पहल : लावारिस के शव को मिला अनजान वारिसों का कंधा, गोबर की लकड़ी से अंतिम संस्कार
हरे पेड़ों की अंधाधुंध कटान से बिगड़ते पर्यावरण की चिंताओं को दूर करने के लिए संगमनगरी में पहली बार गोबर की लकड़ी से लावारिस शव का अंतिम संस्कार कर नई शुरुआत की गई। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो आने वाले समय में शवों के साथ पेड़ नहीं जलेंगे।
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हरे पेड़ों की अंधाधुंध कटान से बिगड़ते पर्यावरण की चिंताओं को दूर करने के लिए संगमनगरी में पहली बार गोबर की लकड़ी से लावारिस शव का अंतिम संस्कार कर नई शुरुआत की गई। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो आने वाले समय में शवों के साथ पेड़ नहीं जलेंगे। चिताओं पर लड़कियों के धुएं और राख से पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होगा।
गोबर की लकड़ी से अंतिम संस्कार की पहल शनिवार को सत्यकाम संस्था की ओर से की गई। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करने वाली इस संस्था की ओर से पर्यावरणविद डॉ. योगेंद्र सक्सेना की मदद ली गई। भोपाल में योगेंद्र पर्यावरण संरक्षण के लिए गोबर की लकड़ी से अंतिम संस्कार के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। इससे प्रभावित होकर सत्यकाम संस्था ने यहां भी उसी प्रयोग को अपनाने की कोशिश की है।
संस्था की अध्यक्ष वंदना द्विवेदी ने एसआरएन के मोर्चरी के प्रभारी डॉ. दिलीप सिंह से संपर्क कर लावारिस शव का गोबर की लकड़ी से अंतिम संस्कार कराने का आग्रह किया था। शनिवार को करछना में रेलवे ट्रैक पर एक युवक की ट्रेन की चपेट में आने से मौत हो गई। पुलिस ने शव को बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए जब भेजा,तब मोर्चरी के प्रभारी ने इसकी जानकारी सत्यकाम संस्था के पदाधिकारियों को दी। पोस्टमार्टम के बाद सत्यकाम संस्था के पदाधिकारियों और मोर्चरी के कर्मियों ने शव को कंधा दिया।
शव को लेकर वह दारागंज घाट पर पहुंचे। वहां शाम 3:30 बजे पौने दो कुंतल गोबर की लकड़ी से लावारिस शव का अंतिम संस्कार किया गया। वंदना का कहना था कि यह शुरुआत आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। वह बताती हैं कि जिले में जल्द ही गोबर की लकड़ी से अंतिम संस्कार कराने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाएगा, ताकि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मिसाल कायम की जा सके।