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Prayagraj News: मेहर अफ्शां के बहाने गालिब को सुनने पहुंचे तिग्मांशु धूलिया
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग के न्यू हॉल में तीन विभागों (हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू) की ओर से गालिब पर परिचर्चा हुई। इसमें ‘सामाजिक मूल्य और साहित्यिक कर्म : गालिब की प्रकाशित और अप्रकाशित कविताओं की व्याख्या’ विषय पर विस्तार से रोशनी डाली गई।।
मुख्य वक्ता वर्जिनिया यूनिवर्सिटी में उर्दू शिक्षिका प्रो. मेहर अफ्शां फारूकी ने गालिब पर लिखी अपनी दो किताबों को केंद्र में रखकर विषय पर विस्तार से बातचीत की। उन्होंने लोगों को गालिब के मुश्किल शेरों के अर्थ के साथ जोड़ते हुए उनके सामाजिक पक्ष को उजागर किया। प्रो. अफ्शां ने विद्यार्थियों के सवालों का जवाब दिया और उनकी जिज्ञासा को सराहा।
विषय की प्रस्तावना और अतिथियों का स्वागत हिंदी के विभागाध्यक्ष प्रो. प्रणय कृष्ण ने किया। उन्होंने शम्सुर्रहमान फारूकी को याद करते हुए प्रो. अफ्शां के साहित्यिक फलक पर टिप्पणी की और उनके नए आयामों की ओर इशारा किया। इस कार्यक्रम के संवादी आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार, प्रो. नासेहा उस्मानी और डॉ. प्रशांत कुमार पांडेय थे। इन्होंने गालिब को केंद्र में रखकर बातचीत की।
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इस कार्यक्रम में तब और अधिक उत्साह आ गया जब मशहूर फिल्म निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया भी शामिल हुए। संचालन डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्त ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बसंत त्रिपाठी ने किया। परास्नातक छात्रा गौसिया ने ‘हजारों खवाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले’ (मिर्जा गालिब) की गजल को अपने तरन्नुम में सुनाया।
इसके बाद अतिथियों का स्वागत स्मृति चिह्न देकर किया गया। इस मौके पर जफर बख्त, प्रो. बरा फारूकी, प्रो.अनिता गोपेश, अशरफ अली बेग, रंगकर्मी प्रवीण शेखर, प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह, प्रो. शिव प्रसाद शुक्ल, डॉ. अमरेंद्र त्रिपाठी, डॉ. कुमार वीरेंद्र, डॉ. राजेश कुमार, डॉ. आशुतोष पार्थेश्वर, डॉ. अंशुमान कुशवाहा, डॉ. अमितेश कुमार, डॉ. सुजीत कुमार सिंह, डॉ. वीरेंद्र मीणा आदि मौजूद रहे।
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मुख्य वक्ता वर्जिनिया यूनिवर्सिटी में उर्दू शिक्षिका प्रो. मेहर अफ्शां फारूकी ने गालिब पर लिखी अपनी दो किताबों को केंद्र में रखकर विषय पर विस्तार से बातचीत की। उन्होंने लोगों को गालिब के मुश्किल शेरों के अर्थ के साथ जोड़ते हुए उनके सामाजिक पक्ष को उजागर किया। प्रो. अफ्शां ने विद्यार्थियों के सवालों का जवाब दिया और उनकी जिज्ञासा को सराहा।
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विषय की प्रस्तावना और अतिथियों का स्वागत हिंदी के विभागाध्यक्ष प्रो. प्रणय कृष्ण ने किया। उन्होंने शम्सुर्रहमान फारूकी को याद करते हुए प्रो. अफ्शां के साहित्यिक फलक पर टिप्पणी की और उनके नए आयामों की ओर इशारा किया। इस कार्यक्रम के संवादी आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार, प्रो. नासेहा उस्मानी और डॉ. प्रशांत कुमार पांडेय थे। इन्होंने गालिब को केंद्र में रखकर बातचीत की।
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इस कार्यक्रम में तब और अधिक उत्साह आ गया जब मशहूर फिल्म निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया भी शामिल हुए। संचालन डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्त ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बसंत त्रिपाठी ने किया। परास्नातक छात्रा गौसिया ने ‘हजारों खवाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले’ (मिर्जा गालिब) की गजल को अपने तरन्नुम में सुनाया।
इसके बाद अतिथियों का स्वागत स्मृति चिह्न देकर किया गया। इस मौके पर जफर बख्त, प्रो. बरा फारूकी, प्रो.अनिता गोपेश, अशरफ अली बेग, रंगकर्मी प्रवीण शेखर, प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह, प्रो. शिव प्रसाद शुक्ल, डॉ. अमरेंद्र त्रिपाठी, डॉ. कुमार वीरेंद्र, डॉ. राजेश कुमार, डॉ. आशुतोष पार्थेश्वर, डॉ. अंशुमान कुशवाहा, डॉ. अमितेश कुमार, डॉ. सुजीत कुमार सिंह, डॉ. वीरेंद्र मीणा आदि मौजूद रहे।