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नूडल्स ने बिगाड़ा जायका, खाने से भी दूर हुए बच्चे
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 04 Jun 2015 12:23 AM IST
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इलाहाबाद। जब से नूडल्स, चिप्स, फास्ट फूड का स्वाद ‘यमी’ हुआ है, बच्चों को मम्मी के हाथ से बना खाना नहीं भा रहा। लुभावने विज्ञापनों और खिलौनों के दम पर पिज्जा तथा अन्य फास्ट फूड न सिर्फ बच्चों के दिलो-दिमाग पर हावी हो गए हैं, बल्कि इस लत ने उन्हें दूध और खाने से भी दूर कर दिया है। हरी सब्जी तो बच्चों की थाली से बहुत दूर हो गई है। इस आदत ने बच्चों को दोहरा नुकसाया पहुंचाया है। एक तो फास्ट फूड में मिले हानिकारक तत्व बच्चों की सेहत को झटका दे रहे हैं तो खाना नहीं खाने से उन्हें जरूरी पोषक तत्व भी नहीं मिल रहे हैं। इससे बच्चों में बीमारियाें से लड़ने की क्षमता कमजोर पड़ रही है।
मम्फोर्डगंज की पुष्पा श्रीवास्तव की पांच वर्ष की बेटी रूपाली को खाना खिलाना एक चुनौती भरा काम हो गया है। उसे हर समय चाकलेट, चिप्स, नूडल्स चाहिए। पुष्पा को भी नूडल्स बनाना आसान लगा, फिर वह बच्ची को रूलाना भी नहीं चाहतीं थी। शुरू में वह बेटी की यह जिद पूरी करती रहीं लेकिन यही जिद अब उनके लिए मुसीबत बन गई है। मौसम बदलते ही उसे लेकर डॉक्टर के पास जाना पड़ता है।
मम्फोर्डगंज की ही रोमिला माथुर ने सात वर्ष के बेटे अनिमेष को खाना खिलाने के लिए कहानी को माध्यम बनाया। कई दिनों तक तो कहानी सुनाते रहने पर अनिमेष ने खाना खाया लेकिन अब यह माध्यम भी बेकार हो गया है। प्रीति का दर्द तो लाइलाज है। उनके बच्चे को निमोनिया है लेकिन उसे कोल्ड ड्रिंक्स रोजाना चाहिए। कई बार तो उसने खुद पिज्जा ऑर्डर किया। यह दर्द सिर्फ इन मम्मियों का नहीं बल्कि हर उस घर का है, जहां बच्चे हैं। मैगी तथा इस जैसे अन्य उत्पादों की सच्चाई सामने आने के बाद पहले से परेशान मम्मियों की चिंता बढ़ा दी है। बच्चाें को समझाने की हर कोशिश फेल हो रही है। अब तो मम्मियों को इंतजार है कि अमिताभ अंकल और माधुरी आंटी ही बच्चों को समझाएं।
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मम्मी-पापा न सही नाना-नानी तो हैं
मम्मी-पापा ने नहीं दिया तो क्या हुआ, नाना-नानी, बुआ-चाचा तो हैं न, उनसे चिप्स, चाकलेट ले लेंगे। नानी तो एक मांगने पर दो-दो पैकेट पकड़ा देंगी। नूडल्स, चिप्स के बच्चे ऐसे आदी हो ही गए हैं, रिश्तेदार भी उन्हें लुभाने के लिए इन्हें लाना नहीं भूलते। चाकलेट, चिप्स ने गिफ्ट पैक में जगह बना ली है। इससे आदत छुड़ाना और मुश्किल हो गया है।
टीवी, कम्प्यूटर गेम्स ने बढ़ाई चिंता
जंक फूड से बच्चों की सेहत को नुकसान हो रहा है। मैदान में खेलना-कूदना बच्चों की आदत से गायब है। घर के भीतर भी वीडियो-कम्प्यूटर गेम तथा कार्टून टीवी चैनल देखने में बच्चों का ज्यादा समय जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि इसकी वजह से मैदा तथा कई अन्य हानिकारक तत्वों वाले जंक फूड को बच्चे पचा नहीं पा रहे। इससे कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
जुगाड़ से टूटेगा जंक फूड का जाल
नूडल्स, पिज्जा, चिप्स से बाजार को पाटने वाली कंपनियाें के मकड़जाल से बच्चों को उन्हीं के साधनों से बाहर निकालना होगा। बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रितु जैन का कहना है कि मैदे से बने ऐसे पदार्थ पेट के दुश्मन हैं। जंक फूड में मिला अजीनोमोटो बच्चों को इसका एडिक्ट बना देता है। इसीलिए बच्चे इनकी बार-बार मांग करते और खाना नहीं खाते। अब तो लेड मिलने की बात भी सामने आई है जो काफी खतरनाक है। इन वजहाें से बच्चों का एनिमिक होना और उनमें पेट की बामारियां कॉमन हो गई हैं।
इससे बचाव के लिए अभिभावकों को खुद को भी नियंत्रित करना होगा। हफ्ते में एक दिन बच्चे की जिद पूरी की जा सकती है लेकिन छह दिन उन्हें पौष्टिक खाना देना होगा। बच्चे खाना पसंद करें इसके लिए आटे से अलग-अलग डिश बनाए जा सकते हैं। आटे का नूडल्स भी विकल्प हो सकता है। आटा में पालक आदि मिलाकर गूथें। उनके लिए छोटी रोटी बनाएं। कई अन्य तरीकों से भी उनमें रोटी, दाल, सब्जियों के लिए रुचि पैदा करें। सबसे जरूरी है कि बच्चों के साथ बैठकर खाएं और इस दौरान टीवी बिल्कुल न चलने दें।
अन्य पदार्थों की भी हो जांच
मैगी में लेड जैसे खतरनाक तत्व की मानक से अधिक मात्रा पाए जाने के बाद अन्य खाद्य पदार्थों की जांच की मांग भी शुरू हो गई है। ऊंचवागढ़ी की पुष्पा मिश्रा, नया कटरा के मोहन सिंह, मीरापुर की दीप्ति आदि का कहना है कि बच्चों की सेहत का मामला है सो सभी तरह के नूडल्स की जांच होनी चाहिए। रंगीन पैकेट में कई तरह के प्रोडक्ट हो सकते हैं। अतरसुइया की मोनिका ने कहा, पैकेट पर इनमें मिलाए गए पदार्थों की स्पष्ट जानकारी दर्ज होनी चाहिए।
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मम्फोर्डगंज की पुष्पा श्रीवास्तव की पांच वर्ष की बेटी रूपाली को खाना खिलाना एक चुनौती भरा काम हो गया है। उसे हर समय चाकलेट, चिप्स, नूडल्स चाहिए। पुष्पा को भी नूडल्स बनाना आसान लगा, फिर वह बच्ची को रूलाना भी नहीं चाहतीं थी। शुरू में वह बेटी की यह जिद पूरी करती रहीं लेकिन यही जिद अब उनके लिए मुसीबत बन गई है। मौसम बदलते ही उसे लेकर डॉक्टर के पास जाना पड़ता है।
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मम्फोर्डगंज की ही रोमिला माथुर ने सात वर्ष के बेटे अनिमेष को खाना खिलाने के लिए कहानी को माध्यम बनाया। कई दिनों तक तो कहानी सुनाते रहने पर अनिमेष ने खाना खाया लेकिन अब यह माध्यम भी बेकार हो गया है। प्रीति का दर्द तो लाइलाज है। उनके बच्चे को निमोनिया है लेकिन उसे कोल्ड ड्रिंक्स रोजाना चाहिए। कई बार तो उसने खुद पिज्जा ऑर्डर किया। यह दर्द सिर्फ इन मम्मियों का नहीं बल्कि हर उस घर का है, जहां बच्चे हैं। मैगी तथा इस जैसे अन्य उत्पादों की सच्चाई सामने आने के बाद पहले से परेशान मम्मियों की चिंता बढ़ा दी है। बच्चाें को समझाने की हर कोशिश फेल हो रही है। अब तो मम्मियों को इंतजार है कि अमिताभ अंकल और माधुरी आंटी ही बच्चों को समझाएं।
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मम्मी-पापा न सही नाना-नानी तो हैं
मम्मी-पापा ने नहीं दिया तो क्या हुआ, नाना-नानी, बुआ-चाचा तो हैं न, उनसे चिप्स, चाकलेट ले लेंगे। नानी तो एक मांगने पर दो-दो पैकेट पकड़ा देंगी। नूडल्स, चिप्स के बच्चे ऐसे आदी हो ही गए हैं, रिश्तेदार भी उन्हें लुभाने के लिए इन्हें लाना नहीं भूलते। चाकलेट, चिप्स ने गिफ्ट पैक में जगह बना ली है। इससे आदत छुड़ाना और मुश्किल हो गया है।
टीवी, कम्प्यूटर गेम्स ने बढ़ाई चिंता
जंक फूड से बच्चों की सेहत को नुकसान हो रहा है। मैदान में खेलना-कूदना बच्चों की आदत से गायब है। घर के भीतर भी वीडियो-कम्प्यूटर गेम तथा कार्टून टीवी चैनल देखने में बच्चों का ज्यादा समय जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि इसकी वजह से मैदा तथा कई अन्य हानिकारक तत्वों वाले जंक फूड को बच्चे पचा नहीं पा रहे। इससे कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
जुगाड़ से टूटेगा जंक फूड का जाल
नूडल्स, पिज्जा, चिप्स से बाजार को पाटने वाली कंपनियाें के मकड़जाल से बच्चों को उन्हीं के साधनों से बाहर निकालना होगा। बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रितु जैन का कहना है कि मैदे से बने ऐसे पदार्थ पेट के दुश्मन हैं। जंक फूड में मिला अजीनोमोटो बच्चों को इसका एडिक्ट बना देता है। इसीलिए बच्चे इनकी बार-बार मांग करते और खाना नहीं खाते। अब तो लेड मिलने की बात भी सामने आई है जो काफी खतरनाक है। इन वजहाें से बच्चों का एनिमिक होना और उनमें पेट की बामारियां कॉमन हो गई हैं।
इससे बचाव के लिए अभिभावकों को खुद को भी नियंत्रित करना होगा। हफ्ते में एक दिन बच्चे की जिद पूरी की जा सकती है लेकिन छह दिन उन्हें पौष्टिक खाना देना होगा। बच्चे खाना पसंद करें इसके लिए आटे से अलग-अलग डिश बनाए जा सकते हैं। आटे का नूडल्स भी विकल्प हो सकता है। आटा में पालक आदि मिलाकर गूथें। उनके लिए छोटी रोटी बनाएं। कई अन्य तरीकों से भी उनमें रोटी, दाल, सब्जियों के लिए रुचि पैदा करें। सबसे जरूरी है कि बच्चों के साथ बैठकर खाएं और इस दौरान टीवी बिल्कुल न चलने दें।
अन्य पदार्थों की भी हो जांच
मैगी में लेड जैसे खतरनाक तत्व की मानक से अधिक मात्रा पाए जाने के बाद अन्य खाद्य पदार्थों की जांच की मांग भी शुरू हो गई है। ऊंचवागढ़ी की पुष्पा मिश्रा, नया कटरा के मोहन सिंह, मीरापुर की दीप्ति आदि का कहना है कि बच्चों की सेहत का मामला है सो सभी तरह के नूडल्स की जांच होनी चाहिए। रंगीन पैकेट में कई तरह के प्रोडक्ट हो सकते हैं। अतरसुइया की मोनिका ने कहा, पैकेट पर इनमें मिलाए गए पदार्थों की स्पष्ट जानकारी दर्ज होनी चाहिए।