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Prayagraj News: जज ने किया दूर कोर्ट में बोलने का डर, तब शुरू हुआ आत्मविश्वास का सफर
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वरिष्ठ अधिवक्ता अतुल दयाल से बातचीत।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अतुल दयाल ने 40 वर्षों के अपने न्यायिक जीवन के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि वकालत शुरू किए कुछ ही दिन हुए थे, तभी उनके वरिष्ठ अधिवक्ता ने उन्हें एक लिमिटेशन से जुड़े मामले में अदालत में पेश होने और केस सूचीबद्ध कराने की जिम्मेदारी दी। मुकदमे की सुनवाई के लिए उनका मामला पुकारा गया तो वह अदालत में खड़े तो हुए, लेकिन घबराहट के कारण एक शब्द भी नहीं बोल सके।
इस पर न्यायाधीश ने उनसे याचिका का पहला पृष्ठ खोलकर पढ़ने के लिए कहा। उन्होंने पहला पृष्ठ पढ़ा। इसके बाद न्यायाधीश ने आगे की बातें स्वयं पूछते हुए पूरी याचिका समझी और मामले में राहत प्रदान कर दी। अतुल बताते हैं कि उसी दिन से अदालत में बोलने का डर खत्म हो गया और आत्मविश्वास के साथ वकालत का सफर आगे बढ़ता चला गया।
एक और संस्मरण साझा करते हुए वह कहते हैं कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता अक्सर उनके मुकदमों में विपक्ष की ओर से पैरवी करते थे। बहस के दौरान दोनों के बीच कई बार तीखी नोकझोंक भी होती थी। बाद में पता चला कि वह जज बनने वाले हैं। इस पर उनसे मिलकर कहा कि बहस के दौरान यदि कभी कोई ऐसी बात हुई हो, जिससे उन्हें ठेस पहुंची हो तो वह माफी चाहते हैं। इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, कोर्ट की बात वहीं ही छोड़ दीजिए, आइए कॉफी पीते हैं।
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उन्होंने कहा कि न्यायाधीश और अधिवक्ता दोनों ही अदालत की बहस को व्यक्तिगत जीवन से अलग रखते हैं। अदालत के बाहर उनका व्यवहार हमेशा सौहार्दपूर्ण रहता है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने जूनियर अधिवक्ताओं को सलाह दी कि वे नियमित रूप से अपने वरिष्ठों के चैंबर में बैठकर प्रैक्टिस सीखें।
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इस पर न्यायाधीश ने उनसे याचिका का पहला पृष्ठ खोलकर पढ़ने के लिए कहा। उन्होंने पहला पृष्ठ पढ़ा। इसके बाद न्यायाधीश ने आगे की बातें स्वयं पूछते हुए पूरी याचिका समझी और मामले में राहत प्रदान कर दी। अतुल बताते हैं कि उसी दिन से अदालत में बोलने का डर खत्म हो गया और आत्मविश्वास के साथ वकालत का सफर आगे बढ़ता चला गया।
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एक और संस्मरण साझा करते हुए वह कहते हैं कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता अक्सर उनके मुकदमों में विपक्ष की ओर से पैरवी करते थे। बहस के दौरान दोनों के बीच कई बार तीखी नोकझोंक भी होती थी। बाद में पता चला कि वह जज बनने वाले हैं। इस पर उनसे मिलकर कहा कि बहस के दौरान यदि कभी कोई ऐसी बात हुई हो, जिससे उन्हें ठेस पहुंची हो तो वह माफी चाहते हैं। इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, कोर्ट की बात वहीं ही छोड़ दीजिए, आइए कॉफी पीते हैं।
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उन्होंने कहा कि न्यायाधीश और अधिवक्ता दोनों ही अदालत की बहस को व्यक्तिगत जीवन से अलग रखते हैं। अदालत के बाहर उनका व्यवहार हमेशा सौहार्दपूर्ण रहता है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने जूनियर अधिवक्ताओं को सलाह दी कि वे नियमित रूप से अपने वरिष्ठों के चैंबर में बैठकर प्रैक्टिस सीखें।

वरिष्ठ अधिवक्ता अतुल दयाल से बातचीत।