इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आपराधिक केस में सही निर्णय तक पहुंचने के लिए विचारण अदालत दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 के तहत किसी को भी गवाही के लिए बुला सकती है। भले ही उसका नाम विवेचना के दौरान या चार्जशीट में न आया हो।
कोर्ट ने हत्या के मामले में शिकायतकर्ता के बयान कि उसका भाई भी चश्मदीद गवाह है, को समन जारी कर बुलाने के विचारण अदालत के आदेश को विधि सम्मत करार देते हुए उसके खिलाफ दाखिल याचिका खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति समीर जैन ने हैप्पी उर्फ अमित की याचिका पर दिया है।
याचिका में अपर सत्र न्यायाधीश विशेष अदालत एससी एसटी एक्ट बागपत द्वारागवाह को समन जारी करने की वैधता को चुनौती दी गई थी। याची के अधिवक्ता का कहना था कि शिकायतकर्ता की धारा 311 की अर्जी को स्वीकार कर अदालत ने चश्मदीद गवाह निशांत को बुलाया है, जो कानून के खिलाफ है। क्योंकि इस गवाह का नाम अभियोजन ने नहीं दिया है, न ही विवेचना के दौरान इसका नाम आया और न चार्जशीट में शामिल किया गया। कोर्ट बाहरी किसी भी व्यक्ति को केस की गवाही के लिए नहीं बुला सकती।
शिकायतकर्ता की तरफ से अधिवक्ता राधे कृष्ण पांडेय व मनीष पांडेय का कहना था कि घटना के दसवें दिन ही शिकायतकर्ता ने एसपी, बागपत को हलफनामा देकर बताया था कि उसका भाई निशांत भी हत्या का चश्मदीद गवाह है। किंतु विवेचना व केस डायरी में शामिल नहीं किया गया। उसने विचारण अदालत में अर्जी दी और निशांत को गवाही के लिए बुलाने की मांग की। जिसे अदालत ने स्वीकार कर कानून के अनुसार काम किया है, इसलिए याचिका खारिज की जाए।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद कहा कि धारा 311 में साफ लिखा है कि सही निर्णय लेने के लिए अदालत को किसी को भी बुलाने या पुन: बुलाने का अधिकार है। अधीनस्थ अदालत ने कानून के तहत सही आदेश दिया है। कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया।