद मई 2013 में ही हो गई थी। आयोग की भर्तियों की त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था लागू करने के विरोध में जो आंदोलन शुरू हुआ तो अब तक जारी है। आयोग के इतिहास में पहली बार पीसीएस-2015 प्रारंभिक परीक्षा का पेपर भी आउट हुआ और एक प्रश्न पत्र की दोबारा परीक्षा करानी पड़ी। चार ऐसे मौके आए जब आयोग को फैसला बदलना पड़ा। आयोग की ओर से गलत उत्तर सही माने जाने की शिकायत तकरीबन हर भर्ती परीक्षा में है। इसे लेकर परीक्षा स्थगित किए जाने की मांग भी लगातार उठती रही है।
डॉ.अनिल के अध्यक्ष बनने के एक महीने बाद आयोग बोर्ड की मई 2013 में हुई बैठक में भर्तियों में आरक्षण की त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया गया।
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इसके विरोध में प्रतियोगियों के प्रदेशव्यापी आंदोलन के बाद प्रदेश सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा तो फैसला वापस हुआ। इसी क्रम में पीसीएस-2011 फाइनल रिजल्ट सबसे अधिक विवादों में रहा जिसके बाद आयोग को ‘जातिविशेष’ का आयोग माना जाने लगा। इस भर्ती परीक्षा में एक जाति के ज्यादा लोग सफल हुए। परिणामस्वरूप आंदोलनरत प्रतियोगियों ने साक्षात्कार में शामिल प्रत्येक अभ्यर्थी को मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू में मिले अंकों का विवरण इकट्ठा किया जिससे साफ था कि ‘जातिविशेष’ के अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में खुलकर नंबर बांटे गए, जबकि दूसरे लोगों को काफी कम नंबर मिले। फिर तो आयोग ने अभ्यर्थियों के प्राप्तांक देखने की प्रक्रिया काफी जटिल कर दी है। हालांकि प्रतियोगियों के ढाई साल के संघर्ष के बाद डॉ.अनिल यादव की नियुक्ति तो अवैध हो गई लेकिन भर्तियों की सीबीआई जांच की उनकी लड़ाई अब भी जारी है।
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विवाद की शुरुआत उनके ज्वाइन करने के मात्र एक महीने बाद मई 2013 में ही हो गई थी। आयोग की भर्तियों की त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था लागू करने के विरोध में जो आंदोलन शुरू हुआ तो अब तक जारी है। आयोग के इतिहास में पहली बार पीसीएस-2015 प्रारंभिक परीक्षा का पेपर भी आउट हुआ और एक प्रश्न पत्र की दोबारा परीक्षा करानी पड़ी। चार ऐसे मौके आए जब आयोग को फैसला बदलना पड़ा। आयोग की ओर से गलत उत्तर सही माने जाने की शिकायत तकरीबन हर भर्ती परीक्षा में है। इसे लेकर परीक्षा स्थगित किए जाने की मांग भी लगातार उठती रही है।
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डॉ.अनिल के अध्यक्ष बनने के एक महीने बाद आयोग बोर्ड की मई 2013 में हुई बैठक में भर्तियों में आरक्षण की त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया गया।
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इसके विरोध में प्रतियोगियों के प्रदेशव्यापी आंदोलन के बाद प्रदेश सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा तो फैसला वापस हुआ। इसी क्रम में पीसीएस-2011 फाइनल रिजल्ट सबसे अधिक विवादों में रहा जिसके बाद आयोग को ‘जातिविशेष’ का आयोग माना जाने लगा। इस भर्ती परीक्षा में एक जाति के ज्यादा लोग सफल हुए। परिणामस्वरूप आंदोलनरत प्रतियोगियों ने साक्षात्कार में शामिल प्रत्येक अभ्यर्थी को मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू में मिले अंकों का विवरण इकट्ठा किया जिससे साफ था कि ‘जातिविशेष’ के अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में खुलकर नंबर बांटे गए, जबकि दूसरे लोगों को काफी कम नंबर मिले। फिर तो आयोग ने अभ्यर्थियों के प्राप्तांक देखने की प्रक्रिया काफी जटिल कर दी है। हालांकि प्रतियोगियों के ढाई साल के संघर्ष के बाद डॉ.अनिल यादव की नियुक्ति तो अवैध हो गई लेकिन भर्तियों की सीबीआई जांच की उनकी लड़ाई अब भी जारी है।