{"_id":"6941f5274ad3278e010eaa97","slug":"the-allahabad-high-court-said-there-is-no-right-to-maintenance-in-a-consensual-relationship-2025-12-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- शादी कायम तो सहमति संबंध में भरण पोषण का हक नहीं, पत्नी का दर्जा शादी बाद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- शादी कायम तो सहमति संबंध में भरण पोषण का हक नहीं, पत्नी का दर्जा शादी बाद
Wed, 17 Dec 2025 05:41 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 17 Dec 2025 05:41 AM IST
विज्ञापन
इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पहली शादी कायम है तो महिला सहमति संबंध के साथी से भरण-पोषण नहीं मांग सकती। साथ ही कहा कि लंबे समय तक साथ रहने से पत्नी का वैधानिक दर्जा नहीं मिल जाता, जब तक पहली शादी का विधिवत तलाक न हो।
विज्ञापन
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने ट्रायल कोर्ट के आदेश पर मुहर लगा कानपुर नगर निवासी महिला की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। महिला का दावा था कि जून 2009 में उसका विवाह सहमति संबंध के साथी के साथ हुआ था। साथी ने यह कहकर विवाह किया कि अगस्त 2005 में समझौते के जरिये उसने पहली पत्नी से संबंध समाप्त कर लिया है। महिला के अनुसार दोनों करीब 10 साल तक पति-पत्नी की तरह रहे और आधार कार्ड-पासपोर्ट जैसे दस्तावेज में भी उसका नाम पत्नी के रूप में दर्ज है।
विज्ञापन
महिला का आरोप है कि मार्च 2018 में उसके साथ क्रूरता हुई और उसे छोड़ दिया गया। इसके बाद उसने भरण-पोषण की मांग को लेकर परिवार न्यायालय में अर्जी दायर की। वहीं, साथी ने दलील दी कि महिला उसकी दूर की बुआ की बेटी है। उनके बीच कोई वैध विवाह नहीं हुआ। महिला ने पहले पति से विधिवत तलाक नहीं लिया। इसलिए वह पहले पति की कानूनी पत्नी है और उससे भरण-पोषण नहीं मांग सकती। ट्रायल कोर्ट ने याचिका खारिज दी तो महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ
महिला की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फैसले बदशाह बनाम उर्मिला बदशाह गोडसे (2014) का हवाला दिया गया, जिसमें धोखे से दूसरी शादी कराने पर भरण-पोषण का अधिकार माना गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले को अलग बताते हुए कहा कि उस फैसले में दूसरी पत्नी विवाह के लिए पात्र थी और उसे पहली शादी की जानकारी नहीं थी। वर्तमान मामले में महिला स्वयं स्वीकार करती है कि उसकी पहली शादी कायम है। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही महिला और पुरुष 10 साल तक साथ रहे हों और उनका संबंध विवाह जैसा प्रतीत होता हो, लेकिन इससे महिला को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं मिलता।
- सीआरपीसी की धारा 125 (अब बीएनएसएस की धारा 144) : इसके तहत पत्नी, बच्चे और माता-पिता जो खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं, उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान कराई जाती है। मामला पुराना होने के चलते यहां सीआरपीसी की धारा-125 के तहत सुनवाई की गई।